तवी के सन्नाटे को सुबह श्रद्धालुआें के जयकारों ने ताे़डा
जम्मू। सांबा एनकाउंटर, रामगढ़ से टर में अमरनाथ यात्रा पर हमला करने आए आतंकियों की गिरफ्तारी, किश्तवाड़ में ग्रेफ के लेफ्िटनेंट कर्नल समेत पांच लोगों की हत्या। यात्रा शुरू होने से पूर्व आतंकियों द्वारा पिछले एक महीने में श्रद्धालुआें को खौफजदा बनाने और यात्रा को बाधित करने के लिए यह साजिशें रची गई। अमरनाथ यात्रा के पहले जत्थे में शामिल २८३७ श्रद्धालुआें की बाबा बर्फानी के प्रति श्रद्धा और आस्था ने इन साजिशों को फ्लाप कर दिया। कुल मिलाकर श्रद्धालुआें के रुझान ने साबित कर दिया कि आतंकवाद पर आस्था और श्रद्धा भारी पड़ी। शिविर में मौजूद श्रद्धालुआें की जुबान पर हर हर महादेव और भोले बाबा का उत्साह वर्धक जयकारा भी यहीं संदेश दे रहा था।
अमरनाथ यात्रा पर आए श्रद्धालु भोले बाबा के प्रति श्रद्धा, विश्वास और आस्था का मुकाबला आतंकवाद से करने को राजी नहीं थे। हर श्रद्धालु सब कुछ भोले बाबा पर छाे़ड कर बेखौफ शिव भ ती के खुमार में लीन था। इससे पूर्व बुधवार रात को दो बजे बजे यात्रा का स्थायी रोशनी से नहा रहा था। एक तरफ तवी नदी का सन्नाटा तो दूसरी तरफ नदी के किनारे पर स्थित शिविर में श्रद्धालुआें की यात्रा संबंधी तैयारी की सुगबुगाहट शुरू हो गई। एक घंटे की शांति के बाद तीन बजे शिविर से बसों में सवार होने की एनाउंसमेंट के साथ ही स्पीकर पर भोले बाबा के भजनों के कैसेट बजने लगे। सुबह की हलकी ठंडक इस दौरान भोले बाबा के जयकारों के साथ गर्मी में तबदील हो गई। शिविर के आस-पास लगी सभी हाई मास्क लाइटों को भी आन होते ही श्रद्धालुआें के सामान की सुरक्षा जांच और बसों में सीटों की बुकिंग का सिलसिला अपने अपने काउंटरों पर शुरू हो गया। हाई मास्क लाइटों समूचा यात्री निवास परिसर और आधार शिविर मानो रोशनी से नहा रहा था। सवा तीन बजे से ही निजी वाहनों वाले श्रद्धालु अपने वाहनों में सवार होकर सुरक्षा जांच के बाद रवाना होने के लिए जत्थे की कतार में लग गए।
इस दौरान आला पुलिस और प्रशासनिक अधिकारियों का शिविर में पहुंचकर मुआयना करने का सिलसिला भी शुरू हो गया। शिविर के चारों तरफ बनाए गए टावरों पर जवानों की तैनाती के अलावा अंधेरे में सादी वर्दी में सर्च लाइट लेकर भी जवानों को तैनात किया गया था। नई दिल्ली, राजस्थान, उत्तराखंड, गुजरात, पंजाब, हरियाणा, मध्य प्रदेश और उत्तर प्रदेश आदि राज्यों से आए श्रद्धालुआें लेख राज, नरेश श्रवण, सरवेश कुमार, भगत सिंह और संदीप सोलंकी का कहना था कि आतंकवाद की तुलना भोले बाबा से नहीं की जा सकती। हर जगह आतंकवाद है, इसलिए आस्था और श्रद्धा के कारण उन्होंने सब कुछ भोले बाबा पर छाे़ड दिया है। जो भोले बाबा करेंगे, वहीं हमे मंजूर है।
Wednesday, 18 June 2008
ई-मेल जी की जय हो
ई-मेल जी की जय हो
-थपलियाल राजीव
ई-मेल जी आपकी जय हो। आप न होते तो हम इ कीसवीं सदी में होते हुए भी न होते। आपके पदार्पण से बहुत कुछ बदल गया है। आपने आते ही कबूतर जा-जा के जमाने को लात जमाकर हमें चकाचक इंटरनेटी युग को पटक दिया। पहले प्यार मोहब्बत करने वाले झाड़ियों को तलाशा करते थे कि उसकी छांव तले एक-दूसरे को निहार सकंे। उनकी धड़कने शताब्दी की माफिक भागा करती थी कि कहीं कोई कटखना मानवजात उन्हें देख न ले। प्यार की शीतलता में भय की गर्मी। यानी परिणाम मौत।
लेकिन, आपने प्रेमी-प्रेमिकाआें को मौत के भय से दूर कर दिया है। वे अपने-अपने घर बैठे ही आपको 'अंगुलिकाआें` की छुअन मात्र से एक-दूसरे के दीदार पलक झपकते कर सकते हैं। फिर वे चाहें जितनी बतियां चाटा करें, दीवारों के कानों को फुस्फुसाहट तक पल्ले नहीं पड़ने वाली।
आपने शांति स्थापना में क्रांतिकारी परिवर्तन ला दिया है। सतयुग था तो सिंहासन की लड़ाई में इंद्र को हर व त वज्र लेकर पंगा करने को तैयार रहना पड़ता था। संचार के साधन के रूप में नारद महाराज को खबरें लेकर हर पल स्वर्ग से मृत्युलोक और मृत्युलोक से बैकुंठ का च कर लगाने होते थे। भागते-भागते दम फूल जाता था और सांसे उखड़ने लगती थी पर बॉस का आर्डर था कि पांव रुकनेे नहीं चाहिए। बेचारे!
