Thursday, 18 September 2008

मोनिका के चालीस प्रेम पत्र-दो


विनोद मुसान
इसके बाद मन में सवाल उठता है आप किसी की निजी बातों को उत्पाद कैसे बना सकते हो? मोनिका ने एक अपराध किया था, जिसकी उसने सजा भी भुगत ली। प्यार करना कौन सा अपराध है। यहां तक कि किसी अपराधी को भी आप प्यार करने से नहीं रोक सकते। मोनिका द्वारा डॉन के नाम से मशहूर अबु सलेम को लिखे गए चालीस प्रेम पत्र उसकी निजी संपत्ति हैं। यह बात और है कि वह आज एक टीवी चैनल के हाथ लग गए। मोनिका के जीवन का चढ़ता सूरज जब सातवें आसमान पर था, तब वह एक गलती कर बैठी और उसे एक अनजाने शख्स से प्यार हो गया। बाद में पता चला कि वह अनजाना शख्स कोई और नहीं बल्कि 'डॉन` है। मोनिका ने गलती की और उसकी सजा भी भुगती और आज भी भुगत रही है। उसके शब्दों में ''आज मेरे पास रहने को एक मकान भी नहीं है, लोग मुझसे डरते हैं। मुझसे अनजाने में कुछ बड़ी गलतियां हो गई, जिन्हें मैं अब ठीक करना चाहती हूं। मैं समाज में फिर से खड़ा होना चाहती हूं, मैं लोगों को बताना चाहती हूं कि मोनिका वैसी नहीं है, जैसा मीडिया में उसे प्रस्तुत किया जाता है।`` खैर मोनिका द्वारा 'बिग बॉस` के घर में कही गई इन बातों इतना तो स्पष्ट हो जाता है, घर का भूला एक बार फिर घर लौटना चाहता है, लेकिन उसकी इस कोशिश में हर बार उसका अतीत उसकेसामने खड़ा हो जाता है। वैसे मैं यहां पर स्पष्ट कर देना चाहता हूं, कि मुझे मोनिका से कोई हमदर्दी नहीं है। मैं भी उसको उतना ही जानता हूं, जितना एक सैलिब्रिटी के बारे में आम लोग जानते हैं। लेकिन पत्रकार होने केनाते नजरे हर व त कुछ न कुछ ढूंढती रहती हैं। इस बार मोनिका के चालीस पत्र सामने आ गए। हर बार मोनिका जब अदालत में पेशी के लिए कैदी वाहन से उतरती थी, मीडिया केकैमरे उसे कैद कर लेते थे। अखबार के दफ्तरों में अकसर उसकी भोली सी सूरत और हर बार नये सूट की चर्चा जरूर होती रही है। लगता था इस रहस्यमय चेहरे के पीछे बहुत कुछ है, जो दुनिया के सामने नहीं आया। व त गुजरा और मोनिका को अदालत ने कुछ हिदायतों के साथ बरी कर दिया। इसके बाद उसकेबारे में खूब छपा, टीवी वालों ने भी खूब मसाला बटोरा। इसके बाद कुछ व त गुजरा और फिर सब सामान्य सा हो गया। लेकिन इस बार बिग बॉस के घर में मोनिका दर्शकों से रू-ब-रू थी। पहले हफ्ते में उसकी चुप्पी ने साधगी का दामन थामे रखा। लेकिन जैसे-जैसे मोनिका ने बोलना शुरू किया, उसके व्यि तत्व का झोल खुलकर सामने आया। इसके बाद लगा कबाब में कंकड़ हैं। तस्वीर उतनी साफ नहीं है, जितनी दिखाई देती है। हमदर्दी बटोरना एक बात है, लेकिन उसे कायम रखने के लिए एि टंग की नहीं एक परिप व व्यि तत्व की जरूरत होती है, जिसमें शायद मोनिका मात खा गई। आगे उसका जीवन किस ओर माे़ड लेगा, यह भी मोनिका का व्यि तगत मामला है, लेकिन मोनिका की जिंदगी को उसकी मर्जी के बगैर जिस तरह से दूसरे लोग उत्पाद बनाकर बाजार में बेच रहे हैं, ऐसा नहीं होना चाहिए।
पत्रकारिता के इस बिगड़ते स्वरूप पर अपनी प्रतिक्रिया अवश्य दें।

Wednesday, 17 September 2008

यह कैसी राष्ट्रीय शर्म?


