धर्मबीर वामपंथी संगठन के काडर होने के बावजूद सामाजिक संबंधों पर स्वंत्र नजरिया रखते हैं। हरियाणा और पंजाब में हरित क्रांति की चकाचौंध के बीच सामाजिक संबंधों में विद्रूपता पर उनकी टिपण्णी सामाजिक व्यवस्था की जड़ों की ओर फिर से देखने और सोचने को विवश करता है।
धर्मबीर
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लगभग एक दशक पहले जब कैथल जिले के शिमला गांव में एक प्रेमी जोड़े को तालीबानी अंदाज में पत्थरों से पीट-पीट कर मार डाला गया तो मामला कुछ दिन अखबारों की सुरखी बनकर दब गया। मगर जब असंडा व जोणधी में प्रेम विवाह करने वाले दम्पति को करीबी गोत्र का बताकर राखी बंधवाकर भाई-बहन घोषित किया तो हरियाणा भी उस बहस का हिस्सा बनने लगा जो अक्सर हरित क्रांति वाले क्षेत्रों में सामाजिक सम्बंधों को लेकर उठती रही है। हरित क्रंाति के क्षेत्र पंजाब, हरियाणा व पश्चिमी उत्तर प्रदेश के बारे में बौद्धिक हल्कों में यह विचार सर्वमान्य है कि हरित क्रांति ने यहां के सामाजिक सम्बंधों में बदलाव ला दिया है। मगर हाल ही में करोड़ा गांव के मनोज-बबली व बल्ला गांव के अनीता-सतीश की हालिया हत्याऐं फिर से उस सवाल को उठा रही है। ७०-८० के दशक में शुरू हरित क्रांति ने बहुत से बुद्धिजीवीयों को भ्रम में डाल दिया। ये बुद्धिजीवी हरित क्रांति से भूमि सुधारों का सपना पाले हुए थे जबकि सच्चाई इसके विपरित थी।
हरित क्रांति ने खाद, बीज व कीटनाशक बनाने वाली कम्पनियों के बाजार को तो विस्तार दिया लेकिन भूमि सम्बंधों में कोई बदलाव नही आया। फलस्वरूप हरियाणा का ग्रामीण परिवेश परम्परागत सांमती सम्बंधों मंे जकड़ा रहा। खाप पंचायतों के ये फैसले और रोजबरोज होने वाली प्रेम हत्याओं की जड़ इसी अर्धसामंती व्यवस्था और उससे उपजी मानसिकता की अभिव्यक्ति है। ग्रामीण हरियाणा में भूमि जोतों का आकार आज भी भूमि सुधारों की जरूरत को दर्शाता है। जमीनदारी उन्मूलन कानून व भू-हदबन्दी जैसे कानून के अस्तित्व में आए ५० साल से अधिक होने पर भी हरियाणा में सैंकड़ों एकड़ वाले भू-स्वामी मौजूद है जो ग्रामीण हरियाणा में इन निरंकुश खाप पंचायतों का प्रतिनिधित्व करते हैं। ये खाप पंचायतें ही ग्रामीण हरियाणा में वास्तविक सत्ता का स्वरूप है।
भूमि कानूनों के निष्फल होने का प्रमुख कारण यहां किसी ऐसे जनआन्दोलन की अनुपस्थिति है जिसके निशाने पर सामंती व्यवस्था रही हो। मुजारा आन्दोलन के समय जरूर कुछ छिटपुट घटनाएं हुई थी। १९६७ में जमीन जोतने वाले की नारे के साथ उठा नक्सलवादी आन्दोलन भी यहां कोई दस्तक नही दे पाया। पंजाब में इसका कुछ असर जरूर दिखाई दिया। सामाजिक संगठनों की बात छोड़ भी दी जाये तो खुद सरकारी आंकड़े भूमि सुधारों की मंथर गति को दर्शाते हैं।
यह सच है कि सरकारी आंकड़े सच्चाई को हमेशा ही धुंधला पेश करते हैं फिर भी २००१ के सांख्यिकी सारांश में दिए आंकड़े भूमि सम्बंधों को समझने में समझने में महत्वपूर्ण स्त्रोत हैं। इसके मुताबिक हरियाणा में एक से ढाई एकड़ वाले १४,३६,००० किसानों के पास कुल कृषि योग्य जमीन का मात्र ११ प्रतिशत हिस्सा है। ढाई से सात एकड़ वाले ९,४२,००० मध्यम किसानों के पास कुल कृषि योग्य जमीन का २६ प्रतिशत हिस्सा है। ये गरीब और मध्यम किसान हरियाणा के कुल किसानों का ७८ प्रतिशत हिस्सा बनते हैं। इस तरह देखा जाए तो ७८ प्रतिशत किसानों के पास कुल कृषि योग्य जमीन का मात्र ३७ प्रतिशत हिस्सा है। शेष ६७ प्रतिशत हिस्से पर २२ प्रतिशत धनी किसान व बड़े जमीनदार काबिज हैं।
हरियाणा में भू-हदबन्दी की सीमा १८ एकड़ है। १८ एकड़ से अधिक एकड़ वाले किसानों की जमीनदार की श्रेणी में रखा गया है। भू-हदबन्दी कानून के मुताबिक १८ एकड़ से अधिक जमीन का अधिग्रहण करके भूमिहीनों में वितरण होना चाहिए। सबसे चौंकाने वाला आंकड़ा इसी सीमा से अधिक के किसानों का है। हरियाणा में १,४३,४७० ऐसे जमीनदार हैं जिनके पास हदबन्दी की सीमा से अधिक जमीन है। इसमें भी ७,६२८ जमीनदार तो उस श्रेणी के हैं जिनके पास न्यूनतम ५० एकड़ जमीन है और अधिकतम की कोई सीमा नही है। ये ४ प्रतिशत जमीनदार कुल कृषि योग्य जमीन के लगभग २८ प्रतिशत हिस्से पर काबिज हैं और ग्रामीण क्षेत्रों में वास्तविक सत्ता को नियंत्रित करते हैं। खाप पंचायतों के निरकंुुश फैसले और दलित पिछड़ों के सामाजिक बहिष्कार के फतवे इन्ही के इशारे पर जारी किए जाते है। आर्थिक तौर पर सशक्त होने के साथ-साथ जातिय तौर पर भी प्रभावशाली होने के कारण कोई भी राजनीतिक पार्टी इनके विरोध का साहस नही कर पाती।
कृषि योग्य भूमि के कुछ हाथों में केन्द्रित होने के कारण जहां भू-संख्यक आबादी, बेरोजगारी व अर्ध बेरोजेगारी की स्थिति में गुजर-बसर कर रही है वहीं समाज के लोकतांत्रीकरण की प्रक्रिया भी अधर में है। भूमि सुधारों को ईमानदारी से लागू करके ग्रामीण हरियाणा को भूखमरी, बेरोजगारी व इन निरंकुश खाप पंचायतों से छुटकारा दिलाया जा सकता है। लेकिन क्या वर्तमान संसदीय पार्टियों से ऐसी राजनीतिक इच्छा शक्ति की उम्मीद करना बेमानी नही होगा?
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Monday, 16 June 2008
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