त्रेतायुग आया तो उसमें भी जमीन-सिंहासन को लेकर भिड़ंत होने का क्रम जारी रहा। इस युग में अग्निवाण-ब्रह्मास्त्र के जरिए मामले सुलटाए गए। मैसेज के लिए वानरों का सहयोग लिया गया। लेकिन, इस झमेले में संदेशकर्ता को डर अलग रहता था कि कहीं कपि महाराज ने किसी आश्रम के बगीचे में ठंू-ठां कर दी दी तो ऋषि-मुनि का श्राप झेलना होगा।
द्वापर युग में आकाशवाणियों ने काम चलाया। इसमें भी पंगा कि गलत मौके पर बोल गई तो दुल्हा-दुल्हन जा पहंुचे कैद में।
लेकिन, कलियुग में आपने इस सब झंझटों से मुि त दिलवा दी। अब खून-खच्चर के बजाय शुद्ध अहिंसावादी तरीका अपनाया जाने लगा है। कभी सुई की नोक के बराबर जमीन के लिए महाभारत हो गया था, लेकिन आज आपकी बदौलत दौलत के लिए कहीं भी भाइयों में अस्त्र-शस्त्र नहीं उठ रहे हैं। शब्द वाणों से काम चलाया जा रहा है और दोनों पक्ष एक-दूसरे को परास्त करने के लिए कंप्यूटरवा के मार्फत ई-मेल भेज रहे हैं। एक पक्ष ई-मेल से हमला करता है तो दूसरा भी जवाबी ई-मेल करता है। इस आघात में न कहीं र त बहता है और न कहीं सिर कटता है। मगर, हमले का उ ेश्य पूरा हो जाता है सामने वाला पक्ष बिलबिलाते हुए शीश झुका लेता है। अगर, उसकेपास फालतू का टाइम हो और जंग को लंबा चलाना चाहे तो भी नो प्राबलम। उसके तरकश के बाण खत्म नहीं होंगे।
इस प्रकार हे ई-मेल! प्रेम और शांति केे क्षेत्र में दिए योगदान के लिए हम आपके समक्ष नतमस्तक हैं। सची-मुची में दिल से समर्पित प्रेमिका की भांंति आपकी मंगलकामना करते हुए जय-जैकार करते हैं।
-थपलियाल राजीव
ई-मेल जी आपकी जय हो। आप न होते तो हम इ कीसवीं सदी में होते हुए भी न होते। आपके पदार्पण से बहुत कुछ बदल गया है। आपने आते ही कबूतर जा-जा के जमाने को लात जमाकर हमें चकाचक इंटरनेटी युग को पटक दिया। पहले प्यार मोहब्बत करने वाले झाड़ियों को तलाशा करते थे कि उसकी छांव तले एक-दूसरे को निहार सकंे। उनकी धड़कने शताब्दी की माफिक भागा करती थी कि कहीं कोई कटखना मानवजात उन्हें देख न ले। प्यार की शीतलता में भय की गर्मी। यानी परिणाम मौत।
लेकिन, आपने प्रेमी-प्रेमिकाआें को मौत के भय से दूर कर दिया है। वे अपने-अपने घर बैठे ही आपको 'अंगुलिकाआें` की छुअन मात्र से एक-दूसरे के दीदार पलक झपकते कर सकते हैं। फिर वे चाहें जितनी बतियां चाटा करें, दीवारों के कानों को फुस्फुसाहट तक पल्ले नहीं पड़ने वाली।
आपने शांति स्थापना में क्रांतिकारी परिवर्तन ला दिया है। सतयुग था तो सिंहासन की लड़ाई में इंद्र को हर व त वज्र लेकर पंगा करने को तैयार रहना पड़ता था। संचार के साधन के रूप में नारद महाराज को खबरें लेकर हर पल स्वर्ग से मृत्युलोक और मृत्युलोक से बैकुंठ का च कर लगाने होते थे। भागते-भागते दम फूल जाता था और सांसे उखड़ने लगती थी पर बॉस का आर्डर था कि पांव रुकनेे नहीं चाहिए। बेचारे!
