Friday 9 August 2013

मैं देर करता नहीं, देर हो जाती है…

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काल करे सो आज कर, आज करे सो अब
पल में प्रलय होएगी, बहुरि करेगा कब
मेरे पिताजी भी अकसर इस बात को दोहराते थे। लेकिन, उनकी इस बात को हम भाई-बहन अकसर उल्टे चश्मे से देखते। अब अपने बच्चों को यही सीख देते हैं, तो वे भी भूतकाल को दोहराते नजर आते हैं। वक्त का फेर है, जिसकी पाठशाला में बात कभी जल्दी तो कभी देर में समझ आती है। कई बार इतनी देर हो जाती है, वक्त ही हाथ से निकल जाता है।
पहला वाकया मुरादाबाद का
तीन साल पहले ‘अमर उजाला’ मुरादाबाद में था। बच्चों से दूर अकेला रहता था। खूब समय था मेरे पास। आफिस के सीनियर साथी आशीष शर्मा जी केसाथ एक योगा सेंटर ज्वाइन कर लिया। रात को डेस्क पर काम करते हुए 2 बजे के आसपास छूटते थे। सुबह 10 बजे जब हम सेंटर पहुंचते, तब तक सभी लोग जा चुके होते थे। विशेष अनुरोध पर सेंटर संचालक इस समय पर हमें योग सिखाने को तैयार हुआ था।
खैर, चार महीने दोनों ने गिरते-पड़ते कोर्स कर लिया। काफी मशक्कत के बाद दोनों ने कुछ इंच पेट कम कर लिया। वजन में भी कमी आई। मैंने दो और आशीष जी ने अप्रत्याशित चार किलो वजन कम कर लिया। उस वक्त योगाचार्य ने कहा था, जितना मैंने तुम्हें सिखाया है, उसका आधा भी रोज कर लोगे, जिंदगी में कभी डाक्टर के पास जाने की जरूरत नहीं पड़ेगी। मन ने भी ठान लिया था, आगे योग जारी रहेगा। किराए के कमरे में नियमित योगाभ्यास किया जाने लगा। सुस्ती के कारण धीरे-धीरे इस समय में कटौती होने लगी। इसके बाद देहरादून ट्रांसफर हो गया। घर-गृहस्थी के पचड़ों में ऐसा फंसा, अब तक फिर शुरू नहीं कर सका। रोज सोचता हूं, कल से शुरू करूंगा…। लेकिन उत्साह का संचार फिर अगले दिन के झंझावतों के फेर में आकर ठंडा हो जाता है।
दूसरा वाकया ताजा-ताज है
केदारनाथ आपदा के बाद मन में प्रभावित क्षेत्रों में जाकर रिपोर्टिंग करने की इच्छा थी। डेस्क पर साथियों की कमी के चलते पहले तो संपादक जी से बात करने की हिम्मत ही नहीं हुई। फिर सोचा भेजें न भेजें, बात करने में क्या बुराई है, कल जरूर बात करूंगा। ऐसे करते-करते दो-तीन दिन निकल गए। जिस दिन मन पक्का करके आया, उसी दिन पता चला, संपादक जी दो साथियों को भेज चुके हैं। फिर मेरा वह कल दोबारा नहीं आया।
बहुगुणा जी ने भी देर कर दी
जो फावड़ा मुख्यमंत्री जी ने दो दिन पहले उठाया है, यही काम 15 दिन पहले कर लिया होता तो ज्यादा अच्छा होता। खैर, देर आए दुरुस्त आए… उनकी इस पहल को सकारात्मक रूप से देखा जाना चाहिए।