पिछले कई दिनों से अन्दर बहुत कुछ उबल रहा है। उडीसा में एक अल्पसंख्यक की हत्या राष्ट्रीय शर्म की बात बन जाती है सरकार के लिए, जब एक साल की बच्ची के साथ रेप होता है तो शर्म क्यों नही आती? जब हिंदुस्तान के आवाम युवा और बच्चो के चाहने के बाद भी सत्ता में बैठे लोग उस डाक्टर कलाम को राष्ट्रपति नही बनने नही देते जिनके लिए सब कुछ यह देश इसकी आने वाली जनरेशन है, तो शर्म क्यों नही आती? जब एक लाख लोग बाढ़ में डूब जाते है तो शर्म क्यों नही आती? जब आतंकी निर्दोष नागरिको की हत्या कर देते है, सांप्रदायिक दंगे होते है तो शर्म कहा चली जाती है। सिर्फ़ एक संप्रदाय के लिए शर्म क्यों कि उस संप्रदाय की महिला आज देश की सरकार को चलाती है। मैं इस तरह की हत्या का समर्थन बिल्कुलं नही कर रहा। जो निदनीय है सो है। पर विदेशो से धन ला कर कैसे धर्मान्तरण कराया जा रहा है, उसके परिणाम क्या होंगे, यह भी उन्ही को सोचना है जो राष्ट्रीय शर्म के बयान जारी करते है। धन के बल पर जो हो रहा है उसके सामाजिक परिणाम क्या होंगे यह कौन सोचेगा? ठीक है हम धरम निरपेक्ष हैं इसका अर्थ यही है कि धन और लालच से बदल डालो धरम। मुग़ल काल में भी तो यही हुआ था।यह धन कहा से आ रहा है आप सब जानते है। ऐसे ही दूसरी तरफ़ आतंकवादियों के लिए धन कहा से आ रहा है उसे रोक न पाने पर शर्म क्यों नही आती। जब संसद में दल बदल कराने के लिए दिए नोटों के बण्डल आते है तो भी शर्म नही आती। बस शर्म आती है तो उडीसा की घटना पर। क्या लोग समझते नही है। यह हिदुस्तान है जिसे सिकंदरे आजम ने समझने में गलती नही की थी रास्ता बदल लिया था। अब भी मौका है आप भी बदल डालो बदलना तो उनको भी होगा जो मन्दिर के नाम पर अरबो जमा कर बैठे है। उनका भी कर्तव्य है उन लोगो को मदद करने की जो जीने के लिए धरम बदलने को मजबूर है। पहले इन जिन्दा इमारतो को बचालो पत्थर की तो कभी भी बन जायेगी।

कोई राज ठाकरे को आइना तो दिखाए



महाराष्ट्र में राज ठाकरे की गुंडागर्दी, चुपचाप उसका मुंह देखती मुंबई पुलिस और वोट बैंक के दबाव में अगल-बगल देखते राजनीतिक दलों के बीच पिस रहे हैं मेहनत कर मुंबई को आर्थिक राजधानी का खिताब दिलानेवाले उत्तर भारतीय। मराठियों और-उत्तर भारतीयों का रिश्ता कया सिर्फनफरत का है, दुश्मनी का है?-प्रस्तुत है इसका जवाब देती वरिष्ठ पत्रकार श्री निशीथ जोशी का अमर उजाला से साभार आलेख--