त्रेतायुग आया तो उसमें भी जमीन-सिंहासन को लेकर भिड़ंत होने का क्रम जारी रहा। इस युग में अग्निवाण-ब्रह्मास्त्र के जरिए मामले सुलटाए गए। मैसेज के लिए वानरों का सहयोग लिया गया। लेकिन, इस झमेले में संदेशकर्ता को डर अलग रहता था कि कहीं कपि महाराज ने किसी आश्रम के बगीचे में ठंू-ठां कर दी दी तो ऋषि-मुनि का श्राप झेलना होगा।
द्वापर युग में आकाशवाणियों ने काम चलाया। इसमें भी पंगा कि गलत मौके पर बोल गई तो दुल्हा-दुल्हन जा पहंुचे कैद में।
लेकिन, कलियुग में आपने इस सब झंझटों से मुि त दिलवा दी। अब खून-खच्चर के बजाय शुद्ध अहिंसावादी तरीका अपनाया जाने लगा है। कभी सुई की नोक के बराबर जमीन के लिए महाभारत हो गया था, लेकिन आज आपकी बदौलत दौलत के लिए कहीं भी भाइयों में अस्त्र-शस्त्र नहीं उठ रहे हैं। शब्द वाणों से काम चलाया जा रहा है और दोनों पक्ष एक-दूसरे को परास्त करने के लिए कंप्यूटरवा के मार्फत ई-मेल भेज रहे हैं। एक पक्ष ई-मेल से हमला करता है तो दूसरा भी जवाबी ई-मेल करता है। इस आघात में न कहीं र त बहता है और न कहीं सिर कटता है। मगर, हमले का उ ेश्य पूरा हो जाता है सामने वाला पक्ष बिलबिलाते हुए शीश झुका लेता है। अगर, उसकेपास फालतू का टाइम हो और जंग को लंबा चलाना चाहे तो भी नो प्राबलम। उसके तरकश के बाण खत्म नहीं होंगे।
इस प्रकार हे ई-मेल! प्रेम और शांति केे क्षेत्र में दिए योगदान के लिए हम आपके समक्ष नतमस्तक हैं। सची-मुची में दिल से समर्पित प्रेमिका की भांंति आपकी मंगलकामना करते हुए जय-जैकार करते हैं।
बाप से चार जूता आगे
बाप से चार जूता आगे
पड़ोस में रहने वाले रामभरोसे मालपानी जब अपने सुपुत्र के टीचर से मिलने पहुंचे, तो टीचर ने थोड़ी देर उन्हें घूरा और फिर बोली, 'ऐसा कीजिए, अपने सुपुत्र करमचंद मालपानी को किसी दूसरे स्कूल में दाखिला दिलवा दें। अब उसे इस स्कूल में ज्यादा दिन तक बरदाश्त नहीं किया जा सकता है।` मालपानी जी ने दांत निपोरते हुए कहा, 'मैडम, आखिर मेरे बेटे ने ऐसा या किया कि आप उसे रेस्टीकेट करने पर तुली हुई हैं।`
'देखिये, आपका बेटा भी आपकी तरह कुछ ज्यादा ही प्रतिभावान है। मैथ वाली टीचर मिस सिन्हा बता रही थीं कि पैरेंट्स-टीचर मीटिंग में जब भी आप आते हैं, तो उनसे चोंच लड़ाने की कोशिश करते हैं। और आपके सुपुत्र...तौबा..तौबा...आपसे भी चार जूता आगे। उसकी उम्र दस साल है, लेकिन फ्लर्ट करता है पांच साल से लेकर बीस साल तक की लड़कियों से। हथेली पर अपना दिल लिए स्कूल की हर छात्रा से 'डेट` पर चलने की गुजारिश करता रहता है। इससे स्कूल की बदनामी और माहौल खराब होता है। ऐसा कीजिए, अब आप पिता-पुत्र इस स्कूल पर मेहरबानी करें और अपने नौनिहाल को यहां से ले जाएं।`
टीचर की बात सुनकर मिस्टर मालपानी भड़क उठे। बोले, 'आप मामले को कुछ ज्यादा ही बढ़ा-चढ़ाकर पेश कर रही हैं। मेरा बेटा मेरी तरह रसिक है, लेकिन बदमाश कतई नहीं है। और अगर रसिक होना गुनाह है, तो इसके लिए भी फिल्म इंडस्ट्री जिम्मेदार है। उसकी इस काबिलियत का विकास फिल्मों से हुआ है। अब बच्चा जैसी फिल्में देखेगा, वैसा ही आचरण करेगा। उसके रोल मॉडल भी तो इमरान हाशमी हैं।`
इतना कहकर मिस्टर मालपानी रुके और बोले, 'आपको इस बात का अंदाजा नहीं है कि मेरा बेटा कितना ऊपर जाएगा। उसने एक साल पहले कहीं किसी अखबार में पढ़ा था कि जल्दी शादी करने में ही समझदारी है योंकि जल्दी शादी करने वाले ज्यादा जीते हैं। सो, वह तभी से जिद कर रहा है कि कैसे भी हो, उसकी शादी करा दी जाए ताकि सौ साल से ऊपर जीने का मौका मिले। ऐसे में बाल विवाह के कानून पचड़े में पड़ने से बेहतर मुझे लड़कियों से फ्लर्ट करने को कहना पड़ा।` मिस्टर मालपानी अपनी रौ में बोलते जा रहे थे और टीचर खड़ी मुंह ताक रही थी।
