जल उठा जम्मू-कश्मीर। आग और भड़की। जाम और तोड़फोड़। हिंसा की चिनगारी दूसरे प्रदेशों तक पहुंची। देशव्यापी बंद और आंदोलन। मामले पर चढ़ा सांप्रदायिक रंग। कई शहरों में कफ्र्यू। फायरिंग में कई जानें गइंर्। मुद्दा अमरनाथ श्राइन बोर्ड को जमीन आवंटित करने और फिर एक धर्म के लोगों के विरोध के बाद वापस लेने का। किस पक्ष को सही कहें, किसे गलत।
धर्मांधता के इस उबाल में पीछे छूट गइंर् बाबा बर्फानी के भ तों की दुष्वारियां। हजारों किलोमीटर दूर से हजारों रुपये खर्च कर पिछले कुछ दिनों के दौरान जम्मू पहुंचे शिव भ त वहां से आधार शिविर तक जाने-आने में झेली परेशानियों को आजीवन याद रखेंगे। सालों से बुनियादी सुविधाआें को तरसते श्रद्धालुआें को श्राइन बोर्ड की जमीन से कितनी राहत मिल जाएगी, यह समझ से परे है। दूसरी ओर सरकारी जमीन का एक टुकड़ा प्रदेश की एक ऐसी महत्वपूर्ण धार्मिक यात्रा को आवंटित करने, जो प्रदेश के हजारों लोगों की आजीविका से जु़डी है, से किसी को या आपत्ति हो सकती है यह भी एक बड़ा सवाल है।
जिस तरह से आनन-फानन में कई राजनीतिक पार्टियां इस मु े को भुनाने के लिए मैदान में कूदी है, उसे देखते हुए तो यही लगता है कि धर्म की आड़ में यह एक सियासी साजिश है, जिसका मकसद आम लोगों का ध्यान महंगाई और विकास जैसे बुनियादी मुद्दों से हटाना है। गौर करने वाली बात यह भी है कि जम्मू-कश्मीर में भड़की आग की 'रोशनी` में सीमा पर घुसपैठ की कोशिशें तेज हो गई हैं। आखिर कौन दोषी है इस आग के लिए। जब तक आम लोग धार्मिक चादर में छिपे इंसानियत के ऐसे दुश्मनों को नहीं पहचानेंगे, यह आग ऐसे ही लोगों की जानें लेती रहेगी, कभी जम्मू, कभी श्रीनगर, कभी इंदौर तो कभी आपके शहर में।
Friday, July 4, 2008
राजकाज
राजकाज
राजनीति यानी राज करने की नीति अपने देश में कुछ ऐसी है कि इस मयावी चीज पर नजर रखने वाले बड़े-बड़े विशेषज्ञों का भी सिर चकरा जाए। यहां राज के लिए कब किस पार्टी या नेता की नीति बदल जाए, कुछ कहा नहीं जा सकता। ताजा उदाहरण देश में करीब एक साल से चर्चित मुद् दे परमाणु करार को लेकर हो रही उठापठक का है। करार या है? देशहित में कितना कारगर है? और इसकी महत्ता या है? इन प्रश्नों से शायद ही देश की एक बड़ी आबादी वाकिफ हो। लेकिन, यह भी सच है कि करार को लेकर कांग्रेस और वामदलों के बीच पैदा हुई तकरार आखिर उस माे़ड पर आ पहुंची, जहां देश की जनता पर मध्यावधि चुनाव थोपा जा सकता है। तब शायद लोगों को मजबूरन सोचना पड़े कि आखिर यह करार थी या बला? लेकिन, अब राजनितिज्ञों की बदली नीति की बदौलत शायद ऐसी नौबत न आए। चार साल संयु त प्रगतिशील गठबंधन में अछूत रही सपा ने ऐन व त पर कुछ ऐसे संकेत दिए हैं कि सरकार पर लटकी तकरार की तलवार और आम जनता पर थोपे जाने वाले मध्यावधि चुनाव शायद कुछ समय के लिए टल जाएं। चार साल पहले लोकसभा चुनाव में जब सपा को ३९ सींटे मिली थीं, तब माना जा रहा था कि सरकार बनाने की कुंजी सपा के हाथ में होगी। लेकिन, हालात कुछ ऐसे बने कि चुनाव के बाद चौथी सबसे बड़ी पार्टी के रूप में उभरी सपा को पछूने वाला कोई नहीं रहा। लेकिन, अब अचानक सपा यूपीए की तारणहार बन गई है। मुलायम के अमर ने राजनीति की बिसात पर कुछ ऐसी गोटियां बिछाइंर् कि लाल झंडे का रंग भी अब फीका पड़ता दिखाई दे रहा है। पूरे साल करार को लेकर देश में सुर्खियों में रहा लाल रंग आने वाले समय में कितना चोखा होगा, यह तो व त ही बताएगा। लेकिन, सपा के एक सिपहसलार ने इस बार फिर राज की ऐसी नीति चली कि बड़े-बड़े चित हो गए।
राजनीति यानी राज करने की नीति अपने देश में कुछ ऐसी है कि इस मयावी चीज पर नजर रखने वाले बड़े-बड़े विशेषज्ञों का भी सिर चकरा जाए। यहां राज के लिए कब किस पार्टी या नेता की नीति बदल जाए, कुछ कहा नहीं जा सकता। ताजा उदाहरण देश में करीब एक साल से चर्चित मुद् दे परमाणु करार को लेकर हो रही उठापठक का है। करार या है? देशहित में कितना कारगर है? और इसकी महत्ता या है? इन प्रश्नों से शायद ही देश की एक बड़ी आबादी वाकिफ हो। लेकिन, यह भी सच है कि करार को लेकर कांग्रेस और वामदलों के बीच पैदा हुई तकरार आखिर उस माे़ड पर आ पहुंची, जहां देश की जनता पर मध्यावधि चुनाव थोपा जा सकता है। तब शायद लोगों को मजबूरन सोचना पड़े कि आखिर यह करार थी या बला? लेकिन, अब राजनितिज्ञों की बदली नीति की बदौलत शायद ऐसी नौबत न आए। चार साल संयु त प्रगतिशील गठबंधन में अछूत रही सपा ने ऐन व त पर कुछ ऐसे संकेत दिए हैं कि सरकार पर लटकी तकरार की तलवार और आम जनता पर थोपे जाने वाले मध्यावधि चुनाव शायद कुछ समय के लिए टल जाएं। चार साल पहले लोकसभा चुनाव में जब सपा को ३९ सींटे मिली थीं, तब माना जा रहा था कि सरकार बनाने की कुंजी सपा के हाथ में होगी। लेकिन, हालात कुछ ऐसे बने कि चुनाव के बाद चौथी सबसे बड़ी पार्टी के रूप में उभरी सपा को पछूने वाला कोई नहीं रहा। लेकिन, अब अचानक सपा यूपीए की तारणहार बन गई है। मुलायम के अमर ने राजनीति की बिसात पर कुछ ऐसी गोटियां बिछाइंर् कि लाल झंडे का रंग भी अब फीका पड़ता दिखाई दे रहा है। पूरे साल करार को लेकर देश में सुर्खियों में रहा लाल रंग आने वाले समय में कितना चोखा होगा, यह तो व त ही बताएगा। लेकिन, सपा के एक सिपहसलार ने इस बार फिर राज की ऐसी नीति चली कि बड़े-बड़े चित हो गए।
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Wednesday, July 2, 2008
अपनी बात
मैं उन लोगों से सख्त नफरत करता हूं, जो बनावटी दुनिया में जीने में विश्वास रखते हैं, झूठ बोलते हैं और दूसरों की टांग खिंचकर अपना उल्लू सीधा करते हैं। ऐसे लोग अकसर अपनी ही बात से मुकर जाते हैं, उन्हें सिर्फ दूसरों की गलतियां दिखाई देती हैं, अपनी तमाम मूर्खताआें पर वह किसी भोलेपन की चादर में ओढ दूसरों केसामने नासमझी को ढोंग करते हैं। खुद अगर कोई नामसझी करें तो वह उनका भोलापन होता है और दूसरा कोई करे तो वह बड़ी गलती हो जाती है। ऐसे लोगों को जो काम आता है, वह बड़ा काम होता है और जो उन्हें नहीं आता वह सिर्फ काम होता है। या कई बार कुछ होता ही नहीं है। वे तमाम बातें जानते हुए भी दूसरों के सामने नासमझ बनने का नाटक करते हैं और व त आने पर पलटवार करते हैं। ऐसे व्यि तयों की नजर में कोई भी व्यि त तब तक अच्छा होता है, जब तक अमुक व्यि त के जरिए उनके निहित स्वार्थों की पूर्ति होती है।