निशीथ
जोशी
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इन दिनों मराठा माणुस का मसला फिर उबाल पर है। कभी भाषा के नाम पर, तो कभी संस्कृति के नाम पर अब मुंबई में अकसर उत्तर भारतीयों पर गाज गिरने लगी है। मराठा माणुस के नाम पर राजनीति करने वालों को यह भी पता नहीं कि शहीद भगत सिंह और सुखदेव के साथ फांसी के फंदे को जिस वीर मराठा ने चूमा था, उस शहीद की जन्मशती चंद दिनों पहले निकल गई। उनका स्मरण करने की बात किसी को याद नहीं आई। वैसे मराठा माणुस की लडाई लडने वालों को याद कराना चाहूंगा कि जब से भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव ने शहादत का चोला पहना था, तब से किसी ने भी उन्हें अलग करने की जुर्रत नहीं की। अंगरेज तो कर ही नहीं पाए, पंजाबियों ने भी ऐसा नहीं होने दिया। फिर आप क्या करेंगे?जया बच्चन द्वारा हिंदी की वकालत करने पर इन्हें गुस्सा भी आता है। लेकिन क्या उन्हें पता नहीं है कि अयोध्या में जन्मे श्रीराम के सच्चे भक्त, सेवक और मित्र हनुमान महाराष्ट्र के नासिक जिले के आंजनेय क्षेत्र की अंजना माता के पुत्र थे? अगर थे, तो राम राज्य से चले आ रहे उत्तर भारत और महाराष्ट्र के रिश्ते को क्या ये चंद राजनेता तोड सकेंगे। जिन गणपति देव का पूजन महाराष्ट्र के घर-घर में होता है, उनके माता-पिता शिव-पार्वती का निवास भी तो उत्तर भारत में है। जिन श्लोकों से गणपति का पूजन होता है, उनकी रचना भी उत्तर भारत में ही हुई है। दो कदम आगे बढें, तो जिन भगवान कृष्ण की जन्माष्टमी पर पूरा महाराष्ट्र दही-हांडी उत्सव में डूब जाता है, उनकी जन्म-भूमि भी उत्तर भारत में ही है। अगर यह सब सत्य है, तो उत्तर भारत और महाराष्ट्र के लोगों के बीच घृणा के बीज क्यों बोए जा रहे हैं?मराठा माणुस के ठेकेदारों को यह नहीं भूलना चाहिए कि शिवाजी ऐसे वीर मराठा थे, जिन्होंने मुगलों के अत्याचार के खिलाफ जो जंग लडी थी, उसमें उत्तर भारतीयों और मराठों के बीच कोई भेद नहीं किया था। इसीलिए शिवाजी की सेना में उत्तर भारत के ऐसे अनेक योद्धा थे, जो उनके लिए हर पल अपने प्राण कुर्बान करने को तैयार रहते थे। क्या ऐसी कमाई करने की क्षमता आप में है? महिलाओं के लिए छत्रपति शिवाजी के मन में बहुत आदर था। नारी को वह मां, बहन और बेटी के रूप में देखते थे। जब 1657 में शिवाजी के कट्टर दुश्मन औरंगजेब के एक गवर्नर मुल्ला अहमद की पुत्रवधू गौहर बानो को उनके कुछ सैनिक उठा लाए थे, तो उसे बाइज्जत उसके घर पहुंचाया था। यह इतिहास बच्चों को पढाया जा रहा है। पता नहीं, राज ठाकरे ने पढा या नहीं। अगर नहीं पढा, तो उन्हें खुद को शिवाजी के पदचिह्नों पर चलने वाला मराठा कहने का हक नहीं है। जया बच्चन उनकी मां की ही उम्र की होंगी, फिर ऐसी महिला के लिए राज ठाकरे जिस तरह के शब्दों का उपयोग करते हैं, उसे सुनकर उन्हें मराठा संस्कृति का संरक्षक कैसे मान लिया जाए?ठीक है। आतंक और डर से कोई आपसे माफी मांग लेगा या फिर चुप्पी साध लेगा। लेकिन किसी से जबरदस्ती सम्मान आप नहीं ले सकते। अमिताभ बच्चन माफी मांगकर अपने बिग बी के कद से और बडे हो गए। वह अपने चहेतों के दिलों पर राज करते हैं। आप सारी ताकत लगाकर भी उनके चहेतों के दिलों से उनके सम्मान और प्यार को कम नहीं कर सकते। इसके उलट आप अपने बारे में कुछ और नफरत ही पैदा करा देते हैं।रही बात फिल्म नगरी मुंबई में होने की, तो मत भूलिए कि वह बॉलीवुड इसलिए बन सकी, क्योंकि उत्तर भारतीय कलाकारों ने भी उसे अपने फन से सींचा है। चाहे वह पृथ्वीराज कपूर का खानदान हो या फिर नरगिस दत्त का। चिर युवा देवानंद हों या महान नायक दिलीप कुमार। मोहम्मद रफी हों या मजरूह सुल्तानपुरी। गीतकार गोपालदास नीरज रहे हों या साहिर लुधियानवी। आज भी बॉलीवुड में जिनका सिक्का चलता है, वह बच्चन परिवार, शाहरुख खान और अक्षय कुमार भी उत्तर भारतीय हैं। अगर इन सबको आपने फिल्म नगरी से निकालने की जुर्रत की, तो क्या आपकी राजनीति बचेगी? रही बात उत्तर भारत और उत्तर भारतीयों की, तो मत भूलिए कि जब मुगलों ने मराठों पर आक्रमण किया था, तो प्राण और धर्म की रक्षा के लिए महाराष्ट्र से पलायन करने वाले हम जैसे कितने चितपावन जोशी, पंत या काले के पूर्वजों को उत्तर भारत की भूमि ने ही अपनी गोद में जगह देकर उनकी पीढियों को सींचा है और सींच रही है। अब बंद कीजिए यह बकवास। नहीं तो लोकतंत्र आपको अपने ‘उचित’ स्थान पर पहुंचा देगा।