पड़ोस में रहने वाले रामभरोसे मालपानी जब अपने सुपुत्र के टीचर से मिलने पहुंचे, तो टीचर ने थोड़ी देर उन्हें घूरा और फिर बोली, 'ऐसा कीजिए, अपने सुपुत्र करमचंद मालपानी को किसी दूसरे स्कूल में दाखिला दिलवा दें। अब उसे इस स्कूल में ज्यादा दिन तक बरदाश्त नहीं किया जा सकता है।` मालपानी जी ने दांत निपोरते हुए कहा, 'मैडम, आखिर मेरे बेटे ने ऐसा या किया कि आप उसे रेस्टीकेट करने पर तुली हुई हैं।`
'देखिये, आपका बेटा भी आपकी तरह कुछ ज्यादा ही प्रतिभावान है। मैथ वाली टीचर मिस सिन्हा बता रही थीं कि पैरेंट्स-टीचर मीटिंग में जब भी आप आते हैं, तो उनसे चोंच लड़ाने की कोशिश करते हैं। और आपके सुपुत्र...तौबा..तौबा...आपसे भी चार जूता आगे। उसकी उम्र दस साल है, लेकिन फ्लर्ट करता है पांच साल से लेकर बीस साल तक की लड़कियों से। हथेली पर अपना दिल लिए स्कूल की हर छात्रा से 'डेट` पर चलने की गुजारिश करता रहता है। इससे स्कूल की बदनामी और माहौल खराब होता है। ऐसा कीजिए, अब आप पिता-पुत्र इस स्कूल पर मेहरबानी करें और अपने नौनिहाल को यहां से ले जाएं।`
टीचर की बात सुनकर मिस्टर मालपानी भड़क उठे। बोले, 'आप मामले को कुछ ज्यादा ही बढ़ा-चढ़ाकर पेश कर रही हैं। मेरा बेटा मेरी तरह रसिक है, लेकिन बदमाश कतई नहीं है। और अगर रसिक होना गुनाह है, तो इसके लिए भी फिल्म इंडस्ट्री जिम्मेदार है। उसकी इस काबिलियत का विकास फिल्मों से हुआ है। अब बच्चा जैसी फिल्में देखेगा, वैसा ही आचरण करेगा। उसके रोल मॉडल भी तो इमरान हाशमी हैं।`
इतना कहकर मिस्टर मालपानी रुके और बोले, 'आपको इस बात का अंदाजा नहीं है कि मेरा बेटा कितना ऊपर जाएगा। उसने एक साल पहले कहीं किसी अखबार में पढ़ा था कि जल्दी शादी करने में ही समझदारी है योंकि जल्दी शादी करने वाले ज्यादा जीते हैं। सो, वह तभी से जिद कर रहा है कि कैसे भी हो, उसकी शादी करा दी जाए ताकि सौ साल से ऊपर जीने का मौका मिले। ऐसे में बाल विवाह के कानून पचड़े में पड़ने से बेहतर मुझे लड़कियों से फ्लर्ट करने को कहना पड़ा।` मिस्टर मालपानी अपनी रौ में बोलते जा रहे थे और टीचर खड़ी मुंह ताक रही थी।
भगवान करे सबको अच्छा शिक्षक मिले
अलीगढ़ मुश्लिम विश्वविद्यालय में होने वाले दीक्षांत समारोह की पूर्व संध्या पर मंगलवार को पूर्व राष्ट्रपति डा.अब्दुल कलाम सैकड़ों बच्चों से रू-ब-रू हुए। इस दौरान बच्चों को सपना दिखाते हुए उन्होंने कहा कि हमेशा महान बनने की सोचो। लक्ष्य तय करो, दिक्कतों को अपने ऊपर कभी हावी मत होने दो, बल्कि उस पर शासन करो। खुद की सफलता का श्रेय शिक्षकों को देते हुए मिसाइल मैन के कहा कि मैं आज अपने शिक्षकों की बदौलत ही यहां तक पहुंचा हूं। भगवान करे सबको अच्छा शिक्षक मिले।
डा.कलाम की इस दुआ में कहीं न कहीं यह उनका यह दर्द भी छिपा है कि आज सबको अच्छे शिक्षक नहीं मिल रहे। आर्थिक उदारीकरण के इस दौर में शिक्षा का भी व्यापारीकरण गंभीर चिंता का विषय है। स्कूल से कालेज तक पब्लिक से टर का झंडा बुलंद था ही, अब तो देश भर में निजी विश्वविद्यालय भी खुलने लगे हैं। पैसे के खेल ने शिक्षा को पूरी तरह व्यापार बना दिया है। बच्चे नर्सरी से ही अंग्रेजी शिक्षा पा रहे हैं, लेकिन नैतिक शिक्षा के लिए अब सिलेबस में कोई जगह नहीं है। जो शिक्षा थोपी जा रही है, उसके स्तर का पता इस बात से चल सकता है कि बच्चे अंग्रेजी की किताबें तो धड़ल्ले से पढ़ लेते हैं, लेकिन ग्रामर से दूर होते जा रहे हैं। ऐसे में फिलहाल हम भी यही दुआ करें कि भगवान करे सबको अच्छा शिक्षक मिले।
