Sunday 27 September 2009
Monday 17 August 2009
अपनों के जाने पर होता है दुःख
इस दुनिया में जो भी आया है, सबको जाना है। लेकिन जब कोई अपना चला जाता है तो दुःख होना स्वाभाविक है। गोरखपुर अमर उजाला के संपादक आदरणीय मृत्युंजय जी के पिता जी के इस दुनिया से जाने का समाचार मिला तो काफी दुःख हुआ। दो दिन पहले उन्हें हर्दयाघात हुआ और दुनिया से अलविदा कह गए। उमर के भी करीब ७८ पड़ाव पर कर चुके थे। घर में पोते-पोती, दोहते-दोहती सब है। वे अपने पीछे भरा-पूरा परिवार छोड़ गए है। दुआ करते है भगवान उनकी आत्मा को शान्ति दे।
Sunday 2 August 2009
विरोध का यह कौन सा तरीका है
विनोद के मुसान
विरोध के सौ तरीके हो सकते हैं। लेकिन राष्ट ्रीय अभियान को धता बताकर अपने बच्चों को कुछ लोग पोलियो की दवा सिर्फ इसलिए नहीं पिलाते की उनके गांव में सड़क नहीं बनी या उनके यहां बुनियादी सुविधाआें का अभाव है। तो इसे आप या कहेंगे?
उत्तर-प्रदेश में इस तरह के 'विरोध` आम बात होती जा रही है। अशिक्षा का अंधेरा और जागरूकता की कमी ने राज्य के ग्रामीण क्षेत्रों को उजाले से दूर रखा है। गरीबी रेखा से नीचे दयनीय जीवन व्यापन कर रहे ये लोग नहीं जानते कि ऐसा करके वे कितना बड़ा अपराध कर रहे हैं। इसे अपने ही पैरों पर कुल्हाड़ी मारना नहीं तो और या कहेंगे। पहले ही एक विशेष संप्रदाय के लोग (विशेषकर उत्तर-प्रदेश में) कुछ भ्रांतियों को आधार बनाकर पोलियो ड्राप का विरोध करते रहे हैं, लेकिन अब स्थिति और भयावह होती नजर आ रही है। इस बात में कोई दो राय नहीं है कि हमारे देश के प्रशासनिक ढांचे में तमाम 'होल` मौजूद हैं। यहां व्यवस्थाएं हैं, योजनाएं हैं, नीतियां हैं, लेकिन इन्हें क्रियान्वयन करने वाली तमाम शि तयां भ्रष्ट ाचार केदलदल में गले-गले तक दबी हैं। ऐसे में संचालित हो रही योजनाआें का आधा-अधूरा लाभ भी संबंधित लाभार्थियों को नहीं मिल पा रहा है।
इन हालात में यदि बची-कुची व्यवस्था को भी हम अपने हाथों चौपट कर देंगे, तो कैसे काम चलेगा। देश के नौनिहाल स्वस्थ रहें, वे आगे चलकर एक जिम्मेदार नागरिक बने, इस मंशा को पूरा करने के लिए सरकार तमाम योजनाएं संचालित करती है। राष्ट ्रीय जागरूकता पोलियो अभियान भी इसी मुहिम का एक हिस्सा है। उत्तर-प्रदेश के ग्रामीण क्षेत्रों में अपनी समस्याआें को आगे रखकर अभियान का विरोध तेजी से जोर पकड़ता जा रहा है। यह राष्ट ्रीय चिंता का विषय है। देश के नीति-नियंताआें को इस विषय में गंभीरता से सोचना पड़ेगा। इन क्षेत्रों में जागरूकता के लिए उन बुनियादी बातों को भी जानना जरूरी है, जिनके कारण लोग ऐसा कदम उठा रहे हैं। नहीं तो यह अभियान एक मजाक बनकर रह जाएगा और हमारे बच्चे जागरूकता केअभाव में एक ऐसा जीवन जीने को मजबूर होंगे, जो उन्होंने कभी भी अपने लिए नहीं चुना होगा।
विरोध के सौ तरीके हो सकते हैं। लेकिन राष्ट ्रीय अभियान को धता बताकर अपने बच्चों को कुछ लोग पोलियो की दवा सिर्फ इसलिए नहीं पिलाते की उनके गांव में सड़क नहीं बनी या उनके यहां बुनियादी सुविधाआें का अभाव है। तो इसे आप या कहेंगे?
उत्तर-प्रदेश में इस तरह के 'विरोध` आम बात होती जा रही है। अशिक्षा का अंधेरा और जागरूकता की कमी ने राज्य के ग्रामीण क्षेत्रों को उजाले से दूर रखा है। गरीबी रेखा से नीचे दयनीय जीवन व्यापन कर रहे ये लोग नहीं जानते कि ऐसा करके वे कितना बड़ा अपराध कर रहे हैं। इसे अपने ही पैरों पर कुल्हाड़ी मारना नहीं तो और या कहेंगे। पहले ही एक विशेष संप्रदाय के लोग (विशेषकर उत्तर-प्रदेश में) कुछ भ्रांतियों को आधार बनाकर पोलियो ड्राप का विरोध करते रहे हैं, लेकिन अब स्थिति और भयावह होती नजर आ रही है। इस बात में कोई दो राय नहीं है कि हमारे देश के प्रशासनिक ढांचे में तमाम 'होल` मौजूद हैं। यहां व्यवस्थाएं हैं, योजनाएं हैं, नीतियां हैं, लेकिन इन्हें क्रियान्वयन करने वाली तमाम शि तयां भ्रष्ट ाचार केदलदल में गले-गले तक दबी हैं। ऐसे में संचालित हो रही योजनाआें का आधा-अधूरा लाभ भी संबंधित लाभार्थियों को नहीं मिल पा रहा है।
इन हालात में यदि बची-कुची व्यवस्था को भी हम अपने हाथों चौपट कर देंगे, तो कैसे काम चलेगा। देश के नौनिहाल स्वस्थ रहें, वे आगे चलकर एक जिम्मेदार नागरिक बने, इस मंशा को पूरा करने के लिए सरकार तमाम योजनाएं संचालित करती है। राष्ट ्रीय जागरूकता पोलियो अभियान भी इसी मुहिम का एक हिस्सा है। उत्तर-प्रदेश के ग्रामीण क्षेत्रों में अपनी समस्याआें को आगे रखकर अभियान का विरोध तेजी से जोर पकड़ता जा रहा है। यह राष्ट ्रीय चिंता का विषय है। देश के नीति-नियंताआें को इस विषय में गंभीरता से सोचना पड़ेगा। इन क्षेत्रों में जागरूकता के लिए उन बुनियादी बातों को भी जानना जरूरी है, जिनके कारण लोग ऐसा कदम उठा रहे हैं। नहीं तो यह अभियान एक मजाक बनकर रह जाएगा और हमारे बच्चे जागरूकता केअभाव में एक ऐसा जीवन जीने को मजबूर होंगे, जो उन्होंने कभी भी अपने लिए नहीं चुना होगा।
Friday 10 July 2009
ब्लागर मित्रों के नाम खुला पत्र
प्रिय ब्लागर मित्रों
आप सभी को मेरा नमस्कार...