Tuesday, 16 September 2008

भारतीय राजनीति और अवैध औलादें

भैया इलाहाबादी
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तो लो भैया हम आ गए, बजा ली है ताल हमने। छोरा गंगा किनारेवाला। जो कुछ दिया है उसी गंगा मैया ने। जिसे पीयरी चढा कर सजनवा से मिलन की बात प्रेमिका कह सकती है। चलो उस पार्टी की बात की जाए, जिसकी अवैध औलादों ने राजनीती को ही गन्दला कर दिया। एक बात तो सब जानते हैं की जब कोई चरित्रहीन हो जाता है तो उसकी औलादें कैसे चरित्रवान रह सकती हैं। यही हाल भारतीय राजनीती में कांग्रेस का है। आजादी के बाद मेरे ख्याल से तीन ही धाराये थीं राजनीती की। एक वाम मार्गी दूसरे दक्षिण मार्गी। तीसरा बीच पटिया याने मध्य मार्गी। यही तीसरे कांग्रेसी कहलाते हैं। जब भी टूटे तो यही टूटे। नए कुनबे बनते गए। सब चिल्लाते रहे तुम चरित्र हीन हो, बेईमान हो कांग्रेस, कोई सुनाता क्यों। जब जमींदारों ने नहीं सुना और ताकत के नशे में मगरूर रहे तो तुम भी तो वही थे। पार्टी से बड़े नेता हो गए। आज भी वही हाल है। पार्टी की नयी नयी औलादें पैदा होती रहीं। नहीं तो कहाँ से आए समाजवादी और अन्य क्षेत्रीय पार्टियाँ। जो एकलव्य की तरह लगातार अभ्यासरत रहे, हाथी पर सवार हो आ गए हैं। अब जब औलाद ही अवैध हैं, तो राजनीती में गन्दगी आयेगी ही। इसलिए हालत ऐसे हैं। पर बाढ़ एक सीमा तक आती है, फ़िर तो पानी वापस जाता ही है। सृष्टि की रचना से लेकर आज तक यही होता आया है। पानी के लौटने के बाद महामारी भी फैलती है पर जमीन बहुत उपजाऊ हो जाती है। भारतीय राजनीती में भी अब पानी वापस जाने की स्थिति है। महामारी और उपजाऊ जमीन की कुछ समय बाद बीमारिया ख़त्म हो जायेंगी और राजनीती में फ़िर ऐसे लोग आयेंगे जो सिस्टम को बदलेंगे न की सिस्टम के गुलाम हों जायेंगे। राजनीती में कितने मोड़ आए। पहले आजादी के मतवाले फ़िर नेताओं के चमचे फ़िर हवाई नेता फ़िर पैसेवाले फ़िर बाहुबली अपराधी अब फ़िर युवा पढ़े लिखे आ रहे हैं। संकेत सुखद है। जय गंगा मैया की।