डा.कलाम की इस दुआ में कहीं न कहीं यह उनका यह दर्द भी छिपा है कि आज सबको अच्छे शिक्षक नहीं मिल रहे। आर्थिक उदारीकरण के इस दौर में शिक्षा का भी व्यापारीकरण गंभीर चिंता का विषय है। स्कूल से कालेज तक पब्लिक से टर का झंडा बुलंद था ही, अब तो देश भर में निजी विश्वविद्यालय भी खुलने लगे हैं। पैसे के खेल ने शिक्षा को पूरी तरह व्यापार बना दिया है। बच्चे नर्सरी से ही अंग्रेजी शिक्षा पा रहे हैं, लेकिन नैतिक शिक्षा के लिए अब सिलेबस में कोई जगह नहीं है। जो शिक्षा थोपी जा रही है, उसके स्तर का पता इस बात से चल सकता है कि बच्चे अंग्रेजी की किताबें तो धड़ल्ले से पढ़ लेते हैं, लेकिन ग्रामर से दूर होते जा रहे हैं। ऐसे में फिलहाल हम भी यही दुआ करें कि भगवान करे सबको अच्छा शिक्षक मिले।
Monday, 16 June 2008
हरित क्रांति पर बुद्धिजीवी भ्रम में
धर्मबीर वामपंथी संगठन के काडर होने के बावजूद सामाजिक संबंधों पर स्वंत्र नजरिया रखते हैं। हरियाणा और पंजाब में हरित क्रांति की चकाचौंध के बीच सामाजिक संबंधों में विद्रूपता पर उनकी टिपण्णी सामाजिक व्यवस्था की जड़ों की ओर फिर से देखने और सोचने को विवश करता है।
धर्मबीर
---------
लगभग एक दशक पहले जब कैथल जिले के शिमला गांव में एक प्रेमी जोड़े को तालीबानी अंदाज में पत्थरों से पीट-पीट कर मार डाला गया तो मामला कुछ दिन अखबारों की सुरखी बनकर दब गया। मगर जब असंडा व जोणधी में प्रेम विवाह करने वाले दम्पति को करीबी गोत्र का बताकर राखी बंधवाकर भाई-बहन घोषित किया तो हरियाणा भी उस बहस का हिस्सा बनने लगा जो अक्सर हरित क्रांति वाले क्षेत्रों में सामाजिक सम्बंधों को लेकर उठती रही है। हरित क्रंाति के क्षेत्र पंजाब, हरियाणा व पश्चिमी उत्तर प्रदेश के बारे में बौद्धिक हल्कों में यह विचार सर्वमान्य है कि हरित क्रांति ने यहां के सामाजिक सम्बंधों में बदलाव ला दिया है। मगर हाल ही में करोड़ा गांव के मनोज-बबली व बल्ला गांव के अनीता-सतीश की हालिया हत्याऐं फिर से उस सवाल को उठा रही है। ७०-८० के दशक में शुरू हरित क्रांति ने बहुत से बुद्धिजीवीयों को भ्रम में डाल दिया। ये बुद्धिजीवी हरित क्रांति से भूमि सुधारों का सपना पाले हुए थे जबकि सच्चाई इसके विपरित थी।
हरित क्रांति ने खाद, बीज व कीटनाशक बनाने वाली कम्पनियों के बाजार को तो विस्तार दिया लेकिन भूमि सम्बंधों में कोई बदलाव नही आया। फलस्वरूप हरियाणा का ग्रामीण परिवेश परम्परागत सांमती सम्बंधों मंे जकड़ा रहा। खाप पंचायतों के ये फैसले और रोजबरोज होने वाली प्रेम हत्याओं की जड़ इसी अर्धसामंती व्यवस्था और उससे उपजी मानसिकता की अभिव्यक्ति है। ग्रामीण हरियाणा में भूमि जोतों का आकार आज भी भूमि सुधारों की जरूरत को दर्शाता है। जमीनदारी उन्मूलन कानून व भू-हदबन्दी जैसे कानून के अस्तित्व में आए ५० साल से अधिक होने पर भी हरियाणा में सैंकड़ों एकड़ वाले भू-स्वामी मौजूद है जो ग्रामीण हरियाणा में इन निरंकुश खाप पंचायतों का प्रतिनिधित्व करते हैं। ये खाप पंचायतें ही ग्रामीण हरियाणा में वास्तविक सत्ता का स्वरूप है।
भूमि कानूनों के निष्फल होने का प्रमुख कारण यहां किसी ऐसे जनआन्दोलन की अनुपस्थिति है जिसके निशाने पर सामंती व्यवस्था रही हो। मुजारा आन्दोलन के समय जरूर कुछ छिटपुट घटनाएं हुई थी। १९६७ में जमीन जोतने वाले की नारे के साथ उठा नक्सलवादी आन्दोलन भी यहां कोई दस्तक नही दे पाया। पंजाब में इसका कुछ असर जरूर दिखाई दिया। सामाजिक संगठनों की बात छोड़ भी दी जाये तो खुद सरकारी आंकड़े भूमि सुधारों की मंथर गति को दर्शाते हैं।