इन सब बातों के बावजूद मेरा मानना है कि ऐसे व्यि त भले ही दूसरे व्यि तयों को मानसिक तनाव दें, लेकिन वह खुद भी कभी चैन से नहीं रहते। वह हमेशा एक डरा-डरा सा जीवन जीते हैं, परेशान रहते हैं और दुनिया को मूर्ख समझने की मूर्खता कर खुद सबसे बड़े मुर्ख बन रहे होते हैं।
एक मित्र को सलाहऱ्यर्थात में जिओ, अपनी कमियों को स्वीकार करते हुए उन पर अमल करो, योंकि मैं जनता हूं तुम अंदर से इतने बुरे भी नहीं।
इन सब बातों के बावजूद मेरा मानना है कि ऐसे व्यि त भले ही दूसरे व्यि तयों को मानसिक तनाव दें, लेकिन वह खुद भी कभी चैन से नहीं रहते। वह हमेशा एक डरा-डरा सा जीवन जीते हैं, परेशान रहते हैं और दुनिया को मूर्ख समझने की मूर्खता कर खुद सबसे बड़े मुर्ख बन रहे होते हैं।
एक मित्र को सलाहऱ्यर्थात में जिओ, अपनी कमियों को स्वीकार करते हुए उन पर अमल करो, योंकि मैं जनता हूं तुम अंदर से इतने बुरे भी नहीं।
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तेल का खेल
सिन्धु झा
ऊर्जा सुरक्षा के नाम पर अभी अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर तेल का खेल जारी रहेगा। तेल की कीमतें बढ़ने के लिए अमेरिका की खाड़ी राजनीति तो जिम्मेवार है साथ ही तेल को एक हथियार के रूप में भी अमेरिका इस्तेमाल कर रहा है। पश्चिमी देश भारत और चीन जैसे विकासशील देशों के खिलाफ इसका इस्तेमाल कर सकते हैं, ताकि दोनों देश विकास के पथ पर तेजी से आगे बढ़कर चुनौती न दे सकें। जानकारों का कहना है कि विश्व स्तर पर मौजूदा मूल्य वृद्धि भारत और चीन पर दबाव बनाने की रणनीति का हिस्सा हो सकता है। भारत सालाना १२_कराे़ड टन कच्चे तेल का आयात करता है। लगभग इतना ही चीन भी आयात कर रहा है। इस समय अमेरिकी, ब्रिटिश, फ्रेंच, जर्मन और रूसी कंपनियों का सिंडीकेट कच्चे तेल की कीमतों को तय करते हैं। न्यूयॉर्क_कमोडिटी_ए सचेंज (निमे स)_में कच्चे तेल का वायदा कारोबार होता है, जिसका लाभ बिचौलिये उठाते हैं। सिंडीकेट बाजार में तेल की कमी दिखाने के लिए कम माल खरीदते हैं और उसे ऊंची कीमत में बेचते हैं।
केंद्रीय पेट्रोलियम मंत्री मुरली देवड़ा_ने बताया कि तेल के कारोबार में अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर हो रही सट्टेबाजी की वजह से कीमतें बढ़ रही हैं। जब तक सट्टेबाजी पर अंकुश नहीं लगेगा पेट्रोलियम पदार्थों की कीमतें स्थिर नहीं होंगी। कुछ दिनों पूर्व अमेरिकी कंपनी गोल्डमैन_सै स ने कच्चे तेल की कीमत बढ़कर २००_डॉलर प्रति बैरल हो जाने की जो भविष्यवाणी की उसे भी तेल के खेल का एक सुनियोजित हिस्सा माना जा रहा है। चर्चा है कि तेल सिंडीकेट