संवेदनाएँ

जगह -जगह जलते चूल्हे के धूम्र से
उपजी भूख से कुलबुलाती आंते लिए
शीत से पराभूत आती हुई साँझ की चुप्पी में
उस पृथुल रेल स्टेशन की
ठिरती सीड़ियों पर
गूदड़ ओढ़े वह निर्मज्ज -गलदश्रु -पोया
भूल रहा था शनेः-शनेः
शिशिराघात के उद्रेग से
असह्य भूख की निष्ठुर पीड़ा ;
मार-खा माँ से गुम्मा -सा
बैठ उसी समीप नही तिरते जिसके समक्ष
मरिचिज़ल तक
मुस्करा पड़ा
चमकती आंखों से देखकर
आय -गए अघाय पेटों पर अंकल -चिप्स की स्थूल परत
ताकता उसे पा
वह ढचर-काय माता
कचोटता था जिसका ह्रदय माँ होने के अपराध से
और लड़ती ही रही जो जनम भर
दुखों के दारुण यथार्थ विरूद्ध
मुक्त ठहाकों के प्रतिघात से
उस थगित -अवश् -क्षण
हथफेर भर कृशांक में काँप उठी
महाशून्य -सी गहनता में पुत्र को विलीन होता देखकर
विस्मय से देख सुत को
सो रहा था जो प्रथम बार उस काकरव स्थल पर
लिया था जहाँ जनम लाख योनिओपरांत और
गिने भी थे वहीं कुछ क्षण प्रारब्ध के विराम के
चूम उस पैत्रमत्य को वहीं छोड़ वह
ओझल हो गई कहीं किसी शून्य में
और इधर कढ़ रहे थे स्तब्ध जन
मृत संवेदनाये काँधे लिए शनेःशनेः

यानी यह देश तभी तक स्थिर है, जब तक ...?

