विनोद के मुसान
भारतीय राजनीति में नेताआें की छवी जनता के बीच कितनी दूषित हो चुकी है, इसका प्रत्यक्ष उदाहरण लोकसभा चुनाव में साफ देखने को मिल रहा है। वे भीड़ को देखने के लिए तरस रहे हैं, लेकिन जनता उन्हें घास नहीं डाल रही। थक-हारकर उन्हें वह हत्थकंठे अपनाने पड़ रहे है, जो मर्यादित राजनीति को शोभा नहीं देते। स्टार प्रचारकों के नाम पर चुनावी सभाआें में उन लोगों को प्रस्तुत किया जा रहा है, जिनका राजनीति से कोई लेना-देना नहीं। फिल्मी पर्दे पर अभिनय कर एक हद तक भीड़ खिंचने वाले फिल्मी सितारे अब राजनीतिक मंचों की शोभा बनने लगे हैं। यहां भी यह लोग एक हद तक भीड़ खिंच लेते हैं, जिसको हमारे राजनेता अपनी उपलब्धि समझने की भूल कर रहे हैं।
दरअसल फिल्म पर्दे की चकाचौंध के बाद जब फिल्म सितारे यकायक पब्लिक से रूबरू होते हैं, तो भीड़ भी उमड़ पड़ती है, यह वह भीड़ होती है, जो अपने चहेतों स्टार को करीब से देखने आती है। न की इन्हें बुलाने वाले नेता को। यही वजह है कि चुनावी रैलियों जनता के मुद् दे गौण हो रहे हैं। सभा से बाहर निकलने के बाद लोग बात करते हैं कि फंला अभिनेत्री ने या पहना था, वह बार-बार अपने बालों को झटके दे रही थी। अरे, उस अभिनेता की तो जींस फटी थी, फटी थी...नहीं-नहीं, यह तो फैशन है। नेता जी ने अपने भाषण में या कहा, या नहीं कहा। इस बात से किसी को कोई मतलब नहीं। भीड़ पहुंच गई। दिल्ली से आए बड़े नेता जी भी खुश। लेकिन यह हत्थकंडा भी ज्यादा दिन नहीं चलेगा। एक समय के बाद भीड़ नेताआें की तरह फिल्मी लोगों को भी नहीं पूछेगी।
हालांकि चुनाव आयोग की सख्ती के चलते चुनावी सभाआें के मंच पर इस बार भाै़ंडे डांस नहीं दिखाई दिए। जिनको लेकर चुनाव चर्चाआें का विषय बनता था। उत्तर प्रदेश और बिहार में तो यह आम बात थी। पब्लिक को रिझाने के लिए नेता लोग जो न कर जाएं, वह कम है।
आफ बीट लोग कहते हैं, फिल्म वाले पैसा लेकर प्रचार करने आते हैं, इसमें भी दोराय नहीं है, योंकि इसी चुनाव में कुछ फिल्मी सितारों को एक दिन एक पार्टी तो दूसरे दिन दूसरी विपक्षी पार्टी का प्रचार करते देखा गया। टीवी चैनलों पर भी खूब शोर मचा। दोस्तीऱ्यारी और रिश्ते निभाने तक तो ठीक है, लेकिन पैसा लेकर लोकतांत्रिक व्यवस्था केलिए चुने जाने वाले सदस्यों के लिए प्रचार करना शोभा नहीं देता।
एक समय था जब चुनावी मंचों पर देश की नई तस्वीर तय होती थी। बड़े-बड़े मुद् दों पर बहस होती थी। शालिन अंदाज में विपक्ष की धज्जियां भी उड़ाई जाती थी। लोग दूर-दूर से नेताआें को सुनने आते थे। सभा से बाहर निकलने के बाद लोग आपस में बहस करते थे। लेकिन वर्तमान राजनीति का चेहरा इस कदर विकृत हो चुका है कि इसमें इन बातों के लिए कोई जगह नहीं है।
Sunday, 10 May 2009
Saturday, 2 May 2009
मुद् दों का सौदागर
विनोद के मुसान