खासकर श्री मृत्युंजय भाई साहब को सादर प्रणाम, जिन्होंने मुझे ब्लाग की इस अनोखी दुनिया से रू-ब-रू कराया। दफ्तर का काम खत्म करने के बाद घर लौटा तो कुछ लिखने की इच्छा हुई। सोचा आज उन दोस्तों के नाम ही एक खुला पत्र लिखा जाए, जो दूर रहते हुए भी दिल के करीब हैं।
मैं जनता हूं, आप सब भी मेरी तरह अपनी-अपनी दुनिया में मस्त हो। या यूं कहा जाए की उलझे हो। योंकि मस्ती आजकल की भाग-दाै़ड भरी जिंदगी में किसी नसीब वाले को ही नसीब होती है। फिर भी निराश होने की जरूरत नहीं है, इसी का नाम जीवन है। मैं अपने जीवन के तीस साल पूरे करने के बाद 31वें साल को अपनी तरह से इंज्वाय कर रहा हूं। जाहिर है मेरे मित्रों में भी अधिक संख्या उन लोगों की है, जो उम्र के इसी दौर से गुजर रहे हैं। कहने की जरूरत नहीं है कैरियर के लिए यही दिन जिंदगी के सबसे महत्वपूर्ण दिन होते हैं। मेरी तरह आप सब भी आगे बढ़ने के लिए जद् दोजहद कर रहे होंगे।
कुछ मित्र थे जो पहले ब्लाग की दुनिया में निरंतरता बनाए हुए थे। लेकिन पिछले कुछ महिनों से वे शांत हैं। समझ सकता हूं, आप सब पहले से ज्यादा व्यस्त हो गए हो, लेकिन मुझे लगता है, समाज के उत्थान को चिट् ठाजगत को आप लोगों की जरूरत है। आप सौ कराे़ड लोगों में वह चुनिंदा लोग हैं, जिन्हें भगवान ने लेखन कार्य की शि त दी है। चिट् ठाकारों के लिखने से यूं तो यह दुनिया बदलने वाली नहीं है, लेकिन हमारा प्रयास ही हमारा प्रण है। हम जूझेंगे, लिखेंगे और चेतना की नई ज्योत को हमेशा जलाकर रखने की कोशिश करेंगे। हम शत-प्रतिशत नहीं तो दस-प्रतिशत तो कामयाब होंगे।
आदरणीय मृत्युंजय जी सबसे बड़ी शिकायत मेरी आप से है। आपके ब्लाग लेखन से ही हमें इस दुनिया में झांकने का मौका मिला। आपने हमें बुनियादी बातें भी समझाई। अब आप ही चुप बैठ गए। मैं जनता हूं अब आपके कार्यक्षेत्र का विस्तार हो गया है, बड़ी जिम्मेदारी आपकेकंधों पर हैं। लेकिन मेरा मानना है, आप अगर समय निकालेंगे तो जरूर कुछ नया पढ़ने को मिलेगा। यह मेरी ही नहीं अधिकतर ब्लागर की शिकायत है।
वेद जी आप तो नोयडा जाकर, जैसे कहीं खो ही गए। आपकी लेखनी के हम हमेशा से कायल रहे हैं। कभी-कभार समय निकालकर कर अपनी उपस्थिति जरूर दर्ज करा दिया किजिए। यही शिकायत मेरी बड़े भाई ओम प्रकाश तिवारी, रंजन जी, थपलियाल जी, भाटिया जी से भी है। लगता है जालंधर से जाने केबाद जैसे सब कहीं खो गए हैं। रजनी जी आप तो शादी के बाद से ही ब्लाग की दुनिया से गायब हैं। अब लौट आइए। बहुत दिन हुए, आपकी कोई नई कविता नहीं पढ़ी।
...और अबरार भाई आप कहां हो, आपकी बहुत नहीं लेकिन कुछ नजमे पढ़ी, यकिन मानो बहुत दर्द है आपकी रचनाआें में। बस जरूरत है तो निरंतरता की। उम्मीद है आप जल्दी दस्तक दोगे।
अनिल भारद्वाज जी और मनीष जी लंबे समय से आप भी कहीं दिखाई नहीं दिए। भड़ासी तो बन गए, लेकिन दिल में दबी भड़ास को कब बाहर निकालोगे। फुर्सत केक्षण निकालकर कुछ नया जरूर लिखें, ऐसा मेरा अनुरोध है।
अंत में,
मैं अपने सभी मित्रों के सुखद भविष्य की कामना करते हुए यह चिट् ठा समाप्त कर रहा हूं। भूल-चूक केलिए माफी के साथ आपका स्नेही
विनोद के मुसान
आप सभी को मेरा नमस्कार...
