यह मीडिया के चुतियापे का समय है। इस शब्द का इस्तेमाल इसलिए कर रहा हूँ क्योंकि अपनी हरकतों से मीडिया अपनी विश्वसनीयता खो रहा है। चुनाव में हिन्दी के कई ..बड़े अख़बारों ने पैसे लेकर विज्ञापन नुमा न्यूज़ छापी। पाठकों को बेवकूफ समझा। एक ही पेज पर एक ही साथ कई लोगों को जिताया. जाहिर है की पाठक उनकी पिछवारे पर आज नहीं तो कल लात मारेंगे । भला हो अमर उजाला का जिसने कई दिक्कतों के बावजूद इस चुनाव में पैसे लेकर खबरें छापने से इंकार कर मीडिया की इज्जत बचायी।
कई संसथान संपादको की जगह मैनेजरों को बिठाकर कबाडा कर रहे है। कई रिपोर्टरों को विज्ञापन के टारगेट दे रहे हैं और वे भी परम कुत्ता भाव से खबरों की जगह क्लाइंट को सूंघते फ़िर रहे है। कई पत्रकार की जगह दलाल या लाइजनर बन गए है। तो मीडिया को बेडा गर्क होने से कौन बचायेगा।