यह सच है कि सरकारी आंकड़े सच्चाई को हमेशा ही धुंधला पेश करते हैं फिर भी २००१ के सांख्यिकी सारांश में दिए आंकड़े भूमि सम्बंधों को समझने में समझने में महत्वपूर्ण स्त्रोत हैं। इसके मुताबिक हरियाणा में एक से ढाई एकड़ वाले १४,३६,००० किसानों के पास कुल कृषि योग्य जमीन का मात्र ११ प्रतिशत हिस्सा है। ढाई से सात एकड़ वाले ९,४२,००० मध्यम किसानों के पास कुल कृषि योग्य जमीन का २६ प्रतिशत हिस्सा है। ये गरीब और मध्यम किसान हरियाणा के कुल किसानों का ७८ प्रतिशत हिस्सा बनते हैं। इस तरह देखा जाए तो ७८ प्रतिशत किसानों के पास कुल कृषि योग्य जमीन का मात्र ३७ प्रतिशत हिस्सा है। शेष ६७ प्रतिशत हिस्से पर २२ प्रतिशत धनी किसान व बड़े जमीनदार काबिज हैं।
हरियाणा में भू-हदबन्दी की सीमा १८ एकड़ है। १८ एकड़ से अधिक एकड़ वाले किसानों की जमीनदार की श्रेणी में रखा गया है। भू-हदबन्दी कानून के मुताबिक १८ एकड़ से अधिक जमीन का अधिग्रहण करके भूमिहीनों में वितरण होना चाहिए। सबसे चौंकाने वाला आंकड़ा इसी सीमा से अधिक के किसानों का है। हरियाणा में १,४३,४७० ऐसे जमीनदार हैं जिनके पास हदबन्दी की सीमा से अधिक जमीन है। इसमें भी ७,६२८ जमीनदार तो उस श्रेणी के हैं जिनके पास न्यूनतम ५० एकड़ जमीन है और अधिकतम की कोई सीमा नही है। ये ४ प्रतिशत जमीनदार कुल कृषि योग्य जमीन के लगभग २८ प्रतिशत हिस्से पर काबिज हैं और ग्रामीण क्षेत्रों में वास्तविक सत्ता को नियंत्रित करते हैं। खाप पंचायतों के निरकंुुश फैसले और दलित पिछड़ों के सामाजिक बहिष्कार के फतवे इन्ही के इशारे पर जारी किए जाते है। आर्थिक तौर पर सशक्त होने के साथ-साथ जातिय तौर पर भी प्रभावशाली होने के कारण कोई भी राजनीतिक पार्टी इनके विरोध का साहस नही कर पाती।
कृषि योग्य भूमि के कुछ हाथों में केन्द्रित होने के कारण जहां भू-संख्यक आबादी, बेरोजगारी व अर्ध बेरोजेगारी की स्थिति में गुजर-बसर कर रही है वहीं समाज के लोकतांत्रीकरण की प्रक्रिया भी अधर में है। भूमि सुधारों को ईमानदारी से लागू करके ग्रामीण हरियाणा को भूखमरी, बेरोजगारी व इन निरंकुश खाप पंचायतों से छुटकारा दिलाया जा सकता है। लेकिन क्या वर्तमान संसदीय पार्टियों से ऐसी राजनीतिक इच्छा शक्ति की उम्मीद करना बेमानी नही होगा?
धर्मबीर
---------
लगभग एक दशक पहले जब कैथल जिले के शिमला गांव में एक प्रेमी जोड़े को तालीबानी अंदाज में पत्थरों से पीट-पीट कर मार डाला गया तो मामला कुछ दिन अखबारों की सुरखी बनकर दब गया। मगर जब असंडा व जोणधी में प्रेम विवाह करने वाले दम्पति को करीबी गोत्र का बताकर राखी बंधवाकर भाई-बहन घोषित किया तो हरियाणा भी उस बहस का हिस्सा बनने लगा जो अक्सर हरित क्रांति वाले क्षेत्रों में सामाजिक सम्बंधों को लेकर उठती रही है। हरित क्रंाति के क्षेत्र पंजाब, हरियाणा व पश्चिमी उत्तर प्रदेश के बारे में बौद्धिक हल्कों में यह विचार सर्वमान्य है कि हरित क्रांति ने यहां के सामाजिक सम्बंधों में बदलाव ला दिया है। मगर हाल ही में करोड़ा गांव के मनोज-बबली व बल्ला गांव के अनीता-सतीश की हालिया हत्याऐं फिर से उस सवाल को उठा रही है। ७०-८० के दशक में शुरू हरित क्रांति ने बहुत से बुद्धिजीवीयों को भ्रम में डाल दिया। ये बुद्धिजीवी हरित क्रांति से भूमि सुधारों का सपना पाले हुए थे जबकि सच्चाई इसके विपरित थी।