चंद्रमुखी की ना-नुकुर

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चिंटू के मम्मी-पापा के बीच अकसर झगड़ा होता। झगड़ों के बाद दोनों अपने को सही ठहराते। लेकिन बात किसी निष्कर्ष तक नहीं पहुंचती। ऐसे ही एक झगड़े के बाद चिंटू के पापा ने खुद को सही और पत्नी को गलत साबित करने के लिए एक दिन एक दंपति की कहानी सुनाई।
कहानी कुछ ऐसी थी…
रामलाल जब भी अपनी पत्नी चंद्रमुखी से कोई काम कहता, चंद्रमुखी उस काम का उल्टा ही करती। रामलाल कहता, आज मैं खीर खाऊंगा तो चंद्रमुखी खिचड़ी बना देती।
रामलाल कहता आज मुझे भूख नहीं है, मैं दो ही रोटी खाऊंगा तो चंद्रमुखी उसे ठूंस-ठूंसकर चार रोटी खिला देती।
रामलाल कहता आज हम बच्चों के साथ घूमने जाएंगे, चंद्रमुखी कहती आज नहीं कल।
चंद्रमुखी की ना-नुकुर से जब रामलाल आजिज आ जाता तो कहता- चंद्रमुखी तुम इस बार मायके नहीं जाओगी। ..और चंद्रमुखी झट से उसी दिन तैयार होकर मायके चली जाती।
आखिर चंद्रमुखी की यही नकारात्मक सोच उसे एक दिन ले डूबी।
दोनो यात्रा पर थे। रास्ते में बहती एक नदी में नहाने के लिए रुके।
रामलाल- चंद्रमुखी घाट की सीढ़ियों पर ही नहाना…।
चंद्रमुखी- न मैं तो आगे जाकर ही नहाऊंगी।
रामलाल- अच्छा ज्यादा आगे मत जाना…।
चंद्रमुखी- न मैं तो और आगे जाकर ही नहाऊंगी।
रामलाल- अरे भई…आगे पानी का बहाव तेज है, तुम फिसल जाओगी…।
चंद्रमुखी- न मैं तो बीच नदी में जाकर ही नहाऊंगी…।
..और ना-ना करते-करते चंद्रमुखी नदी के तेज बहाव में बह गई।
तुम सारे मर्द होते ही एक जैसे हो…
अपनी पत्नी की ना-नुकुर पर एक-दो बार मैंने उसे भी यह कहानी सुनाई। पहली प्रतिक्रिया तो यही थी, तुम मर्द होते ही एक जैसे हो…हमारी कही हर बात तुम्हें बुरी लगती है। तुम भी यही चाहते हो न, मैं भी किसी नदी में डूब जाऊं।
लेकिन, कई बार लंबे चलने वाले झगड़े को इस कहानी ने वक्त से पहले ही सुलझा दिया। पत्नी मुस्कुरा देती है… और कहती, तुम नहीं सुधरोगे।
बात मुद्दे की
चिंटू के पापा की सुनाई कहानी सुन ली। हम पति-पत्नी के बीच कैसे सुलह हुई, यह भी जान लिया…अब क्या? मुद्दे की बात तो हुई ही नहीं। आखिर मुद्दा क्या है। अगर, आप कुछ ऐसा ही सोच रहे हैं तो चलो आपको मुद्दे की बात भी बताते चलें- मुद्दा है ‘ना-नुकुर’।

..तब बुरी लगती थीं पिताजी की कही बातें

उस वक्त पिताजी की कही बातें अकसर बुरी लगतीं, लेकिन उनके जाने के बाद अब हर कदम पर उनकी कमी खलती है। इसे एक पीढ़ी का अंतर कहें या कुछ और, लेकिन हम दोनों के बीच कुछ ऐसा ही था। अकसर पिता के साथ विचारों का टकराव होता।

