Sunday 26 October 2008

आखिर भगवा धारियों में उबाल क्यो ?


मालेगांव बम धमाके में साध्वी प्रज्ञा सिंह का नाम आने से 'भगवा' में आखिर उबाल क्यों हैं ? क्या सिर्फ़ मुसलमान ही आंतकी हो सकते हैं ? "भगवाधारी" का जब नाम आया तो सारे भगवाधारी नाराज हो गए । जब मुल्ला, मौलवी और मुसलमानों पर उंगली उठाई जा सकती है, तो हिंदू संगठनों में कुछ भगवाधारियों पर उंगली क्यों नहीं उठ सकती है । चलो कुछ देर के लिए मान लेते हैं कि साध्वी प्रज्ञा का धमाके से कोई संबंध नहीं है, तो डर किस बात की है । साध्वी उमा भारती बिल्कुल ठीक कर रही हैं, लेकिन यह कोई प्रज्ञा का चरित्र प्रमाण पत्र नहीं है, जिसे ठीक समझा जाए । देश से जुड़ी हुई गंभीर बात है, जिस पर सभी दलों को एक होकर काम करना चाहिए । ऐसा नहीं कि देश में कुछ मुसिलम संगठन ही आंतकी गतिविधियों में संलिप्त हैं, हिंदू संगठनों के कुछ मठाधीश भी इस दायरे में आ रहे हैं । हालांकि कभी छात्र नेता रहीं प्रज्ञा का चंबल के आस-पास इलाके में प्रवचन करना लोगों को पच नहीं रहा है । मान लेते हैं कि प्रज्ञा निर्दोष है, तो जांच से घबराना कैसे ? बवाल पर उबाल फैलाने के लिए न्यूज चैनलों ने काम शुरू कर दिया है । कोई मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज को जोड़ रहा है तो कोई वरिष्ठ अफसर से मोहब्बत की बात कर रहा है । छात्र राजनीति के बाद साध्वी बनी प्रज्ञा में क्या बदलाव आया , जिससे उनका नाम आतंकी गतिविधियों से जुड़ गया ? इस पूरे मसले पर भगवाधारी ही नहीं तमाम हिंदू संगठनों को एक होकर गंभीरता से सोचना होगा । पूरे मामले को इमानदारी के साथ जांच होनी चाहिए ।

Wednesday 22 October 2008

किसने बनाया राज ठाकरे को ऐसा?