इस पोस्ट में सबसे पहले मैं हृदय से बधाई देना चाहूंगा उन समाचार चैनलों को जिन्होंने दिल्ली में हुए आतंकी धमाकों की दुखद घड़ी में गृहमंत्री की 'गंभीरता` का खुलासा किया। नेताआें को गिरगिट की तरह रंग बदलते सुना था, लेकिन एक ऐसा नेता जिसमें पार्टी आलाकमान के प्रति वफादारी के अलावा और कोई भी रंग न हो, हर तरह के मसलों से बेपरवाह कपड़े बदलने में जुटा हुआ है। ऐसे में यह शक होने लगता है कि कहीं मंत्री के कपड़े भी धमाकों के खून से सने तो नहीं थे। इस पर यकीन करने को जी तो नहीं करता, लेकिन इतना तो तय है कि देश को खून के और धब्बों से बचाने के लिए ऐसे गृहमंत्री को तुरंत बेशर्मी त्याग कर जिम्मेदारी किसी जिम्मेदार व्यिक्त के हवाले कर देनी चाहिए।
बेशर्मी यहीं खत्म नहीं हो जाती। कांग्रेस के एक प्रवक्ता तो इस 'बफादार मंत्री` के साथ बफादारी निभाने में बेशर्मी की सारी हदें पार करते दिख रहे हैं। यकीन नहीं होता है तो सोमवार को टीवी चैनलों पर दिया उनका यह बयान देखिए- 'ऐसे विकट समय में इस तरह की बातें कर देश में अस्थिरता पैदा करने की कोशिश की जा रही है।` यानी यह देश तभी तक स्थिर है, जब तक मंत्री जी पल-पल कपड़े बदलते रहेंगे। जिन टीवी चैनलों और पत्रकारों को हम बधाई दे रहे हैं, प्रवक्ता महोदय के शब्दों में वे देश में अस्थिरता पैदा करने की कोशिश कर रहे हैं।
इन बेशर्मों की जमात के साथ खड़े लालू प्रसाद यादव भी बधाई के पात्र हैं, जिन्होंने कुछ दो टूक तो कुछ इशारों-इशारों में काफी कुछ कह दिया। मंत्रिमंडल की तुरंत बैठक बुलाने और इस गंभीर मसले का ठोस हल निकालने की लालू की मांग सराहनीय है।
'बफादारों` की इस बेशर्मी पर या कहेंगे आप? सवाल देश को खून के और धब्बों से बचाने का है।