चार बहनों के बाद मैं घर में सबसे छोटा था। एक उम्र तक तो उनके सामने गर्दन तक नहीं उठाई। बारहवीं करने के बाद गांव से शहर (देहरादून) आया तो देखा दुनिया में बहुत कुछ है, जिसके बारे में न कभी सुना न देखा। सपनों को जैसे पंख लग गए। कालेज जाने के लिए साइकिल की डिमांड रखी तो पिताजी एक पुरानी परंपरागत साइकिल खरीदने को तैयार हो गए। लेकिन तब तक जमाना, हीरो रेंजर का आ चुका था। यहां पर भी विचारों का टकराव हुआ और आखिर जीत मेरी हुई। 14 सौ रुपये मेरी गुल्लक में निकले। पांच सौ रुपये पिताजी ने मिलाए और अगले दिन कैनन बैरल टॉप मॉडल साइकिल घर आ गई।
दो साल बाद बाइक की चाह मन में जाग गई। पिताजी के सामने प्रस्ताव रखना कठिन था। आखिर,  माता जी के मार्फत प्रस्ताव रात को खाने की टेबिल पर पहुंचा। कई दिनों तक इस पर मंथन चला। लेकिन बात स्कूटर पर आकर अटक गई। मैंने बाइक और स्कूटर के बीच लाख अंतर गिनाए, लेकिन जीत स्कूटर की हुई।
एम.एससी का स्टूडेंट था, अपनी आर्थिक जरूरतों को पूरा करने के लिए फोटोग्राफी करता था। फोटोग्राफरों की संगत में रहते-रहते कैमरों से जैसे प्यार हो गया। दूरदर्शन में उन दिनों (1998-99) बीटा कैन कैमरा इस्तेमाल किया जाता था। वही कैमरा मुझे पत्रकारिता में ले आया। कुछ दिन दूरदर्शन और एएनआई के साथ कैमरा भी चलाया और एंकरिंग भी की। कई पड़ावों को पार करते हुए आखिर प्रिंट मीडिया में रम गया। पिताजी चाहते थे अपने व्यवसायिक जीवन में मैं दस से पांच की नौकरी करूं। लेकिन मैं उनकी यह इच्छा पूरी नहीं कर सका।
जब पिताजी से आखिरी बार बात हुई…
शुक्रवार, 13 जुलाई, 2012 : दोपहर 1 बजे के आसपास पिताजी से फोन पर बात हुई। उन्होंने कहा, शनिवार-रविवार बच्चों की छुट्टी है, उन्हें घर (रानीपोखरी) लेकर आना। आंगन में खड़े पेड़ पर आम पकने लगे हैं। मिलकर खाएंगे। ‘अदिति स्कूल से घर आ गई होगी, उससे कहो, दादाजी ने उसके लिए चाकलेट लाकर रखी है, दादाजी से बात कर ले।’ लेकिन उस दिन अदिति ने दादाजी से बात नहीं की। मैंने कहा, मेरा तो कल ऑफिस है, बच्चों को भेज दूंगा, मैं रविवार सुबह आ जाऊंगा। …और हमारा वार्तालाप समाप्त हो गया।
इसके बाद ठीक डेढ़ बजे पड़ोस में रहने वाली निर्मला भाभी का फोन आया- ‘विनोद जल्दी से घर आ आ जा, पिताजी छत की सीढ़ियों से गिर गए हैं, उन्हें बहुत चोट आई है।’, ‘गांव वाले उन्हें लेकर अस्पताल जा रहे हैं, तू जल्दी पहुंच।’
अनहोनी की आशंका में मैंने जल्दी से कृष्णा (पत्नी) को फोन लगाया और तुरंत ऑफिस से घर पहुंचने को कहा। इतनी देर में आदित्य (बेटा) भी स्कूल से घर आ चुका था। आधे घंटे के भीतर हम घर के लिए निकल पड़े। देहरादून से चलकर डोईवाला मणीमाई मंदिर के पास ही पहुंचे थे, अनहोनी की आशंका सच साबित हुई और मुझे मेरे पिता की मृत्यु का समाचार मिला।
उनकी मृत्यु के एक साल बाद आज भी रात को सोते हुए उनका चेहरा मेरी आंखों के सामने आ जाता है। मन इस उधेड़बुन में उलझकर रह जाता है कि आखिर मेरे पिता की मृत्यु कैसे हुई। जब वे सीढ़ियों से गिरे थे तो उनके सिर पर चोट आई थी। काफी खून भी बहा था। लेकिन, मौके पर मौजूद लोगों ने कहा, पंडित जी को हार्टअटैक आया था, जिसकी वजह से वे सीढ़ियों से गिर गए थे। वे पहले ही तीन अटैक झेल चुके थे।
पूरा हुआ एक साल का व्रत
मेरी चार साल की बिटिया बहुत खुश थी। उसकी खुशी की वजह भी बहुत खास थी। दादाजी की बरसी (1 अगस्त) पर उसने चहकते हुए बुआ, मामा, दादी, सभी से कहा- अब तो पापा मेरे बर्थडे पर बाहर से आया केक भी खा सकेंगे। …और किसी शादी में जाने के बाद घर आकर मम्मी को पापा लिए खाना नहीं बनाना पड़ेगा।