के सुझाव पर ही गोल्डमैन_ने काल्पनिक बयान दिया था। इस रणनीति को गरीब और विकासशील देशों को तेल के नाम पर डराने की कोशिशों के रूप में देखा जा रहा है। तेल आयातक देशों के लिए सर्वाधिक चिंता की बात अभी तक यह है कि जो भी तेल उत्पादक देश हैं उनकी सरकारें पारदर्शी नहीं हैं। सबसे बड़े तेल उत्पादक देश सऊदी अरब में राजशाही_है, तो लीबिया में तानाशाही है। ईरान में धार्मिक कट्टरपंथ हावी है तो इराक एक विफल राष्ट्र बन चुका है। इन देशों की तेल कंपनियों के साथ पश्चिमी सिंडीकेट का 'अनहोली`_यानी अपवित्र सांठगांठ होना बताया जाता है। सूत्रों के अनुसार मौजूदा स्थिति में भारत और चीन में तेल की जितनी खपत बढ़ेगी उसी आधार पर विश्व बाजार में तेल के दाम भी बढ़ाए जाएंगे। पश्चिमी देशों की पूरी कोशिश और दबाव है कि भारत पेट्रोलियम पदार्थों से सब्सिडी पूरी तरह हटाए।
-साभार अमर उजाला
ऊर्जा सुरक्षा के नाम पर अभी अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर तेल का खेल जारी रहेगा। तेल की कीमतें बढ़ने के लिए अमेरिका की खाड़ी राजनीति तो जिम्मेवार है साथ ही तेल को एक हथियार के रूप में भी अमेरिका इस्तेमाल कर रहा है। पश्चिमी देश भारत और चीन जैसे विकासशील देशों के खिलाफ इसका इस्तेमाल कर सकते हैं, ताकि दोनों देश विकास के पथ पर तेजी से आगे बढ़कर चुनौती न दे सकें। जानकारों का कहना है कि विश्व स्तर पर मौजूदा मूल्य वृद्धि भारत और चीन पर दबाव बनाने की रणनीति का हिस्सा हो सकता है। भारत सालाना १२_कराे़ड टन कच्चे तेल का आयात करता है। लगभग इतना ही चीन भी आयात कर रहा है। इस समय अमेरिकी, ब्रिटिश, फ्रेंच, जर्मन और रूसी कंपनियों का सिंडीकेट कच्चे तेल की कीमतों को तय करते हैं। न्यूयॉर्क_कमोडिटी_ए सचेंज (निमे स)_में कच्चे तेल का वायदा कारोबार होता है, जिसका लाभ बिचौलिये उठाते हैं। सिंडीकेट बाजार में तेल की कमी दिखाने के लिए कम माल खरीदते हैं और उसे ऊंची कीमत में बेचते हैं।
केंद्रीय पेट्रोलियम मंत्री मुरली देवड़ा_ने बताया कि तेल के कारोबार में अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर हो रही सट्टेबाजी की वजह से कीमतें बढ़ रही हैं। जब तक सट्टेबाजी पर अंकुश नहीं लगेगा पेट्रोलियम पदार्थों की कीमतें स्थिर नहीं होंगी। कुछ दिनों पूर्व अमेरिकी कंपनी गोल्डमैन_सै स ने कच्चे तेल की कीमत बढ़कर २००_डॉलर प्रति बैरल हो जाने की जो भविष्यवाणी की उसे भी तेल के खेल का एक सुनियोजित हिस्सा माना जा रहा है। चर्चा है कि तेल सिंडीकेट के सुझाव पर ही गोल्डमैन_ने काल्पनिक बयान दिया था। इस रणनीति को गरीब और विकासशील देशों को तेल के नाम पर डराने की कोशिशों के रूप में देखा जा रहा है। तेल आयातक देशों के लिए सर्वाधिक चिंता की बात अभी तक यह है कि जो भी तेल उत्पादक देश हैं उनकी सरकारें पारदर्शी नहीं हैं। सबसे बड़े तेल उत्पादक देश सऊदी अरब में राजशाही_है, तो लीबिया में तानाशाही है। ईरान में धार्मिक कट्टरपंथ हावी है तो इराक एक विफल राष्ट्र बन चुका है। इन देशों की तेल कंपनियों के साथ पश्चिमी सिंडीकेट का 'अनहोली`_यानी अपवित्र सांठगांठ होना बताया जाता है। सूत्रों के अनुसार मौजूदा स्थिति में भारत और चीन में तेल की जितनी खपत बढ़ेगी उसी आधार पर विश्व बाजार में तेल के दाम भी बढ़ाए जाएंगे। पश्चिमी देशों की पूरी कोशिश और दबाव है कि भारत पेट्रोलियम पदार्थों से सब्सिडी पूरी तरह हटाए।