Monday, 15 September 2008

हिन्दीं हैं हम, वतन है हिंदोस्तां हमारा

विनोद मुसान
जिस तरह एकता कपूर नहीं जानती कि वह महिलाआें को केंद्रबिंदु बनाकर एक के बाद एक धारावाहिक बनाकर उनका कितना बुरा कर रही हैं, ठीक उसी तरह वर्तमान पीढ़ी के पत्रकार हिन्दी को किस गर्त में ले जा रहे हैं, वह भी नहीं जानते। पत्रकारिता का नया स्वरूप, जिसे अब ट्रैंड कहा जाता है, हिन्दी को प्रतिदिन दयनीय स्थिति में पहुंचा रहा है। समय की मांग और आम बोलचाल की भाषा में अंग्रेजी की घुसपैठ के नाम पर आज अंग्रेजी के शब्दों को हिन्दी में पढ़ाया जा रहा है। इसे अपमान नहीं तो या कहेंगे? हिन्दी शब्दकोष का खजाना इतना बड़ा है कि हर शब्द की अभिव्यि त केलिए हिन्दी में एक नहीं चार-चार शब्द मौजूद हैं। लेकिन आजकल पत्रकार अंग्रेजी के शब्दों को हिन्दी में गोल-मोल कर ऐसे पेश करते हैं, जैसे अगर इन शब्दों को वाकई में हिन्दी में लिख दिया गया तो अनर्थ हो जाएगा। अंग्रेजी कोई बुरी भाषा नहीं है, हमें इसे भी जानना चाहिए। आखिर यही एक भाषा (अंग्रेजी) है जिसके जरिए हम अंतरराष्ट ्रीय वार्तालाप कर सकते हैं।
ऐसा नहीं है कि हिन्दी का बे़डागरक करने में केवल पत्रकारों या हिन्दी सामाचार पत्रों का ही हाथ है। नेता से लेकर अभिनेता तक, अध्यापक से लेकर अधिकारी तक रोज हिन्दी का कत्ल करते हैं। यहां पर मैं खासकर पत्रकारों की बात इसलिए कर रहा हूं, योंकि मैं भी इसी बिरादरी से जु़डा एक जीव हूं। सामाचार पत्र समाज का आईना होता है। हम, रोज सवेरे पाठकों के सम्मुख जो प्रस्तुत करते हैं, उसे आमतौर पर पत्थर की लकीर मान लिया जाता है। ऐसे मैं जब हम अंग्रेजी के 'शब्द विशेष` को रोज हिन्दी में लिखकर पाठकों को पढ़ाते हैं, तो इसका एक चलन सा निकल पड़ता है। इसके बाद अध्यापक-टीचर, प्र्राचार्य-प्रिंसिपल, विद्यार्थी-स्टूडेंट, कक्षाएं- लास, महाविद्यालय-कालेज, विश्वविद्यालयऱ्यूनिवर्सिटी, बाजार-मार्केट, विज्ञान-साइंस, प्रौद्योगिकी-टे नोलॉजी, कुर्सी-चेयर, मेज-टेबल, समाचार पत्र-न्यूज पेपर, सरकार-गवर्नमेंट, योजना-स्कीम, परियोजना-प्रोजे ट बन जाता है।
ऐसे में यदि किसी पत्रकार भाई से पूछा जाता है कि भाई यों इतना अंग्रेजी केशब्दों का प्रयोग करते हो। तर्क होता है, ''लोकल रीडरस की भावनाआें को ध्यान में रखना पड़ता है और अब तो यही ट्रेंड चल रहा है। आज इसका यूज नहीं करोगे तो पीछे छूट जाओगे। अब तो आम बोलचाल की भाषा में भी बिना अंगे्रजी के घालमेल किए काम ही नहीं चलता। ...और फिर हम कौन सा हिन्दी के ठेकेदार बैठे हैं, अपन को तो बस नौकरी करनी है। चलने दो जैसा चल रहा है।``
चलो मान लिया अब आम बोलचाल की भाषा में बिना अंग्रेजी के काम नहीं चलता, लेकिन लेखनी में हम यों अंग्रेजी का बेजा इस्तेमाल कर रहे हैं। यों नहीं हम हिन्दी को हिन्दी में लिखते। वैसे भी २१वीं सदी में आते-आते हिन्दी अपना मूल स्वरूप तो खो ही चुकी है और हिन्दी की जननी संस्कृत भाषा तो लगभग लुप्तप्राय सी हो गई है। ऐसे में या हमें चिंता नहीं करनी चाहिए कि हम इसके बचे-खुचे स्वरूप को बचाए रखें। हम पत्रकारिता करते हैं और हिन्दी में पत्रकारिता करते हैं। हिन्दी मतलब हिन्दी। इसको बचाना हमारा धर्म भी है और कर्त्यव्य भी। आखिर इसी हिन्दी ने हमें रोजी भी दी है। मैं कहना चाहूंगा, हिन्दी के साथ अंग्रेजी का घालमेल करने वाले उन हिन्दी पत्रकारों से 'दोस्तों हिन्दी को जानो-पहचानों, इससे प्यार करो और इसका विस्तार करो, बताने की जरूरत नहीं है कि यह हमारी राष्ट ्रीय भाषा है। इसमें मिठास भी है और उल्लास भी। फिर यों हिन्दी केसाथ अंग्रेजी की खिचड़ी पकाते हो।
गर्व से कहो -
सारे जहां से अच्छा हिंदोस्तां हमारा
हम बुलबुलें हैं इसकी, ये गुलिस्तां हमारा
हिन्दी हैं हम हिन्दी हैं हम, वतन है हिंदोस्तां हमारा।
हां चलते-चलते बात वहीं खत्म करना चाहूंगा, जहां से मैंने शुरू की थी। शुरू में जिक्र आया था एकता कपूर का। या आपको नहीं लगता, घरों में लड़ाई-झगड़े और साजिश करने के जितने नुख्शे एकता कपूर ने औरतों को सिखा दिए हैं, वे कम नहीं है। कोई अगर एकता कपूर से पूछे तुमने इस समाज को या दिया है। तो शायद वह यह कहने में भी गुरेज न करे कि मैंने नारी का असली चेहरा परदे पर ला दिया। योंकि एकता जो कुछ अपनी धारावाहिकों में दिखाती है, उसके लिए वही सच्चाई है।