नेता जी के आराम में खलल डालते हुए उनके सेके्रटरी चमच्च लाल ने तेजी से कमरे में प्रवेश किया और बोले, 'सर हमारी कान्सीटेंसी में 'मुद् दों` का सौदागर घूम रहा है।` 'कहो, तो बुला लाऊं।` 'पिछले चुनाव के बाद अबकी बड़ी मुद् दत के बाद दिखाई दिया है। कहीं ऐसा न हो, पिछली बार की तरह इस बार भी विपक्षी दल के लोग उसे लपक ले जाएं और हमारे हाथ इस बार भी खाली रह जाएं।` 'वैसे पिछली बार तो जुगाड़ से काम चल गया था, लेकिन इस बार या होगा।` नेता जी ने बड़ी सी जमाही ली और बोले, 'कौन-कौन से मुद् दे हैं इस बार सौदागर की झोली में।` 'महाराज, वो तो उसे बुलाने पर ही पता चलेगा।`
'कहो तो, बुला लाऊं`। 'हां,` 'लेकिन रूको।` 'पहले इस बात की तफ्तीश कर लो, या इस बार मुद् दों की जरूरत है भी या नहीं।` 'जहां तक मेरी जानकारी है इस बार बड़ी-बड़ी पार्टियां भी बिन मुद् दई चुनाव लड़ रही हैं।` 'कहीं ऐसा न हो उसे बुलाकर हम बेकार का खर्च सिर मोल ले लें।` 'चुनाव आयोग का या भरोसा इसे भी हमारे चुनाव खर्च में ही जाे़ड लेगा।` 'फिर भला उसके पास इस बार कौन से नए मुद् दे होंगे। दशकों पहले हमने जो मुद् दे चुनाव के व त जनता के बीच रखे थे, वह आज भी वैसे ही हैं।` 'हर बार गरीबी, बेरोजगारी, अशिक्षा, आतंकवाद और जनता को बरगलाने वाली कुछ नई योजनाएं इस बार भी चला देंगे। वैसे भी जनता के बीच अब ये मुद् दे बाजार में खोटा सि का चलाने जैसी बात है।`
'जनता के पास ही इन बातों के लिए समय नहीं, तो भला हम यों मथापच्ची करें।`
'लोकतंत्र का यह महापर्व अब रस्मी अनुष्ठ ान बन गया है। जिसे पूरा करने के लिए अगर मुद् दों के सौदागर के पास कोई बूटी हो तो जरूर उसे बुला भेजो।` 'वैसे भी आतंकवाद पर एक पार्टी का कब्जा है, दूसरी परमाणु करार को लेकर चिंतित है, तीसरे हॉट मुद् दे का मुद् दा भी तीसरे र्मोचे ने लपक लिया है।`
'मंदी को लेकर हम जनता के बीच जाना नहीं चाहते, योंकि यही असली मुद् दा है।` 'अगर गए तो कल जवाब देना पड़ेगा। इसलिए मुद् दों की बात न ही करो, तो ज्यादा अच्छा है। वैसे तो जनता की याददाशत बहुत कमजोर होती है, लेकिन बात जब सतही मुद् दों की आती है तो कोई भी 'जवाब हाजिर` हो सकता है।`
'जनता को मुद् दों की याद दिलाकर, अपने ही पैर पर कुल्हाड़ी मारने जैसी बात होगी। इसलिए अच्छा यही होगा, मुद् दों केसौदागर को न ही बुलाओ।` 'आगे काम की बात सोचो।` 'चुनाव जीतने के बाद किस पार्टी की गोद में बैठें और अभी किस की यारी प्यारी है।`
नेता जी के तर्क सुनकर सके्रटी भी सोचने लगा, जब मुदई ही मुस्तैद नहीं है, तो भला चम्मच लाल यों अपनी चम्मची चमकाए।
नेता जी के आराम में खलल डालते हुए उनके सेके्रटरी चमच्च लाल ने तेजी से कमरे में प्रवेश किया और बोले, 'सर हमारी कान्सीटेंसी में 'मुद् दों` का सौदागर घूम रहा है।` 'कहो, तो बुला लाऊं।` 'पिछले चुनाव के बाद अबकी बड़ी मुद् दत के बाद दिखाई दिया है। कहीं ऐसा न हो, पिछली बार की तरह इस बार भी विपक्षी दल के लोग उसे लपक ले जाएं और हमारे हाथ इस बार भी खाली रह जाएं।` 'वैसे पिछली बार तो जुगाड़ से काम चल गया था, लेकिन इस बार या होगा।` नेता जी ने बड़ी सी जमाही ली और बोले, 'कौन-कौन से मुद् दे हैं इस बार सौदागर की झोली में।` 'महाराज, वो तो उसे बुलाने पर ही पता चलेगा।`