-साभार अमर उजाला
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तेल का खेल
Tuesday, June 24, 2008
मोबाइल के फायदे
----मोबाइल के फायदे ----
आज हर कोई मोबाइल का आदी होता जा रहा है। इस के बढ़ते नशे ने हर एक को जकड़ लिया है। चाहे वो बच्चा हो जा बुजुर्ग कोई नही जो इस नशे को छोड़ने को तैयार हो। इस नशे का असर हमारी समरण शक्ति पर भी हो रहा है। जिस से हम सब अंजान है। पहले जहां हर बात हम आसानी से याद रखते थे आज हम छोटी-छोटी बात के लिए मोबाइल पर निर्भर होने लगे हैँ। चाहे कोई अपना काम हो या फिर किसी को याद कराने का काम। हर छोटी बात को मोबाइल पर डाल कर याद करने की कोशिश करना कितना आसान लगने लगा है। इतना ही नही मोबाइल की मैमोरी मैं अपने रोजाना मैं इस्तेमाल होने वाले नंबर को लिख कर कितना हल्का महसूस होता है जैसे कितना बढ़ा बोझ उतर गया। बस एक बटन दबाया और मिल गया नंबर। जिसे याद करने के लिए हम कितनी कोशिश करते घर की दीवार, कॉपी या डायरी का इस्तेमाल होता था। पहले हम को नंबर भी याद रहते थे। पर आज याद रखने का सवाल ही नही होता मोबाइल है न हर मर्ज़ की दवा। मोबाइल का एक और फायदा देखने को मिल रहा है। आसानी से हम झूठ बोलने के आदी होते जा रहे है। इतना ही नही एसएमएस फंडा भी बडा काम का है। जहां भी बैठे हो बात करो किसी को कानों कान ख़बर नही कहा लगे हो। साइंस के तरक्की करने का फायदा किसी को मिले न मिले प्रेम रोग के शिकार मरीज़ इस का भरपूर लाभ ले रहे हैँ। अब घर में चिठ्ठी पकड़े जाने का डर भी ख़तम हो गया हैँ मोबाइल पर संदेश भेजा और उत्तर के लिए इंतजार भी नही करना पड़ता। लेकिन कहते है की मोबाइल का ज्यादा फायदा नुकसान की देता है। इस लिए इस्तेमाल करेँ पर संभल कर।
आज हर कोई मोबाइल का आदी होता जा रहा है। इस के बढ़ते नशे ने हर एक को जकड़ लिया है। चाहे वो बच्चा हो जा बुजुर्ग कोई नही जो इस नशे को छोड़ने को तैयार हो। इस नशे का असर हमारी समरण शक्ति पर भी हो रहा है। जिस से हम सब अंजान है। पहले जहां हर बात हम आसानी से याद रखते थे आज हम छोटी-छोटी बात के लिए मोबाइल पर निर्भर होने लगे हैँ। चाहे कोई अपना काम हो या फिर किसी को याद कराने का काम। हर छोटी बात को मोबाइल पर डाल कर याद करने की कोशिश करना कितना आसान लगने लगा है। इतना ही नही मोबाइल की मैमोरी मैं अपने रोजाना मैं इस्तेमाल होने वाले नंबर को लिख कर कितना हल्का महसूस होता है जैसे कितना बढ़ा बोझ उतर गया। बस एक बटन दबाया और मिल गया नंबर। जिसे याद करने के लिए हम कितनी कोशिश करते घर की दीवार, कॉपी या डायरी