राज ठाकरे और उनके मवालियों के बारे में कुछ लिखने से पहले काफी देर तक सोचता रहा। गरज ये थी कि ऐसे लोगों के बारे में कुछ लिखना अपनी उर्जा और आपका वक़्त, दोनों बर्बाद करना है। लेकिन दूसरा ख्याल ये था कि अगर 'ठाकरों' के बारे में कुछ नहीं लिखा, तो शायद ये अपने ज़मीर और अपनी कलम के साथ गद्दारी होगी। लिहाज़ा, काफ़ी जद्दोजहद के बाद आखिरकार लिखने का फ़ैसला किया।
सभी जानते हैं कि किसी बच्चे बहकते कदमों को अगर वक़्त रहते नहीं रोका जाए, तो ये कदम अक्सर इतनी दूर नहीं निकल जाते हैं कि फिर उसके लिए लौटना मुश्किल हो जाता है। राज ठाकरे बच्चे तो नहीं हैं, लेकिन उनकी बदमाशियों पर महाराष्ट्र सरकार समेत ज़्यादातर राजनीतिक और गैरराजनीतिक हस्तियों की चुप्पी मुझे एक लापरवाह अभिभावक की जैसी ज़रूर लगती है। कहने की ज़रूरत नहीं है कि राज ठाकरे को अगर वक़्त रहते ही एक मराठी होने से पहले एक हिंदुस्तानी होने का पाठ पढ़ा दिया जाता, तो आज महाराष्ट्र नफ़रत की आग में इस तरह धू-धू कर नहीं जल रहा होता।
मराठी मानुष तरक्की करें, इससे भला किसे ऐतराज़ होगा? महाराष्ट्र में करें, इससे भी किसी को क्या शिकायत होगी? लेकिन मराठियों की तरक्की और उनके लिए जगह बनाने के नाम पर अगर किसी दूसरे सूबे से आए बेगुनाह लोगों के साथ अमानुषिक हरकत की जाए, तो इसे कतई बर्दाश्त नहीं किया जा सकता। लेकिन जिस तरह पहले ही दिन से महाराष्ट्र सरकार राज नाम के 'नासूर' को हल्के तौर पर ले रही है, ये उसी का नतीजा है कि आज हालात हाथ से बाहर होते जा रहे हैं। कुछ माह पहले जब राज ने मराठियों को रिझाने के लिए गैरमराठियों का अपमान किया था, जया बच्चन के बहाने यूपी-बिहार पर हमला बोला था, तभी अगर उन्हें कानूनी तौर पर कड़ी सबक सिखा दी गई होती, तो आज महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना के मवालियों के हौसले इतने बुलंद नहीं होते। लेकिन तब महाराष्ट्र सरकार ने इस मामले पर कानूनी राय लेने की बात कह कर इसे अनदेखा करने की कोशिश की। इससे पहले भी सरकारें उनके चाचा बाल ठाकरे के साथ ऐसा ही करती रही हैं। लेकिन सोचिए कि अगर ऐसी ही कोई हरकत किसी आम आदमी ने की होती, तो यही सरकार और इसी पुलिस ने उसी कानून की दुहाई दे कर उस आम आदमी की खाल में भूसा भर दिया होता।
जैसे किसी की जान लेनेवाला शख़्स भी ख़ुद को हर हाल में जस्टीफ़ाई करने की कोशिश करता है, ठीक उसी तरह अपनी गुंडागर्दी के बाद महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना भी ख़ुद को सही साबित करने में जुटी है। उस रोज़ जब एक चैनल के एंकर ने राज के एक चेले (कोई राऊत नाम है उसका) से इन हरकतों का सबब पूछा तो उसने झट असम और उत्तर पूर्व के राज्यों में जारी बिहारी विद्वेष की दुहाई दे डाली। मानों उत्तर पूर्व के कुछ लोग अगर बिना सोचे समझे कुएं में कूद जाएं, तो वो भी कूद जाएंगे। लेकिन इन मवालियों को ये कौन समझाए कि अगर तमाम मराठियों के साथ पूरे देश में भी यही सुलूक किया जाने लगे, तो महाराष्ट्र और मराठी मानुष का क्या होगा? वैसे जमशेदपुर में जिस तरह टाटा मोटर्स के अधिकारी एस।बी. बोरवंकर (मराठी होने की वजह से) के घर हमला हुआ, उससे तो लगता है कि अब शायद इस तरह की वारदातों की शुरुआत हो चुकी है। लेकिन ये सिर्फ़ मराठियों के लिए नहीं, बल्कि पूरे देश के लिए एक चिंता की बात है। क्योंकि अगर हर तरफ़ क्षेत्रीयता के नाम पर लड़ाई शुरू हो जाए, तो किसी गृहयुद्ध से कम नहीं होगा। लेकिन भला हो हमारे मुल्क के राजनेताओं का, जिन्हें वोटबैंक के सिवाय शायद कुछ भी नज़र नहीं आता।
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अपने एक पत्रकार साथी ने राज की करतूतों पर कुछ ऐसे विचार भेजे हैं। आप भी ग़ौर करें।
Yes, we all should support Raj Thackeray and take his initiative ahead by doing more...
We should teach our kids that if he is second in class, don't study harder.. just beat up the student coming first and throw him out of the school
Parliament should have only Delhiites as it is located in delhi
Prime-minister, president and all other leaders should only be from Delhi
No Hindi movie should be made in Bombay. Only Marathi.
At every state border, buses, trains, flights should be stopped and staff changed to local men
All Maharashtrians working abroad or in other states should be sent back as they are SNATCHING employment from Locals
Lord Shiv, Ganesha and Parvati should not be worshiped in our state as they belong to north (Himalayas)
Visits to Taj Mahal should be restricted to people from UP only
Relief for farmers in Maharashtra should not come from centre because that is the money collected as Tax from whole of India, so why should it be given to someone in Maharashtra?
Let's support Kashmiri Militants because they are right in killing and injuring innocent people for the benefit of their state and community..
Let's throw all MNCs out of Maharashtra, why should they earn from us? We will open our own Maharashtra Microsoft, MH Pepsi and MH Marutis of the world
Let's stop using cellphones, emails, TV, foreign Movies and dramas. James Bond should speak Marathi
We should be ready to die hungry or buy food at 10 times higher price but should not accept imports from other states
We should not allow any industry to be setup in Maharashtra because all machinery comes from outside
We should STOP using local trains... Trains are not manufactured by Marathi manoos and Railway Minister is a Bihari
Ensure that all our children are born, grow, live and die without ever stepping out of Maharasthra, then they will become true Marathis
--Sumit Nagpal