'कहो तो, बुला लाऊं`। 'हां,` 'लेकिन रूको।` 'पहले इस बात की तफ्तीश कर लो, या इस बार मुद् दों की जरूरत है भी या नहीं।` 'जहां तक मेरी जानकारी है इस बार बड़ी-बड़ी पार्टियां भी बिन मुद् दई चुनाव लड़ रही हैं।` 'कहीं ऐसा न हो उसे बुलाकर हम बेकार का खर्च सिर मोल ले लें।` 'चुनाव आयोग का या भरोसा इसे भी हमारे चुनाव खर्च में ही जाे़ड लेगा।` 'फिर भला उसके पास इस बार कौन से नए मुद् दे होंगे। दशकों पहले हमने जो मुद् दे चुनाव के व त जनता के बीच रखे थे, वह आज भी वैसे ही हैं।` 'हर बार गरीबी, बेरोजगारी, अशिक्षा, आतंकवाद और जनता को बरगलाने वाली कुछ नई योजनाएं इस बार भी चला देंगे। वैसे भी जनता के बीच अब ये मुद् दे बाजार में खोटा सि का चलाने जैसी बात है।`
'जनता के पास ही इन बातों के लिए समय नहीं, तो भला हम यों मथापच्ची करें।`
'लोकतंत्र का यह महापर्व अब रस्मी अनुष्ठ ान बन गया है। जिसे पूरा करने के लिए अगर मुद् दों के सौदागर के पास कोई बूटी हो तो जरूर उसे बुला भेजो।` 'वैसे भी आतंकवाद पर एक पार्टी का कब्जा है, दूसरी परमाणु करार को लेकर चिंतित है, तीसरे हॉट मुद् दे का मुद् दा भी तीसरे र्मोचे ने लपक लिया है।`
'मंदी को लेकर हम जनता के बीच जाना नहीं चाहते, योंकि यही असली मुद् दा है।` 'अगर गए तो कल जवाब देना पड़ेगा। इसलिए मुद् दों की बात न ही करो, तो ज्यादा अच्छा है। वैसे तो जनता की याददाशत बहुत कमजोर होती है, लेकिन बात जब सतही मुद् दों की आती है तो कोई भी 'जवाब हाजिर` हो सकता है।`
'जनता को मुद् दों की याद दिलाकर, अपने ही पैर पर कुल्हाड़ी मारने जैसी बात होगी। इसलिए अच्छा यही होगा, मुद् दों केसौदागर को न ही बुलाओ।` 'आगे काम की बात सोचो।` 'चुनाव जीतने के बाद किस पार्टी की गोद में बैठें और अभी किस की यारी प्यारी है।`
नेता जी के तर्क सुनकर सके्रटी भी सोचने लगा, जब मुदई ही मुस्तैद नहीं है, तो भला चम्मच लाल यों अपनी चम्मची चमकाए।
Saturday, 28 March 2009
टीवी पर न्यूज का टोटा
विनोद के मुसान
टीवी न्यूज चैनल की स्क्रीन से खबरें सिरे से गायब हैं। अपने को सर्वश्रेष्ठ घोषित करने वाले तमाम न्यूज चैनलों के पास खबरों का ऐसा टोटा है कि वे हांफते फिर रहे हैं। फिर भी प्रतिस्प्रर्धा की अंधी दाै़ड में बेशर्म होकर अपने को सर्वश्रेष्ठ कहलाने से नहीं हिचकते हैं।
लोग सुबह उठते हैं, ताजातरीन होकर। टीवी का स्विच ऑन करते हैं, यह सोचकर की देश दुनिया की खबरों से रू-ब-रू हो सकें। लेकिन, इससे इतर उन्हें जानकारी मिलती है, बीती रात कौन से सीरियल में या घटित हुआ। नच बलिए में किस ने कौन से लटके-झटके दिखाए और हंसी के फूहड़ शो में पूरा शो खत्म हो जाने केबाद भी किसी को हंसी नहीं आई। छोटे उस्ताद में गंगू बाई ने किसके घर में झाड़ू लगाई। कौन से हिरो-हिरोइन ने इन दिनों किस कंपनी का प्रोड ट लांच