खासकर श्री मृत्युंजय भाई साहब को सादर प्रणाम, जिन्होंने मुझे ब्लाग की इस अनोखी दुनिया से रू-ब-रू कराया। दफ्तर का काम खत्म करने के बाद घर लौटा तो कुछ लिखने की इच्छा हुई। सोचा आज उन दोस्तों के नाम ही एक खुला पत्र लिखा जाए, जो दूर रहते हुए भी दिल के करीब हैं।
मैं जनता हूं, आप सब भी मेरी तरह अपनी-अपनी दुनिया में मस्त हो। या यूं कहा जाए की उलझे हो। योंकि मस्ती आजकल की भाग-दाै़ड भरी जिंदगी में किसी नसीब वाले को ही नसीब होती है। फिर भी निराश होने की जरूरत नहीं है, इसी का नाम जीवन है। मैं अपने जीवन के तीस साल पूरे करने के बाद 31वें साल को अपनी तरह से इंज्वाय कर रहा हूं। जाहिर है मेरे मित्रों में भी अधिक संख्या उन लोगों की है, जो उम्र के इसी दौर से गुजर रहे हैं। कहने की जरूरत नहीं है कैरियर के लिए यही दिन जिंदगी के सबसे महत्वपूर्ण दिन होते हैं। मेरी तरह आप सब भी आगे बढ़ने के लिए जद् दोजहद कर रहे होंगे।
कुछ मित्र थे जो पहले ब्लाग की दुनिया में निरंतरता बनाए हुए थे। लेकिन पिछले कुछ महिनों से वे शांत हैं। समझ सकता हूं, आप सब पहले से ज्यादा व्यस्त हो गए हो, लेकिन मुझे लगता है, समाज के उत्थान को चिट् ठाजगत को आप लोगों की जरूरत है। आप सौ कराे़ड लोगों में वह चुनिंदा लोग हैं, जिन्हें भगवान ने लेखन कार्य की शि त दी है। चिट् ठाकारों के लिखने से यूं तो यह दुनिया बदलने वाली नहीं है, लेकिन हमारा प्रयास ही हमारा प्रण है। हम जूझेंगे, लिखेंगे और चेतना की नई ज्योत को हमेशा जलाकर रखने की कोशिश करेंगे। हम शत-प्रतिशत नहीं तो दस-प्रतिशत तो कामयाब होंगे।
आदरणीय मृत्युंजय जी सबसे बड़ी शिकायत मेरी आप से है। आपके ब्लाग लेखन से ही हमें इस दुनिया में झांकने का मौका मिला। आपने हमें बुनियादी बातें भी समझाई। अब आप ही चुप बैठ गए। मैं जनता हूं अब आपके कार्यक्षेत्र का विस्तार हो गया है, बड़ी जिम्मेदारी आपकेकंधों पर हैं। लेकिन मेरा मानना है, आप अगर समय निकालेंगे तो जरूर कुछ नया पढ़ने को मिलेगा। यह मेरी ही नहीं अधिकतर ब्लागर की शिकायत है।
वेद जी आप तो नोयडा जाकर, जैसे कहीं खो ही गए। आपकी लेखनी के हम हमेशा से कायल रहे हैं। कभी-कभार समय निकालकर कर अपनी उपस्थिति जरूर दर्ज करा दिया किजिए। यही शिकायत मेरी बड़े भाई ओम प्रकाश तिवारी, रंजन जी, थपलियाल जी, भाटिया जी से भी है। लगता है जालंधर से जाने केबाद जैसे सब कहीं खो गए हैं। रजनी जी आप तो शादी के बाद से ही ब्लाग की दुनिया से गायब हैं। अब लौट आइए। बहुत दिन हुए, आपकी कोई नई कविता नहीं पढ़ी।
...और अबरार भाई आप कहां हो, आपकी बहुत नहीं लेकिन कुछ नजमे पढ़ी, यकिन मानो बहुत दर्द है आपकी रचनाआें में। बस जरूरत है तो निरंतरता की। उम्मीद है आप जल्दी दस्तक दोगे।