हरित क्रांति ने खाद, बीज व कीटनाशक बनाने वाली कम्पनियों के बाजार को तो विस्तार दिया लेकिन भूमि सम्बंधों में कोई बदलाव नही आया। फलस्वरूप हरियाणा का ग्रामीण परिवेश परम्परागत सांमती सम्बंधों मंे जकड़ा रहा। खाप पंचायतों के ये फैसले और रोजबरोज होने वाली प्रेम हत्याओं की जड़ इसी अर्धसामंती व्यवस्था और उससे उपजी मानसिकता की अभिव्यक्ति है। ग्रामीण हरियाणा में भूमि जोतों का आकार आज भी भूमि सुधारों की जरूरत को दर्शाता है। जमीनदारी उन्मूलन कानून व भू-हदबन्दी जैसे कानून के अस्तित्व में आए ५० साल से अधिक होने पर भी हरियाणा में सैंकड़ों एकड़ वाले भू-स्वामी मौजूद है जो ग्रामीण हरियाणा में इन निरंकुश खाप पंचायतों का प्रतिनिधित्व करते हैं। ये खाप पंचायतें ही ग्रामीण हरियाणा में वास्तविक सत्ता का स्वरूप है।
भूमि कानूनों के निष्फल होने का प्रमुख कारण यहां किसी ऐसे जनआन्दोलन की अनुपस्थिति है जिसके निशाने पर सामंती व्यवस्था रही हो। मुजारा आन्दोलन के समय जरूर कुछ छिटपुट घटनाएं हुई थी। १९६७ में जमीन जोतने वाले की नारे के साथ उठा नक्सलवादी आन्दोलन भी यहां कोई दस्तक नही दे पाया। पंजाब में इसका कुछ असर जरूर दिखाई दिया। सामाजिक संगठनों की बात छोड़ भी दी जाये तो खुद सरकारी आंकड़े भूमि सुधारों की मंथर गति को दर्शाते हैं।
यह सच है कि सरकारी आंकड़े सच्चाई को हमेशा ही धुंधला पेश करते हैं फिर भी २००१ के सांख्यिकी सारांश में दिए आंकड़े भूमि सम्बंधों को समझने में समझने में महत्वपूर्ण स्त्रोत हैं। इसके मुताबिक हरियाणा में एक से ढाई एकड़ वाले १४,३६,००० किसानों के पास कुल कृषि योग्य जमीन का मात्र ११ प्रतिशत हिस्सा है। ढाई से सात एकड़ वाले ९,४२,००० मध्यम किसानों के पास कुल कृषि योग्य जमीन का २६ प्रतिशत हिस्सा है। ये गरीब और मध्यम किसान हरियाणा के कुल किसानों का ७८ प्रतिशत हिस्सा बनते हैं। इस तरह देखा जाए तो ७८ प्रतिशत किसानों के पास कुल कृषि योग्य जमीन का मात्र ३७ प्रतिशत हिस्सा है। शेष ६७ प्रतिशत हिस्से पर २२ प्रतिशत धनी किसान व बड़े जमीनदार काबिज हैं।
हरियाणा में भू-हदबन्दी की सीमा १८ एकड़ है। १८ एकड़ से अधिक एकड़ वाले किसानों की जमीनदार की श्रेणी में रखा गया है। भू-हदबन्दी कानून के मुताबिक १८ एकड़ से अधिक जमीन का अधिग्रहण करके भूमिहीनों में वितरण होना चाहिए। सबसे चौंकाने वाला आंकड़ा इसी सीमा से अधिक के किसानों का है। हरियाणा में १,४३,४७० ऐसे जमीनदार हैं जिनके पास हदबन्दी की सीमा से अधिक जमीन है। इसमें भी ७,६२८ जमीनदार तो उस श्रेणी के हैं जिनके पास न्यूनतम ५० एकड़ जमीन है और अधिकतम की कोई सीमा नही है। ये ४ प्रतिशत जमीनदार कुल कृषि योग्य जमीन के लगभग २८ प्रतिशत हिस्से पर काबिज हैं और ग्रामीण क्षेत्रों में वास्तविक सत्ता को नियंत्रित करते हैं। खाप पंचायतों के निरकंुुश फैसले और दलित पिछड़ों के सामाजिक बहिष्कार के फतवे इन्ही के इशारे पर जारी किए जाते है। आर्थिक तौर पर सशक्त होने के साथ-साथ जातिय तौर पर भी प्रभावशाली होने के कारण कोई भी राजनीतिक पार्टी इनके विरोध का साहस नही कर पाती।
कृषि योग्य भूमि के कुछ हाथों में केन्द्रित होने के कारण जहां भू-संख्यक आबादी, बेरोजगारी व अर्ध बेरोजेगारी की स्थिति में गुजर-बसर कर रही है वहीं समाज के लोकतांत्रीकरण की प्रक्रिया भी अधर में है। भूमि सुधारों को ईमानदारी से लागू करके ग्रामीण हरियाणा को भूखमरी, बेरोजगारी व इन निरंकुश खाप पंचायतों से छुटकारा दिलाया जा सकता है। लेकिन क्या वर्तमान संसदीय पार्टियों से ऐसी राजनीतिक इच्छा शक्ति की उम्मीद करना बेमानी नही होगा?