किया। और इस सबकेबाद भी टाइम बचा तो आपको इसी लोक में पाताल लोक की सैर भी करा दी जाती है। जब दिखाने को कुछ न हो तो सदाबहार 'आतंकवाद` तो है ही। यह ऐसा विषय है, जिसके कभी भी चला दो। एजेंसी से उठाई हुई ि लप को मिर्च-मसाला लगाकर ऐसे पेश किया जाता है, जैसे दुनिया की सबसे बड़ी खबर आज चैनल के हाथ लग गई हो। खबरों के नाम पर जो भाै़ंडा खेल चैनल वाले खेल रहे हैं, इसने रही-सही पत्रकारिता का भी सत्यानाश कर दिया है। चैलनों पर चलने वाली खबरों को देखकर कोफ्त होती है, सिर दर्द करने लगता है। आम शख्स आज न्यूज चैनलों केबारे में अपनी बेबाक रखता है तो उसकेमुख से कभी अच्छी बात नहींं निकलती। वैसे भी पत्रकारिता के इस पवित्र पेशे में कैसे-कैसे लोगों की गुसपैठ हो चुकी है, यह बात किसी से छुपी नहीं है।
ईमानदारी से सोचो सौ कराे़ड से ज्यादा आबादी वाले इस देश में या बारह घंटे की खबरें नहीं जुटाई जा सकती। चलो मान लिया आप चौबीस घंटे केन्यूज चैनल हैं, आपको हर व त कुछ न कुछ दिखाना है। लेकिन खबरों केनाम पर जो कुछ दिखाया जा रहा है, या वह उचित है। बासी ही सही लेकिन खबरें तो दिखाओ। चैनल वालों को लग रहा है, लोगों को फूहड़ हंसी वाले शो दिखाकर वे भी वे अपनी टीआरपी बढ़ा रहे, लेकिन ऐसा कब तक चलेगा।
टीवी न्यूज चैनल की स्क्रीन से खबरें सिरे से गायब हैं। अपने को सर्वश्रेष्ठ घोषित करने वाले तमाम न्यूज चैनलों के पास खबरों का ऐसा टोटा है कि वे हांफते फिर रहे हैं। फिर भी प्रतिस्प्रर्धा की अंधी दाै़ड में बेशर्म होकर अपने को सर्वश्रेष्ठ कहलाने से नहीं हिचकते हैं।
लोग सुबह उठते हैं, ताजातरीन होकर। टीवी का स्विच ऑन करते हैं, यह सोचकर की देश दुनिया की खबरों से रू-ब-रू हो सकें। लेकिन, इससे इतर उन्हें जानकारी मिलती है, बीती रात कौन से सीरियल में या घटित हुआ। नच बलिए में किस ने कौन से लटके-झटके दिखाए और हंसी के फूहड़ शो में पूरा शो खत्म हो जाने केबाद भी किसी को हंसी नहीं आई। छोटे उस्ताद में गंगू बाई ने किसके घर में झाड़ू लगाई। कौन से हिरो-हिरोइन ने इन दिनों किस कंपनी का प्रोड ट लांच किया। और इस सबकेबाद भी टाइम बचा तो आपको इसी लोक में पाताल लोक की सैर भी करा दी जाती है। जब दिखाने को कुछ न हो तो सदाबहार 'आतंकवाद` तो है ही। यह ऐसा विषय है, जिसके कभी भी चला दो। एजेंसी से उठाई हुई ि लप को मिर्च-मसाला लगाकर ऐसे पेश किया जाता है, जैसे दुनिया की सबसे बड़ी खबर आज चैनल के हाथ लग गई हो। खबरों के नाम पर जो भाै़ंडा खेल चैनल वाले खेल रहे हैं, इसने रही-सही पत्रकारिता का भी सत्यानाश कर दिया है। चैलनों पर चलने वाली खबरों को देखकर कोफ्त होती है, सिर दर्द करने लगता है। आम शख्स आज न्यूज चैनलों केबारे में अपनी बेबाक रखता है तो उसकेमुख से कभी अच्छी बात नहींं निकलती। वैसे भी पत्रकारिता के इस पवित्र पेशे में कैसे-कैसे लोगों की गुसपैठ हो चुकी है, यह बात किसी से छुपी नहीं है।