अनिल भारद्वाज जी और मनीष जी लंबे समय से आप भी कहीं दिखाई नहीं दिए। भड़ासी तो बन गए, लेकिन दिल में दबी भड़ास को कब बाहर निकालोगे। फुर्सत केक्षण निकालकर कुछ नया जरूर लिखें, ऐसा मेरा अनुरोध है।
अंत में,
मैं अपने सभी मित्रों के सुखद भविष्य की कामना करते हुए यह चिट् ठा समाप्त कर रहा हूं। भूल-चूक केलिए माफी के साथ आपका स्नेही
विनोद के मुसान
Tuesday 30 June 2009
अमरत्व की अधूरी आस

विनोद के मुसान
माया की महामाया परंपार है। जो कोई न करे, वह कर गुजर जाए। पूर्व में शायद देश के महापुरूषों को अ ल नहीं थी। उन्होंने अपने जीवित रहते अपना कोई बुत नहीं लगवाया। इसलिए तो उनका यह हाल है। जो उनके अमर होने के बाद कई लोग उन्हें ठीक से जानते तक नहीं। लेकिन बहन जी ने इस मामले में कोई कसर नहीं छाे़डी। अपने जीवन रहते ही इतने बुत खड़े कर दिए, ताकि बाद में कोई कसर न रहे। फिर करे भी यों न। इतिहास गवाह है, अपने जीवत रहते अमरत्व की लालशा कई लोगों ने की। वे कितने सफल हुए, यह एक अलग विषय है।
अब यही अभिलाषा एक दलित की बेटी ने की तो कईयों के पेट में दर्द होने लगा। अरे भाई! अमरत्व कोई सत्ता की कुर्सी नहीं, जिस पर कोई भी ऐरा-गैरा, नत्थु खैरा आ कर बैठ जाए। यह एक तपस्या है, जिसे पूरा करने के लिए कई त्याग करने पड़ते हैं। जनता के दो-चार हजार कराे़ड रुपए तो आहूति भर हैं। अपनी इस उत्थान यात्रा में वे लगातार आगे बढ़ रही हैं। उन्होंने ताज कारिडोर, चल-अचल संपत्ति, भष्ट ्राचार तथा कई अन्य प्रकार के राहु-केतुआें को पटखनी देते हुए यह उपलब्धि हासिल की है। और फिर आप उनके अन्य महान कर्मों को यों भूल जाते हैं। पहले उन्होंने दलितों का उत्थान किया। उन्हें तर किया, वितर किया और फिर एकत्र किया। पिछले चुनाव में इसका विस्तार करते हुए एक उच्च श्रेणी की जाति का सेनापति नियु त किया और नारा दिया 'सर्व जन सुखाय, सर्व जन हिताय`। तुम भी खाओ, हमें भी खाने दो, सभी सुखी रहो। अब आप ही बताएं, इसमें गलत या भाई। आज कल जहां, भाई-भाई को सुखी नहीं देख सकता, वहीं वह सर्व जन सुखाय की बात करती हैं। अपने प्रदेश के दलितों का उत्थान करने के बाद वह रूकी नहीं, उन्होंने अपनी विकास यात्रा जारी रखी। वे देश की प्रधानमंत्री बनकर पूरे देश का उत्थान करना चाहती थी। लेकिन उनकी इस मुहिम को बिता चुनाव झटका दे गया। देश के कई पार्क और चौराहे उनकी अमरत्व की शिला से महरूम रह गए।
अब ताजा प्रकरण ही ले लीजिए। अमरत्व की उनकी इस विकास यात्रा में एक सिरफिरे ने खलल डाल दिया। इतनी व्यवस्तम यात्रा में उन्हें कुछ ऐसे सवालों का जवाब देना पड़ेगा, जिनका पूछने वाले और जवाब देने वाले दोनों को पता है कि इसके बाद भी कुछ नहीं होने वाला।