Tuesday 21 October 2008

रानीगंज में माकपाइयों की गुण्‍डागर्दी, सांस्‍कृतिक कार्यक्रम रद्द कराया

नन्‍दीग्राम से जारी माकपा की गुण्‍डागर्दी का एक नमूना पिछले दिनों देखने को मिला। रानीगंज (प. बंगाल) के सांस्कृतिक-सामाजिक मंच 'मानविक' द्वारा आयोजित 'गणमित्र सम्मान समारोह' (19-20 अक्टूबर, 2008) को भारत की कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्‍सवादी) के स्थानीय नेताओं और कार्यकर्ताओं ने गुण्डागर्दी और धमकियों द्वारा आतंक फैलाकर स्थगित करने पर विवश कर दिया। माकपा का यह सांस्कृतिक आतंकवाद .एस.एस.-विहिप-भाजपा आदि के ''सांस्कृतिक राष्ट्रवाद'' की ही तरह यह माकपा के ''सांस्कृतिक जनवाद'' का एक नमूना है।
रानीगंज (प. बंगाल) की सामाजिक-सांस्कृतिक संस्था 'मानविक' इस वर्ष पाँचवाँ गणमित्र सम्मान कवयित्री और सामाजिक-सांस्कृतिक कर्मी कात्यायनी को देने वाली थी। यह सम्मान सुविख्यात बांग्ला लेखिका महाश्वेता देवी के हाथों दिया जाना था। इस अवसर पर आयोजित दो दिवसीय सांस्कृतिक आयोजन (19-20 अक्टूबर) के दौरान दो परिसंवाद, कविता-मंचन और फिल्म प्रदर्शन के कार्यक्रम और कवयित्री सम्मेलन भी होने थे। इस आयोजन में स्थानीय और निकटवर्ती रचनाकारों-संस्कृतिकर्मियों के अतिरिक्त दिल्ली, कोलकाता, पटना, रांची, भोपाल आदि शहरों के कई लेखक-कवि-संस्कृतिकर्मी भी हिस्सा लेने वाले थे।
इस आयोजन के क़रीब हफ्ता भर पहले से माकपा के कार्यकर्ताओं ने रानीगंज में धमकी और गुण्डागर्दी का सिलसिला शुरू कर दिया। न केवल आयोजकों और उनके परिवारों को तबाह कर देने की धमकी दी गयी, बल्कि इस बात का व्यापक प्रचार किया गया कि आयोजन में भाग लेने वालों को गम्भीर परिणाम भुगतने के लिए तैयार रहना चाहिए। 'मानविक' के अध्यक्ष के पिता को, जो हृदय रोग से गम्भीर रूप से ग्रस्त हैं, धमकाया गया कि उनका परिवार और व्यवसाय तबाह कर दिया जायेगा। सचिव और अन्य सहयोगियों को धमकी दी गयी कि वे रानीगंज में रह नहीं पायेंगे। विभिन्न शहरों में आमन्त्रितों को फोन करके और माकपा के सांस्कृतिक संगठनों के सूत्रों से दबाव डलवाकर उक्त आयोजन में हिस्सा लेने से रोका गया। माकपा के स्थानीय लोगों का कहना था कि यह आयोजन दो शर्तों पर हो सकता है। पहली शर्त, इसमें महाश्वेता देवी न आयें क्योंकि वे वाममोर्चा सरकार की नीतियों की मुखर आलोचक रही हैं और नन्दीग्राम में माकपा-विरोधी मुहिम का उन्होंने भी समर्थन किया था। दूसरी शर्त, यह थी कि कात्यायनी को माकपा के विरुध्द एक शब्द भी नहीं बोलना होगा और सम्मान ग्रहण करने के अतिरिक्त किसी प्रकार के राजनीतिक-सांस्कृतिक प्रचारकार्य में हिस्सा नहीं लेना होगा। ज़ाहिर है कि आयोजकों ने इन अपमानजनक शर्तों को स्वीकार नहीं किया और स्थानीय तौर पर क़ायम व्यापक आतंक राज के चलते विगत 16 अक्टूबर को उन्हें यह आयोजन स्थगित करने की घोषणा करनी पड़ी।