ईमानदारी से सोचो सौ कराे़ड से ज्यादा आबादी वाले इस देश में या बारह घंटे की खबरें नहीं जुटाई जा सकती। चलो मान लिया आप चौबीस घंटे केन्यूज चैनल हैं, आपको हर व त कुछ न कुछ दिखाना है। लेकिन खबरों केनाम पर जो कुछ दिखाया जा रहा है, या वह उचित है। बासी ही सही लेकिन खबरें तो दिखाओ। चैनल वालों को लग रहा है, लोगों को फूहड़ हंसी वाले शो दिखाकर वे भी वे अपनी टीआरपी बढ़ा रहे, लेकिन ऐसा कब तक चलेगा।
Thursday, 26 March 2009
दिल्ली मेट्रो का सच: मेटो के कर्मचारियों ने किया मेट्रो भवन के सामने प्रदर्शन
दिल्ली मेट्रो केवल दिल्ली ही नहीं बल्कि पूरे देश की शान है। उसकी चमकती ट्रेन, दमकते प्लेटफॉर्म और टिकट वितरण आदि की व्यवस्था सभी को पसंद है। लेकिन इस चमक-दमक के तले काम करने वालों की स्थिति के अंधेरे पक्ष के बारे में शायद बहुत कम लोगों को पता है, क्योंकि मेट्रो का प्रबंधन मीडिया को इस तरह मैनेज करता है कि केवल उसका उजला पक्ष ही लोगों के सामने आता है। अब, मेट्रो के कर्मचारी अपने साथ हो रहे अन्याय के खिलाफ आवाज़ उठाने लगे हैं, जिसका समर्थन लोकतांत्रिक मूल्यों में यकीन करने वाले हर व्यक्ति को चाहिए।
कल, यानी 25 मार्च को मेट्रो के कर्मचारियों ने अपनी मांगों को लेकर मेट्रो भवन के सामने विरोध-प्रदर्शन किया और नारे लगाए। जनसत्ता में छपी खबर के अनुसार मेट्रो कामगार संघर्ष समिति के बैनर तले मेट्रो के कामगार और मजदूरों ने न्यूनतम वेतन, साप्ताहिक छुट्टी और चिकित्सा सुविधा आदि की मांग को लेकर मेट्रो भवन के सामने प्रदर्शन किया। मजदूरों का कहना है कि उनसे 12-12 घंटे तक काम लिया जाता है और न्यूनतम मजदूरी 186 रुपये की जगह 90-100 रुपये ही दिये जाते हैं। द ट्रिब्यून की खबर के अनुसार न मजदूरों को कहना है कि उन्हें न तो पहचान पत्र दिए गए हैं और न ही प्रॉविडेंट फंड का अकाउंट खोला गया है। उनका आरोप है कि ठेकेदार मजदूरों के साथ बुरा बर्ताव करते हैं और उन्हें कभी-कभी सप्ताह में बिना छुट्टी के सातों दिन काम करना पड़ता है। इंडोपिया डॉट इन के अनुसार अपनी मांगे उठाने पर मजदूरों के साथ गाली-गलौज की जाती है और उन्हें धमकी दी जाती और यहां तक नौकरी से भी निकाल दिया जाता है।
कल, यानी 25 मार्च को मेट्रो के कर्मचारियों ने अपनी मांगों को लेकर मेट्रो भवन के सामने विरोध-प्रदर्शन किया और नारे लगाए। जनसत्ता में छपी खबर के अनुसार मेट्रो कामगार संघर्ष समिति के बैनर तले मेट्रो के कामगार और मजदूरों ने न्यूनतम वेतन, साप्ताहिक छुट्टी और चिकित्सा सुविधा आदि की मांग को लेकर मेट्रो भवन के सामने प्रदर्शन किया। मजदूरों का कहना है कि उनसे 12-12 घंटे तक काम लिया जाता है और न्यूनतम मजदूरी 186 रुपये की जगह 90-100 रुपये ही दिये जाते हैं। द ट्रिब्यून की खबर के अनुसार न मजदूरों को कहना है कि उन्हें न तो पहचान पत्र दिए गए हैं और न ही प्रॉविडेंट फंड का अकाउंट खोला गया है। उनका आरोप है कि ठेकेदार मजदूरों के साथ बुरा बर्ताव करते हैं और उन्हें कभी-कभी सप्ताह में बिना छुट्टी के सातों दिन काम करना पड़ता है। इंडोपिया डॉट इन के अनुसार अपनी मांगे उठाने पर मजदूरों के साथ गाली-गलौज की जाती है और उन्हें धमकी दी जाती और यहां तक नौकरी से भी निकाल दिया जाता है।