मैं और मेरी परछाई…

यूं ही अंतर्मन में डूबा था एक दिन ये मन

कुछ अजीब सी उलझन लिए
तभी पीछे से किसी ने आवाज दी
लगा जैसे कोई अपना ही है
मुड़कर देखा
तो कोई न था
अपनी ही परछाई खड़ी थी
वही विशालकाय रूप लिए
सम्मोहन जैसा कुछ न था
फिर भी साथ थी वह मेरे
अपना अस्तित्व तलाशती
और मेरे साथ जुड़े होने का अहसास
अंतर्मन की उलझन
मैं और मेरी परछाई
तीनो साथ होकर भी
मानो अकेले थे
फिर करवां भी गुजर गया
सामने से मेरे
और मैं तनहा रहा खड़ा
जब तक परछाई थी साथ मेरे
अपना अस्तित्व तलाशती
सन्नाटा बढ़ता चला गया
और वह अंर्तध्यान हो गई
फिर वही संकोच लिए
मैं, मेरी परछाई…और वह संन्नाटा
कुछ अजीब सी उलझन लिए

बाजार में बिकती ‘भीड़’

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सेल-सेल-सेल….
बाजार में बिकने लगी भीड़!
क्या बात कर रहे हो भाई?
आलू-प्याज समझा है क्या?
माना कि बाजार में बहुतायत मिलती है यह भीड़, लेकिन बिकती भी है भीड़!
कहां?
क्या कहा!  बाजार में!
इनकी मंडी कहां लगती है?
सरेआम, सरेराह, यहां-वहां, जहां-तहां, हर जगह, गली-मुहल्लों में, गांवों में, शहरों में जहां चाहोगे उपलब्ध हो जाएगी।
लेकिन इसे इतनी भी ‘आम ’ मत समझना।
‘आम ’ को ‘खास ’ बनाने वाली ये नाचीज सी ‘चीज ’, है बहुत ही खास। जिस तरफ ढल जाए, उसका बेड़ापार कर देती है। बस दाम चुकाने के साथ मौका भुनाने वाला चाहिए। हर मौके पर उपलब्ध हो जाएगी यह भीड़।
कहते हैं, पहले ऐसी नहीं थी ये भीड़।
जनम-मरण, खुशी-गम में यूं ही शामिल हो जाती थी ये भीड़।
बड़े-बड़े किलों को फतह कर जाती थी यह भीड़।
एकजुट होकर किसी को गद्दी पर बैठा और किसी को गद्दी से उतार देती थी ये भीड़।
एकता की ऐसी मशाल जलाई की देश को गुलामी की जंजीरों से आजाद करा गई ये भीड़।
वक्त बदला, जरूरतें बदली और बदल गई सोच। इसके बाद धीरे-धीरे बहुत नकचढ़ी सी हो गई ये भीड़।
आलम यह है कि आज बिना दाम किसी को घास ही नहीं डालती यह भीड़।
अब तो कुछ लोगों ने इसके अच्छे-खासे दफ्तर भी खोल लिए हैं। इसके बिजनेस में सेल्समैन ही नहीं कांट्रेक्टर से लेकर सप्लायर तक की पोस्ट ईजाद हो गई हैं। आज किसी के परिणय सूत्र में बंधने से लेकर देश की संसद तक को प्रभावित करती है यह भीड़।
राज्य की राजधानी में बैठा ‘मैं ’, उस दिन देखता ही रह गया भीड़।
क्या नजारा था, रेलम-पैल था, एक के पीछे एक, दूर तलक बस दिखाई दे रही थी भीड़।
पूछा, तो पता चला एक ‘असामी ’ पार्टी ने जुटाई है आज यह भीड़। विस में सत्र शुरू हो चुका है। विपक्षी पार्टी ने परंपरा का निर्वाहन पूरा करने के लिए घिराव की तैयारी के लिए जुटाई है यह भीड़।
दूर से बहुत खुबसूरत सी नजर आ रही थी यह भीड़।
मुहाने पर चमकते चेहरे थे, चटक सफेद कुर्ते-पहजामे और सिर पर बेदाग सी दिखाई दे रही वही सफेद टोपी थी। गिले-शिकवे से भरे नारे भी थे। इसी भीड़ को पीछे छोड़ आगे जाने का जोश था। लेकिन पीछे और पीछे… दूर तलक
मुरझाई हुई सी नजर आ रही थी यह भीड़।
हाथों में झंडे-डंडे लिए सुस्ताई हुई सी थी यह भीड़।
थोड़ा करीब जाकर देखा तो पता चला ‘बिकी ’ हुई थी यह भीड़।
‘पैसा फेंकों-तमाशा देखो ’
आज कुछ ऐसी हो गई है यह भीड़।
‘वक्तिया प्रारूप ’ में ढलकर अपना ‘स्व-स्वरूप ’ खो गई है यह भीड़।
अपनी ताकत का अहसास होने के बाद भी असहाय सी हो गई है यह भीड़।
नजरों का फेर नहीं हकीकत में कहीं अपने में ही खो गई यह भीड़।