कोलकाता और प. बंगाल के अन्य नगरों के अख़बारों में और टी.वी. चैनलों पर इस ख़बर के आने के बाद जब महाश्वेता देवी ने भी क्षोभ प्रकट करते हुए बयान दिया और संस्कृतिकर्मियों ने बड़े पैमाने पर विरोध प्रकट किया, तो पश्चिम बंगाल के एक माकपा-सम्बध्द सांस्कृतिक संगठन और एक लेखक संगठन के प्रतिनिधि ने बयान दिया कि महाश्वेता देवी का माकपा-विरोध जगज़ाहिर है और कात्यायनी नक्सल राजनीति से जुड़ी हैं।
यदि विचारों में धुर-विरोध है, तो माकपाइयों को वैचारिक विरोध और बहस के जनवादी तरीक़ों का ही इस्तेमाल करना चाहिए, न कि गुण्डागर्दी और आतंक-राज का सहारा लेना चाहिए। जो लोग वैचारिक विरोध का यह तरीक़ा अपनाते हैं वे लोग हुसैन की कला-प्रदर्शनी पर बजरंगदली फसिस्टों के हमले और तोड़फोड़ की राजनीति का विरोध भला किस मुँह से करते हैं?
रही बात नक्सलवादी होने के आरोप की, तो माकपा और भाकपा जैसी पार्टियां सत्ताभोगी, संसदमार्गी, अर्थवादी राजनीति करती हैं और संशोधनवादी हैं। चीन मार्का ''बाज़ार समाजवाद'' बर्बर और निरंकुश सर्वसत्तावादी पूँजीवाद है। लेकिन साथ ही, आतंकवाद या ''वामपन्थी'' दुस्साहसवाद की राजनीति भी पूरी तरह गलत है। नक्सलवाद अपने आप में कोई राजनीतिक कैटेगरी नहीं है। प्राय: इस श्रेणी में आतंकवादी वामपन्थी धारा और क्रान्तिकारी जनसंघर्ष की धारा - दोनों को शामिल कर लिया जाता है। हम क्रान्तिकारी जनसंघर्षों के पक्षधर हैं और माकपा की ''बाज़ार-समाजवादी'' आर्थिक नीतियों का और उस कुलीन मध्यवर्गीय सुधारवादी धर्मनिरपेक्षता का विरोध करते हैं जो साम्प्रदायिक फासीवाद के विरुध्द व्यापक जनता को सड़कों पर लामबन्द करने के बजाय संसद में कभी कांग्रेस तो कभी सपा तो कभी बसपा के साथ गँठजोड़ करने और राजधानी की सड़कों पर फ़ासीवाद का रस्मी विरोध करने में यक़ीन रखती है। माकपा के संशोधनवाद का विरोध करना और क्रान्तिकारी वामपन्थी विचारों की हिमायत करना यदि नक्सलवाद है तब नक्सलवादी कहलाने में कोई परहेज नहीं है।
रानीगंज प्रसंग वस्तुत: नन्दीग्राम प्रसंग की सांस्कृतिक दायरे में पुनरावृत्ति मात्र है। मुद्दा चाहे आर्थिक हो या सांस्कृतिक, माकपा का रवैया सभी मामलों में निरंकुश सर्वसत्तावादी ही होता है। माकपा-भाकपा जैसी पार्टियाँ पूरी दुनिया की अन्य सामाजिक-जनवादी पार्टियों और एन.जी.ओ. की तरह, नवउदारवादी आर्थिक नीतियों के विकल्प के लिए संघर्ष करने के बजाय उन्हें मात्र ''मानवीय चेहरा'' देने लायक पैबन्दसाज़ी करना चाहती हैं। इनका मॉडल चीन का ''बाज़ार समाजवाद'' है जो बर्बर फ़ासिस्ट तरीक़े से वहाँ लागू हो रहा है। नन्दीग्राम ने सिद्ध कर दिया है मौक़ा मिलने पर माकपा भी उसी तरीक़े से नवउदारवादी नीतियों को लागू करेगी। माकपा के गुण्डा राज की वास्तविक झलक पानी हो तो कोलकाता से बाहर प. बंगाल के अन्य छोटे-छोटे शहरों-कस्बों में जाना पड़ेगा। वैसे कोलकाता में भी इसकी बानगी देखने को मिल जाती है। माकपा का ''समाजवाद'' दिल्ली में कुलीन लिजलिजे सुधारवाद के रूप में सामने आता है और प. बंगाल में सामाजिक फ़ासीवाद (चेहरा समाजवादी, आचरण फ़ासीवादी) के रूप में सामने आता है।