Monday, 16 March 2009
राजनीति में एंट्री
विनोद के मुसान
रामजी भाई गांव वाले इन दिनों काफी परेशान हैं। यूं तो उनकी परेशानी की वजह कुछ खास नहीं, लेकिन समस्या देशहित के साथ उनके कैरियर से जुडी है। व्यवस्था में रामजी भाई का योगदान मात्र इतना है कि वर्ष दर वर्ष किसी न किसी चुनाव में वे अपना कीमती मत 'दान` कर देते हैं। यूं तो उनका यह दान बहुत बड़ा है, लेकिन उन्हें लगता है मात्र दान कर लेने भर से उनकी और देश की समस्याएं हल होने वाली नहीं हैं। इसलिए पिछले दिनों उन्हें कुछ नया करने की सुझी और उन्होंने एक क्रांतिकारी कदम उठाने का निर्णय ले लिया।
आम आदमी का लेबल लिए रामजी भाई भले ही 'आम` हों, लेकिन उनमें वह सारी काबिलियत मौजूद हैं, जो उन्हें आम से खास बना सकती हैं। लेकिन व्यवस्था से अपरिचित जब उनका सामना सच्चाई से हुआ तो सारी की सारी योजनाएं धरी रह गइंर्।
रामजी भाई चाहते थे कि वे जनता की बीच जाकर देश की सर्वोच्च संस्था से जुड देशहित में योगदान दें। लेकिन, यहां पर आकार वे फंस जाते हैं।
उनके पास राजनीति में आने के लिए न तो किसी फिल्मीस्तान यूनिर्वसिटी की डिग्री है और न वे गुल्ली-डंडा केअलावा कभी क्रिकेटिया रंग में रंग पाए। गांव में रहते हुए उन्हें भाईगिरी करने का भी मौका नहीं मिला। बस नाम के ही 'रामजी भाई` बनकर रह गए। अब भला देश की समस्याएं हल कैसे हों, यही चिंता उन्हें आजकल दिन रात खाए जा रही है। इन दिनों रामजी भाई अपने गैर राजनीतिक खानदान को कोसने से भी बाज नहीं आते। दादा-नाना, चाचा-ताऊ, मामा-फूफा कोई तो होता, जो भवंर फंसी उनकी नैया का इस व त खेवनहार बनता। राजनीति केमैदान में उनका खानदान हमेशा से 'सफाच्चट` ही रहा। जिसका उन्हें इस दिनों खासा दुख है।
आर्थिक तंगी से जूझ रहे रामजी भाई की बीते दिनों की गई समाज सेवा भी काम नहीं आ रही। बुरे कर्मों की बाढ़ में लोग अच्छे काम करने वाले को किस कदर भूल जाते है, इसका अहसास रामजी भाई को इन दिनों खूब हो रहा है। वोट बैंक की राजनीति का आधुनिक 'विकृत` चेहरा देख वे हैरान हैं। टिकट से पहले नोट, जातिगत समीकरण और सेलिब्रिटी लेबल के अलावा तमाम दूसरे दाव-पेचों से उनकी झोली बिल्कुल खाली है। आमोखास बनने का कोई भी रास्ता उन्हें दिखाई नहीं दे रहा। ऐसे में उनकी चिंता लाजिमी है।
आखिर उनकी जुगत उनके साथ देशहित से जु़डी है। रामजी भाई बड़ा सोचते लेकिन बौनी व्यवस्था के आगे उनके कदम लड़खड़ाने लगते हैं। आखिर, हैं तो वह आम आदमी ही। जिसका कोई पूछनहार नहीं होता। कई तरह की जुगत लगाने के बाद भी जब रामजी भाई को कोई प्लेटफार्म नहीं मिल रहा तो वे अब इस क्षेत्र में आने से पूर्व अलविदा कहने की तैयारी कर रहे हैं।
Wednesday, 18 February 2009
कश्मीर में भुखमरी है क्या ?