का इस्तेमाल होता था। पहले हम को नंबर भी याद रहते थे। पर आज याद रखने का सवाल ही नही होता मोबाइल है न हर मर्ज़ की दवा। मोबाइल का एक और फायदा देखने को मिल रहा है। आसानी से हम झूठ बोलने के आदी होते जा रहे है। इतना ही नही एसएमएस फंडा भी बडा काम का है। जहां भी बैठे हो बात करो किसी को कानों कान ख़बर नही कहा लगे हो। साइंस के तरक्की करने का फायदा किसी को मिले न मिले प्रेम रोग के शिकार मरीज़ इस का भरपूर लाभ ले रहे हैँ। अब घर में चिठ्ठी पकड़े जाने का डर भी ख़तम हो गया हैँ मोबाइल पर संदेश भेजा और उत्तर के लिए इंतजार भी नही करना पड़ता। लेकिन कहते है की मोबाइल का ज्यादा फायदा नुकसान की देता है। इस लिए इस्तेमाल करेँ पर संभल कर।
Monday, June 23, 2008
ऐ भाई जरा सोचो तो
.......... ऐ भाई जरा सोचो तो आज इतनी तेज रफ्तार जिन्दगी में हर वक्त बस कल की चिंता में डूबे रहते है। आज के बारे में सोचने बेठै तो भी कल की चिंता सताने लगती है की कल कैसा होगा कल किया होगा। इस चक्कर में लोग पंडितो और तांत्रिको के दरवाज़े पर दस्तक देने वालो की भीड़ बढ़ती जा रही है। अपनी जेब ढ़ीली कर लोग उन को माला माल कर रहे है। जरा भाई एक पल के लिए मेरी बात पर गौर तो फरमाएं की किस के दहलीज पर आप माथा टेकने जा रहे है। अगर वो कल के बारे में जानते तो किया अपना कल ना सवार पाते। क्यों ये दुकानदारी खोल कर लोगों की आंखों पर पट्टी बांधने का काम करते। लेकिन आप तो अपना कल ख़ुद ही खराब कर रहे हैं । इन की जेब भर कर। ये मैं इस लिए बता रही हूं। आज मेरे पास कुछ इस तरह का मामला आया तांत्रिको के चक्कर में पड़ कर एक आदमी ने अपनी पूंजी तो गवां दी साथ में अपना जीवन भी तबाह कर लिया। रोज अखवारो के पन्नो पर एक आध ऐसी खबर पढ़ने को मिल ही जाती है जिस में तांत्रिक के चक्कर में लड़के या लड़की की बलि दे दी। लेकिन फिर भी हम पढ़े लिखे लोग आंखों पर पट्टी बांध कर उन के दरवाजों पर पहुंच जाते है। एक तरफ तो हम सब कहते रहते हैं हम पढ़े लिखे हैं, लेकिन दूसरी तरफ़ अनपढ़ लोगों की तरह इन की बातों पर बिश्वास कर आंखे बंद कर लेते हैं। पता नही कब हम लोग गहरी नींद से जग पायेंगे और कब तक हम इन के चक्कर मै अपनी जमा पूंजी को बर्बाद करते रहेंगे। उस पल का इंतजार मुझ को तो हैं। अगर आप को हैं तो ख़ुद से शुरूआत करेँ। क्योंकि एक-एक जुड़ कर ही काफिला तैयार होगा और हम नया सवेरा ला पांएंगें।
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समाज
Thursday, June 19, 2008
ताकि बलात्कार का सौदा न हो
राष्ट्रीय महिला आयोग ने बलात्कार पीड़ित महिलाआें को दो लाख रुपये आर्थिक सहायता देने की योजना बनाई है। इस पैसे से उन्हें पुनर्वास, चिकित्सा और कानूनी सुविधा उपलब्ध कराई जाएगी। राष्ट्रीय महिला आयोग के इस प्रस्ताव पर महिला एवं बाल विकास मंत्री रेणुका चौधरी ने अपनी मुहर लगा दी है। इसमें २०,००० रुपये तत्काल सहायता, ५०,००० रुपये चिकित्सा सहायता और पुनर्वास के लिए दी जाएगी। इसके बाद एक लाख तीस हजार रुपये की अंतिम राशि दी जाएगी।