कब तक माफी मांगते रहोगे भज्जी !

विनोद के मुसान
अभी ज्यादा दिन नहीं हुए, जब आस्ट्रेलियाई गेंदबाज सायंमड और भज्जी विवाद एक लंबे एपिसोड के बाद खत्म हुआ। उस व त बात भारतीय संप्रभुता की थी, इसलिए पूरा देश भज्जी के साथ खड़ा था। इससे पहले भी भारतीय क्रिकेट टीम में स्थापित हो चुकेइस फिरकी गेंदबाज ने कई गलतियां की। जिनकी वे हर बार 'नादान` बनकर माफी मांग लेते हैं। व्यवसायिक विज्ञापन फिल्मों में बाल खोलकर नाचने का मामला हो या अंतरराष्ट ्रीय फेम पर मैच के दौरान अपने प्रतिद्वंद्वी खिलाड़ियों से बार-बार पंगा लेने की बात, भज्जी का नाम हर बार उभरकर आया। थप्पड़ विवाद के समय लोगों ने कहा, भज्जी अब तो आपने हद कर दी। जालंधर में बैठी भज्जी की मां बोली, 'मेरा पुत्तर इंज नहीं कर सकदा`। लेकिन, टीवी स्क्रीन पर श्रीसंत के बहते आंसू सबने देखे, जो व्यथित था अपने साथी खिलाड़ी के दुर्व्यवहार से। इस एपिसोड का अंत भी भज्जी की माफी के साथ हुआ। हालांकि इसके लिए उन्हें कुछ मैचों में प्रतिबंध की सजा भी भुगतनी पड़ी। लेकिन, अब 'सीता-रावण` विवाद के बाद लगता है विवादों में रहना भज्जी की नियति बन गई है। वे सुधरकर भी सुधरना नहीं चाहते। वे हर बार ऐसी गलती कर जाते हैं, जिसे नजरअंदाज नहीं किया जा सकता है और फिर अगले दिन कहते हैं 'मैनूं माफ कर दो`। गलतियां भी इनसान से ही होती हैं। हम और आप भी आए दिन कुछ न कुछ गलतियां कर गुजरते हैं। लेकिन, अगर गलती एक 'शख्सियत` करती है, तो फिर गलती के मायने बदल जाते हैं। गलती 'महा-गलती` बन जाती है। बताने की जरूरत नहींं है कि एक अंतरराष्ट ्रीय परिदृश्य का व्यि त अगर कुछ गलत कर गुजरता है तो समाज पर उसका या प्रभाव पड़ता है। भज्जी को भी यह बात समझनी चाहिए कि वे अब जालंधर के बल्टन पार्क में खेलने वाला कोई मामूली 'मुंडा` नहीं है। वह एक अंतरराष्ट ्रीय शख्सियत है, जिसकी हर बात एक अंतरराष्ट ्रीय खबर बन जाती है। ताजा विवाद में तो भज्जी ने हद ही पार कर दी। अब वे कह रहे हैं, ऐसा उनसे अंजाने में हो गया। कोई भी कहेगा भज्जी आप 'दूध पीते बच्चे` तो नहींं हैं, जो आपसे अनजाने में हर बार गलतियां हो जाती हैं। किसी की धार्मिक भावनाआें को ठेस पहंुचाना भारत में अपराध है और आप अकसर यह अपराध कर जाते हैं।
अंत में
माफी मांग कर कोई छोटा नहीं हो जाता, अच्छी बात है, भज्जी भी इसका अनुसरण करते हैं। लेकिन, उन्हें सीख लेनी चाहिए अपने वरिष्ठ साथी सचिन तेंदुलकर से जो बुलंदियों के शिखर पर पहुंचकर आज भी स्वच्छ और सफेद चादर लिए खड़े है।