मैं रोज की तरह आज भी नगर निगम से लौट रहा था, की शास्त्री मार्किट में एक २४ साल का हट्टा - कट्टा कश्मीरी नौजवान मेरे सामने खड़ा हो गया । मैं एक अख़बार लेने पास की दुकान में जा रहा था । कश्मीरी नौजवान के कंधे पर कुल्हाडी थी, हाथ में एक झोला था । मेरे सामने आकर १० रुपए मांगने लगा । बोला, भूखा हूँ । चाय पिला दो । दो दिन से दिहाडी नही की है, मेरे पास एक भी रुपया नही है । मैं हैरान था, मेहनत करने वाले इस युवक पर जो मुझसे पैसे मांग रहा था । मेरे पास १०० रूपये का एक ही नोट था, मैं देना नही चाहता था । और यही हुआ, मैंने उसे आगे टरका दिया ।अचानक मुझे एक फ़ोन का ख्याल आप गया । एक दिन एक महिला का मेरे मोबाइल पर फ़ोन आया की शहर में झुंड के झुंड कश्मीरी लोग घूम रहे हैं, यह उस समय की बात है जब देश में एक के बाद एक बम धमाके हुए थे । महिला ने फ़ोन पर कहा था की ये लोग आतंकवादी हो सकते हैं । मुझसे इन लोगों के बारे में अख़बार में ख़बर लिखवाना चाह रही थी । मुझे यह बात कतई नही जांची । मेहनत मजदूरी करने वाले लोग ऐसा क्यूँ करेंगे ? उसके बाद आज कश्मीरी युवक द्वारा १० रूपये मांगने की घटना ने मुझे एक चीज सोचने पर मजबूर कर दिया । वह यह की क्या कश्मीर में भुखमरी है ? मुझे कश्मीर जाने का कभी मौका नही मिला है , लेकिन इतना जरुर सुना है, पढ़ा है, कि अगर दुनिया में कहीं स्वर्ग है तो वह कश्मीर है । क्या स्वर्ग जैसे जगह का यह हल है ? इस पर जम्मू - कश्मीर कि सरकार के साथ केन्द्र सरकार को भी सोचना चाहिए । आंतक का संताप झेल रहे स्वर्ग को बचाने और कश्मीर के लोगों को रोजगार देने कि पहल करनी चाहिए । कश्मीर का नौजवान जब कुल्हाडी उठा कर लकड़ी कट सकता है , पेट और परिवार चलाने के लिए वह कुछ भी कर सकता है ।सरकारें अगर कुछ करना चाह रही हैं रोजगार मुहैया करवाए, आतंकवाद अपने आप ख़तम हो जाएगा ।
महाबीर सेठ
महाबीर सेठ
Sunday, 18 January 2009
जय हो रहमान

राष्ट्रवादी मिलियनेयर भारतीय फिल्म को बहुप्रतिष्ठत हालीवुड पुरुस्कार 'गोल्डन ग्लोब अवार्ड ' भले ही सर्वश्रेष्ठ सक्रीन प्ले,निर्देशन तथा संगीत के संयुक्त आधार पर मिला हो लेकिन संगीतकार ए.आर.रहमान को मिले इस पुरुस्कार में भारतीयता की जीत है । संवैधानिक रूप से धर्मनिरपेक्ष स्वरूप के बावजूद जब देश में सबकुछ धर्म -जाति और क्षेत्र के आधार पर बांटा जा रहा हो, एसे में रहमान की इस उपलब्धि को राष्ट्र के नाम समर्पित करना कइयों के लिए सबक या प्रेरणास्रोत बन जाना चाहिए । गौर है कि उक्त फिल्म का गुलजार लिखित रहमान का संगीतबद्ध गीत 'जय हो' गाना सर्वश्रेष्ठ मौलिक संगीत रचना के खिताब से नवाजा गया है । निश्चित रूप से रहमान का रचा यह इतिहास उनके भारतीयता में डूब जाने या राष्ट्रयिता से ओत-प्रोत हो जाने का ही परिणाम है । इस दृष्टि से अल्लाह रखा रहमान 'गोल्डन ग्लोब अवार्ड ' जीतने वाले पहले भारतीए हैं । संगीत की रचना के समय भी भारतीयता की कल्पना में खोए रहने वाले रहमान की रचनाएं उनके समर्पण को कई बार प्रकट कर चुकी है । संगीत के इस साधक में भारतीयता को समझने, भारतीयता में डूबने का अंदाज इसी से लगाया जा सकता है कि वह अपने संगीत के लिए कभी छत्तीसगढ़ को जानना चाहते हैं तो कभी गुजरात के गांवों को । कभी वह कश्मीर की वादियों में गुनगुनाया है तो कभी त्रिपुरा की तराइयों में उसकी कल्पनी पहुंची । जय हो रहमान, जय हो हिंद ....
Subscribe to:
Posts (Atom)