Thursday, 12 June 2008
बिहारी मजदूरों के आगे गिड़गिड़ाए पंजाबी किसान

पंजाब में पूरबिए-१
बिहार के विकास और पंजाब की खेती में या संबंध है? यह सवाल बेमानी नहीं है। अभी पंजाब के किसान अपनी खेती को लेकर चिंतित हैं। कारण है बिहार में चल रहे विकास कार्य। बिहार में निर्माण कार्यो के कारण बेरोजगारों को लगातार काम मिल रहा है। उसकी वजह से वे मजदूर जो पंजाब का रूख करते थे इस बार बिहार आने पर नहीं लौटे। इससे पंजाब में धान की रोपाई के लिए मजदूरों का संकट हो गया। कई अखबारों ने एक फोटो छापी कि जालंधर रेलवे स्टेशन पर एक संपन्न किसान विपन्न से दिख रहे मजदूर को हाथ जोड़कर रोक रहा है। हाथ जोड़ने का कारण है कि यहां की खेती और इंडस्ट्री बिहारऱ्यूपी के मजदूरों पर निर्भर है। आतंकवाद के समय में भी जब स्थानीय लोग खेतों पर नहीं जाते थे या पलायन कर गए थे तब भी इन्हीं मजदूरों ने यहां की अर्थव्यवस्था को संभाले रखा। हरित क्रांति की नींव बिहार यूपी के मजदूरों की मेहनत पर ही रखी गई। उस दौरान बिहार यूपी के काफी मजदूर आतंकियों की गोलियोंं के शिकार बने लेकिन इसके बदले उन्हें कोई महत्व नहीं मिला। पुलिस ने भी उनकी हत्याआें को अपने रिकार्ड में दर्ज नहीं किया। कोई सामाजिक संस्था या व्यि त भी नहीं दिखता जो पंजाब में पूरबियों की स्थिति पर जमीनी तौर पर काम कर रहा हो। यहां के विकास में इस योगदान के बावजूद पंजाब में बिहारऱ्यूपी के लोगों को भैय्ये कहा जाता है। ये बड़े भाई के समान आदर भाव वाला शब्द नहीं है। इसे वे गाली के सेंस में प्रयोग करते हैं। उ्न्हें भैय्यों की जरूरत है, वे उस पर भरोसा भी करते हैं पर यह बर्दाश्त नहीं करते कि वह मजदूर के स्तर से उपर का जीवन जीए।
Thursday, 5 June 2008
राशन की तरह रसोई गैस-डीजल दे सरकार
केंद्र की मनमोहन सिंह सरकार ने पेट्राल, डीजल और रसोई गैस की कीमतों में क्रमश: ५, ३ और ५० रुपये की बढ़ोतरी कर दी है। सरकार ने यह मूल्य वृद्धि इसलिए की है, योंकि अंतरराष्ट ्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमत १३१ डालर प्रति बैरल तक पहंुच गई है। जाहिर है कि ऐसी स्थिति में सार्वजनिक तेल कंपनियों को जबरदस्त घाटा उठाना पड़ रहा था। सरकार भी असमंजस में थी। एक तरफ कंपनियों का घाटा था, तो दूसरी तरफ लोकसभा चुनाव। मूल्य वृद्धि का मतलब है कि महंगाई और बढ़ेगी, जोकि पहले से ही आसमान छू रही है। ऐसे में कांग्रेस का हाल लोकसभा चुनाव में कर्नाटक जैसा ही होगा। फिर भी सरकार ने यह कठोर फैसला लिया है और प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने देश को समझाने के लिए राष्ट ्र को संबोधित भी किया। उनका कहना है कि फैसला सुनहरे भविष्य के लिए लिया गया है। यह देश हित में है।
बहरहाल, सरकार का तर्क अपनी जगह है और विरोधियों का अपनी जगह। जनता की नाराजगी भी अपनी जगह है। लेकिन एक तरह से सरकार गलत नहीं है। आखिर वह कब तक तेल पर सब्सिडी देती रहेगी? पेट्रोल में पांच रुपये बढ़ जाने से कोई कार या मोटरसाइकिल चलाना नहीं छाे़ड देगा। वैसे भी लोग गैरजरूरी कामों के लिए भी इनका इस्तेमाल करते हैं। अब जहां जरूरी हो वहीं उपयोग करें। ऐसे ही रसोई गैस की बात है। महीने में पचास रुपये अतिरि त देने से किसी के बजट में खास फर्क नहींं पड़ेगा। हां, हाय-हाय करने को कोई कितना कर ले। रही बात डीजल की तो उसका दूरगामी असर पड़ सकता है। वह भी इस कारण की कई कार कंपनियों ने अपनी कार डीजल चालित बना दी हैं। विस्तृत केलिए क्लिक करें
बहरहाल, सरकार का तर्क अपनी जगह है और विरोधियों का अपनी जगह। जनता की नाराजगी भी अपनी जगह है। लेकिन एक तरह से सरकार गलत नहीं है। आखिर वह कब तक तेल पर सब्सिडी देती रहेगी? पेट्रोल में पांच रुपये बढ़ जाने से कोई कार या मोटरसाइकिल चलाना नहीं छाे़ड देगा। वैसे भी लोग गैरजरूरी कामों के लिए भी इनका इस्तेमाल करते हैं। अब जहां जरूरी हो वहीं उपयोग करें। ऐसे ही रसोई गैस की बात है। महीने में पचास रुपये अतिरि त देने से किसी के बजट में खास फर्क नहींं पड़ेगा। हां, हाय-हाय करने को कोई कितना कर ले। रही बात डीजल की तो उसका दूरगामी असर पड़ सकता है। वह भी इस कारण की कई कार कंपनियों ने अपनी कार डीजल चालित बना दी हैं। विस्तृत केलिए क्लिक करें
Subscribe to:
Posts (Atom)