जैसे जनता की गाढ़ी पसीने की कमाई यानि सरकारी धन का दुरुपयोग यों किया गया। वह भी तब, जबकि उनका प्रदेश गरीबी और अशिक्षा में सबसे आगे है। जनता को दी जाने वाली मूलभूत सुविधाआें का टोटा है। जनता के बीच बिजली-पानी को लेकर हहाकार मचा है। स्वास्थ्य सेवाआें की तो बात ही मत करो। परिवहन का बुरा है। ऐसे में भला आप खुद का उत्थान कैसे कर सकती हैं।
खैर हमारी तो कामना है बहन जी आप दिन-दुनी, रात चौगुनी तर की करो। आप दलितों की मसीहा बनी, खुद का उत्थान किया, अब देश का भी कुछ भला करो। योंकि ज्यादा खाने से किसी को भी अपच हो जाता है। बढ़े-बू़ढों की बात समझो। कम खाओ और सुखी रहो।
Monday 8 June 2009
मीडिया के चुतियापे का समय
यह मीडिया के चुतियापे का समय है। इस शब्द का इस्तेमाल इसलिए कर रहा हूँ क्योंकि अपनी हरकतों से मीडिया अपनी विश्वसनीयता खो रहा है। चुनाव में हिन्दी के कई ..बड़े अख़बारों ने पैसे लेकर विज्ञापन नुमा न्यूज़ छापी। पाठकों को बेवकूफ समझा। एक ही पेज पर एक ही साथ कई लोगों को जिताया. जाहिर है की पाठक उनकी पिछवारे पर आज नहीं तो कल लात मारेंगे । भला हो अमर उजाला का जिसने कई दिक्कतों के बावजूद इस चुनाव में पैसे लेकर खबरें छापने से इंकार कर मीडिया की इज्जत बचायी।
कई संसथान संपादको की जगह मैनेजरों को बिठाकर कबाडा कर रहे है। कई रिपोर्टरों को विज्ञापन के टारगेट दे रहे हैं और वे भी परम कुत्ता भाव से खबरों की जगह क्लाइंट को सूंघते फ़िर रहे है। कई पत्रकार की जगह दलाल या लाइजनर बन गए है। तो मीडिया को बेडा गर्क होने से कौन बचायेगा।
Saturday 6 June 2009
लोकतंत्र के उत्सव में दहकते रहे पहाड़
इधर पूरी सरकारी मशीनरी लोकसभा चुनाव में व्यस्त रही और उधर उत्तराखंड के तमाम पर्वतीय क्षेत्र केवन आग की चपेट में थे। पहाड़ों में सुलगती ज्वालाएं रोज अपार वन संपदा को लीलती रहीं, लेकिन आग को बुझाने की पहल नहीं की गई। चुनाव तो सकुशल निपट गया। लेकिन इस दौरान जलते जंगलों के बाद हुई क्षति को कौन पूरा करेगा, यह प्रश्न्न यक्ष बना हुआ है।
विनोद के मुसान
पहाड़ गर्म हैं। देश भी गर्म है। वजह अलहदा है। देश में सियासी लू चल रही है तो पहाड़ों में आग पखवाड़े भर अपना दायरा बढ़ाती रही। इसका अहसास वहां सैर को जाने वालों को होता है जब दिन में कपड़ों पर गर्द पड़ती है और रात केअंधेरे में आसमान लाल लगता है। देखने में खूबसूरत लगने वाले रात के आसमान की हकीकत जानने केबाद जेहनी जु़डाव वाले लोग शायद ही उस रात सो पाएं। कहां गए होंगे वहां के जानवर? कितने पे़ड, कितने घोसले खाक हुए होंगे? आयोग की सख्ती से लोकतंत्र के सबसे बड़े उत्सव में जनता को राहत मिली, लेकिन यहां राहत कहां? इतने छोटे से लफ्ज की इतनी बड़ी तासीर, कि कल्पना में रात गुजर जाए।