आयोग की यह पहल निश्चय ही स्वागत योग्य है, लेकिन विभिन्न सरकारी योजनाआें की दशा को देखते हुए मन में कई सवाल भी खड़े करती है। कुछ हजार रुपये के लिए जान तक लेने पर उतारू अपराधी किस्म के लोग सरकारी योजना के दो लाख रुपये हथियाने के लिए तरह-तरह के हथकंडे नहीं अपनाएंगे, ऐसा सोचना भी गलत होगा। दो लाख के लोभ में बलात्कारी और बलात्कार पीड़ित साथ मिलकर साजिश रच सकते हैं। संभव है कि बलात्कार की पुष्टि करने वाले सेहत मुलाजिम, केस की जांच करने वाले पुलिसकर्मी और दो लाख की सहायता मंजूर करने वाले सरकारी अधिकारी तक अपना हिस्सा तय कर इस साजिश में शामिल हो जाएं। ऐसे में बलात्कार के मामलों में अप्रत्याशित वृद्धि से इनकार नहीं किया जा सकता। साथ ही यह तय करना मुश्किल हो जाएगा कि सहायता का सच्चा हकदार कौन है। यदि ऐसा हुआ तो वास्तविक पीड़ित दो लाख रुपये पाने के लिए दफ्तरों के चक्कर ही काटती रह जाएंगी।
योजना को लेकर कुछ आशंकाएं तो आयोग को भी हैं, तभी तो आयोग की अध्यक्ष गिरिजा व्यास कहती हैं कि इसे लागू करने से पहले सहायता के मापदंड बनाए जाएंगे, जिससे इसका दुरुपयोग न हो सके। आयोग को चाहिए कि मापदंड तय करने से पहले इसके विभिन्न पहलुआें पर विशेषज्ञों से राय ले, ताकि पूरी तरह दुरुस्त योजना तैयार हो सके, जिसमें जालसाजों के लिए झोल न हो और पीड़ित पापड़ न बेलते रह जाएं।
आयोग की यह पहल निश्चय ही स्वागत योग्य है, लेकिन विभिन्न सरकारी योजनाआें की दशा को देखते हुए मन में कई सवाल भी खड़े करती है। कुछ हजार रुपये के लिए जान तक लेने पर उतारू अपराधी किस्म के लोग सरकारी योजना के दो लाख रुपये हथियाने के लिए तरह-तरह के हथकंडे नहीं अपनाएंगे, ऐसा सोचना भी गलत होगा। दो लाख के लोभ में बलात्कारी और बलात्कार पीड़ित साथ मिलकर साजिश रच सकते हैं। संभव है कि बलात्कार की पुष्टि करने वाले सेहत मुलाजिम, केस की जांच करने वाले पुलिसकर्मी और दो लाख की सहायता मंजूर करने वाले सरकारी अधिकारी तक अपना हिस्सा तय कर इस साजिश में शामिल हो जाएं। ऐसे में बलात्कार के मामलों में अप्रत्याशित वृद्धि से इनकार नहीं किया जा सकता। साथ ही यह तय करना मुश्किल हो जाएगा कि सहायता का सच्चा हकदार कौन है। यदि ऐसा हुआ तो वास्तविक पीड़ित दो लाख रुपये पाने के लिए दफ्तरों के चक्कर ही काटती रह जाएंगी।
योजना को लेकर कुछ आशंकाएं तो आयोग को भी हैं, तभी तो आयोग की अध्यक्ष गिरिजा व्यास कहती हैं कि इसे लागू करने से पहले सहायता के मापदंड बनाए जाएंगे, जिससे इसका दुरुपयोग न हो सके। आयोग को चाहिए कि मापदंड तय करने से पहले इसके विभिन्न पहलुआें पर विशेषज्ञों से राय ले, ताकि पूरी तरह दुरुस्त योजना तैयार हो सके, जिसमें जालसाजों के लिए झोल न हो और पीड़ित पापड़ न बेलते रह जाएं।
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महिला बलात्कार सहायता सरकारी
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