न जाने यों होता है यूं जिंदगी के साथ

न जाने यों होता है यूं जिंदगी के साथ
अचानक ये मन किसी के जाने के बाद
करे फिर उसकी याद
उसकी छोटी-छोटी सी बात
लम्हें गुजर जाते हैं, यादें रह जाती हैं
मासूम से चेहरे की दबी सी हंसी
आती है याद 
उनके जाने के बाद
उनकी छोटी-छोटी सी बात

Tuesday 28 September 2010

क्या देख रहे हैं देश के हुक्मरान यह पाक नहीं हमारी जमीं है हिंदुस्तान

विनोद के मुसान
ईद उल फितर के दिन श्रीनगर के लाल चौक पर जो कुछ घटा, उसे देखकर किसी भी सच्चे हिंदुस्तानी का खून खौल सकता है। लाल चौक पर खड़े एतिहासिक घंटाघर पर एक बारफिर पाकिस्तान का झंडा फहराया गया। कई सरकारी बिल्डिंगों को आग के हवाले कर दिया गया। वाहन फूंके गए और तोड़फोड़ की गई। मुबारक पर्व पर जितना हो सकता था सरकारी संपत्ति को नुकसान पहुंचाया गया। इससे ठीक पहले दहशतदर्गी फैलाने वाले यह सभी लोग ईद की नमाज अदा कर लौटे थे।
इस देश में रहकर दूसरे देश का झंडा फहराना, जिस थाली में खाना उसी में छेद करने जैसा है। अलगाववादी कुछ लोग कश्मीर की जनता को बरगला कर अपने नाकाम मनसूबों को अंजाम देने में लगे हैं। जिन नौजवानों के हाथों में किताबें होनी चाहिए थीं, उनके हाथों में सैन्य बलों को मारने के लिए ईंट और पत्थर दिए जा रहे हैं। मजहब के नाम पर उनकी जवानी को ऐसे अंधकार में धकेलने का काम किया जा रहा है, जहां से शायद ही वह कभी लौटकर वापस आ सकें।
देश का कोई नेता इन हालात को सुलझाने का प्रयास तक करता दिखाई नहीं दे रहा है। धर्मनिरपेक्षता की बात करने वाले और छोटी-छोटी बातों पर धरना प्रदर्शन करने वाले नेताओं की जुबान पर भी ऐसे मौके पर ताला लग जाता है। मीडिया की अपनी सीमाएं हैं। देश में अमन और शांति कायम रखने के लिए लाल चौक के उन दृश्यों को न दिखाने और मामूली कवरेज उस अघोषित रणनीति का हिस्सा होता है, जो लोकतांत्रिक देश की अखंडता के लिए जरूरी भी है।
कश्मीर में रोज खून की होली खेली जा रही है, सरकारी संपत्ति को नुकसान पहुंचाया जा रहा है। आम जनता के खून पसीने की गाढ़ी कमाई इस तंत्र को यथावत रखने में लुटाई जा रही है, लेकिन हश्र सबके सामने है। विकास की बात तो दूर, सर्वविनाश करने वाले लोगों को रोका तक नहीं जा रहा है। सब जानते हैं मुठ्ठीभर दहशतगर्द नेता इस माहौल के लिए जिम्मेदार हैं।
उन पर लगाम लगाई जानी चाहिए। साफ होना चाहिए, वे जिस थाली में रोटी खा रहे हैं, उसमें छेद करने की जुर्रत न करें। नहीं तो अपना काला मुंह वहीं जाकर करें, जिसका गुणगान यहां रहकर कर रहे हैं।