होश संभलने के दौरान आपने भी कहानी पढ़ी होगी जिसमें कोर्ट में पेश एक नासमझ वकीलों के तमाम तर्कों के बावजूद नहीं मान पाता कि दो बोल्ट खोलने से ट्रेन भला कैसे पलट सकती है। उसने तो मछली पकड़ने के जाल में बांधने केलिए रेल पटरी से दो नट-बोल्ट खोले थे। ऐसा तो उसके बस्ती वाले अ सर करते थे। उसे सजा मिलती तो है लेकिन अपराध को वह समझ ही नहीं पाता। ठीक उसी तरह जब उत्तराखंड के बाशिंदों से जाना कि हर साल लगती है आग, लेकिन इस बार लगाने वाले ने यह सोचा भी नहीं होगा कि बुझाने वाले ही नहीं मिल पाएंगे।
उत्तराखंड में रात को सफर करते समय ऊंची-ऊंची पहाड़ियों से उठने वाली लपटें किसी को भी अपनी ओर आकर्षित कर सकती हैं, लेकिन काल की माफिक अपार वन संपदा और वन्य जीवन को लीलने वाली इन लपटों की हकीकत जानने के बाद किसी का भी मन उद् विगन हो सकता है। तपती गरमी में दिन के समय जलते जंगलों से उठने वाला धुआं और हवा के साथ गिरने वाली राख पूरे वातावरण को दूूषित बना देती है।
देवभूमि कहे जाने वाले इस छोटे से प्रदेश की वन संपदा खतरे में हैं। खतरा इतना बड़ा है कि इसकी कल्पना नहीं की जा सकती है। पूरे प्रदेश के जंगल इन दिनों आग की चपेट में हैं। हर तरफ बस आग की लपटें दिखाई देती हैं। शासन और प्रशासनिक मशीनरी को सबकुछ दिखाई दे रहा था, लेकिन वह पहले लोकतंत्र के महाकुंभ में व्यस्त थी और अब खुमारी उतारने में। आम आदमी दुनियादारी के झंझटों में इतना उलझा है कि वह इन दृश्यों को देखकर भी अनदेखा कर देता है।
पिछले दिनों एक शादी समारोह में टिहरी गढ़वाल जाते हुए तपते पहाड़ों को देखकर मन में एक अजीब सी उदासी छा गई। लगा मेरे सामने मेरा घर जल रहा है और मैं कुछ नहीं कर पा रहा हूं। थक-हार कर आपातकालिन सेवा नंबर पर फोन किया। एक नहीं कई बार फोन किया। हर बार एक ही जवाब आया। हमने आपकी शिकायत दर्ज कर ली है। फलां थाने को इसकी सूचना दे दी गई है। संबंधित अधिकारियों का नंबर मांगने पर पहले तो असमर्थता जता दी गई। बाद में नंबर उपलब्ध हुआ तो जवाब मिला, साहब इन दिनों चुनाव में व्यस्त हैं, कुछ नहीं कर सकते। मन खिन्न हो गया। वन विभाग के अधिकारियों से संपर्क किया गया, तो टका का जवाब मिला, 'हम कोशिश कर रहे हैं।`
यह वही विभाग है, जो किसी ग्रामीण को एक गट्ठर चूल्हे की लकड़ी ले जाते पकड़ ले तो उस पर अच्छा-खासा जुर्माना कर देता है। पर यहां तो पूरे के पूरे जंगल खाक हो रहे हैं। तमाम पशु-पक्षी मारे-मारे फिर रहे हैं। वनाषौधियां नष्ट हो रही हैं। भूमि में जल संरक्षित करते वाले श्रोत खत्म हो रहे हैं। पूरी प्रकृति ही अपना श्रंगार खो रही है।
टिहरी जिले की भिलंगना रेंज, भागीरथी रेंज, पोखाल, जगधार, चंबा केवन, सुरसिंहधार, प्रतापनगर, बाल गंगा रेंज, नैलचामी डाडां, घनसाली ब्लाक, देवप्रयाग और श्रीनगर के बीच में पड़ने वाले तमाम जंगल, नई टिहरी के आस-पास केवन, पटीयाली गांव केसामने की पहाड़ियां कुछ ऐसी जगह थीं, जो आग की लपटों में घिरी थी।
यह वही जिला है, जहां से अभी कुछ दिन पहले पर्यावरण केनाम पर एक शख्स राष्ट ्रीय सम्मान पद् मविभूषण लेकर लौटे हैं। मैं बात कर रहा हूं उस जानी-मानी हस्ती की, जिसे लोग अंतर्राष्ट ्रीय ख्याति प्राप्त शख्सियत सुंदर लाल बहुगुणा के नाम से जानते हैं। मन में एक सवाल उठा, 'बहुगुणा जी, आप तो नई टिहरी में निवास करते हैं, जहां से दूर-दूर तक हिमालय केदर्शन होते हैं, दिन नहीं तो रात में तो आपको जलते जंगलों से उठती लपटे जरूर दिखाई देती होंगी, आप कुछ करते यों नहीं?` 'अगर ये पहाड़ यूं ही तपते रहे, कहां रहेगा पर्यावरण और कहां जाएंगे पर्यावरणविद् ?`
यहां निवास करने वाले आम आदमी से इस विषय में बात करने पर सौ में से नब्बे लोगों का एक ही जवाब होता है, 'जंगलात वाले जंगलों में खुद आग लगाते हैं।` कारण पूछने पर बताते हैं, इसके बाद होने वाली मोटी कमाई, जो उन्हें ऐसा करने के लिए उकसाती है। जलते जंगलों की आग शांत करने के लिए जारी होने वाला मोटा बजट और इसके बाद प्लानटेशन के नाम पर होने वाली खानापूर्ति से छोटे कर्मचारी से लेकर बड़े अधिकारी तक अपना पेट भरते हैं।` हकीकत कुछ भी हो, लेकर इस स्याह सच को झुठलाया नहीं जा सकता कि जंगल जल रहे हैं और धुआं वहीं उठता है, जहां आग लगी हो।
ऐसा नहीं है कि इस आपदा को लेकर पहाड़ का हर शख्स मौन हो, कुछ ऐसे कर्मठ लोग भी यहां मौजूद हैं, जिन्होंने गांव केआस-पास केजंगलों में आग को कभी फटकने भी नहीं दिया। उन्होंने इन जंगलों को अपने बच्चे की तरह पाला है। टिहरी जिले के हिंडोलाखाल ब्लाक में मां चंद्रबदनी देवी मंदिर केनीचे निवास करने वाले कई गांव ऐसे हैं, जो इस मुहिम को जनांदोलन का रूप दिए हैं। कैंथोली, करास, पुजार गांव और आस-पास के कुछ अन्य गांव इसका ज्वलंत उदाहरण हैं। आस-पास आग की एक छोटी सी चिंगारी पर भी पूरे गांव के लोग इकट् ठा होकर उसे शांत कर देते हैं। इन गांवों केआस-पास फैले घने बांज और चीड़ के जंगल खुद इनकी रक्षा करने वालों के हौसले की दाद देते हैं।
यहां के लोगों का मानना है, 'ये सिर्फ जंगल नहीं, हमारे माता-पिता हैं, जो हमें अपनी गोद में पालते हैं, जिस दिन इनका अस्तित्व समाप्त हो जाएगा, ये पहाड़ भी रहने लायक नहीं रहेंगे। अगर व त रहते लोग नहीं चेते तो पहाड़ बिन जंगल ठीक उस विधवा की तरह दिखेंगे, जिसकेमाथे का सिंदूर मिट चुका होता है।`
ज्वलंत मुद् दा
नोट - यह लेख २४ मई को 'कांपे ट` (अमर उजाला संस्करण) में संपादकीय पृष्ठ पर प्रकाशित हो चुका है।
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