Monday 20 October 2008

बचाए रखो बिटिया की मुस्कुराहट


कर्मपाल गिल
वह घर कितना भाग्यशाली होता है, जहां बेटी जन्म लेती है। वह मां-बाप भी कितने खुशनसीब होते हैं, जिनकी गोद में प्यारी सी बिटिया होती है। लड़की की खिलखिलाहट, उसका हर काम पूरे घर में उल्लासपूर्ण माहौल बनाए रखता है। बेटी वह देवी है, जो हर समय घर को रोशन बनाए रखती है। इसके बनिस्बत जिस घर में चाहे चार बेटे हों, लेकिन एक कन्या नहीं हो तो, वहां का माहौल उदासीन सा रहता है। घर में वह रौनक दिखाई ही नहीं देती, जो बेटी के होने से होती है। अ सर आंगन सूना-सूना सा नजर आता है।
जब बेटी बड़ी हो जाती है, तो उस पर कई जिम्मेदारियां भी आ जाती हैं। वह मां के काम में हाथ भी बंटाती है। स्कूल से जब कालेज जाने लगती है तो साथ-साथ जवानी की सीढ़ियां भी चढ़ने लगती है। यह समय बिटिया के लिए ज्यादा महत्वपूर्ण होता है। उसे घर से बाहर इधर-उधर के तानों से बचना होता है। घर की इज्जत भी बचाकर रखनी होती है। लेकिन परमात्मा ने कन्या को ऐसा वरदान दिया है कि इस तरह के अनगिनत गंभीर हालातों का सामना करने के बावजूद वह हर समय खुश नजर आती है। घर में बेटी, बहन का रोल अदा करती है। तो ससुराल में जाने के बाद पत्नी, बहूरानी और भाभी का रोल निभाना पड़ता है।
बेटी के साथ एक और चीज है। वह पापा की बहुत लाडली होती है। हालांकि बेटी अपनी मां के ज्यादा नजदीक होती है। फिर भी जितना प्यार वह पापा से करती है, उतना मां से नहीं करती। वहीं, बाप भी सब कुछ सहन कर सकता है, लेकिन वह बेटी का दुख नहीं देख पाता।
लेकिन दुख की बात यह है कि इसके बावजूद बेटियों को इस धरा पर आने से रोका जा रहा है। यदि वह किसी तरह जन्म ले लेती है, तो झाड़ियों और कू़ड-कर्कट में फेंक दिया जाता है। अस्पतालों के बाहर सरकार और समाजसेवी संस्थाआें द्वारा पालने लगाए जा रहे हैं ताकि जो मां-बाप बेटियों का पालन-पोषण नहीं कर सकते, वह उन्हें इनमें रख जाए। इंसानियत के लिए इससे शर्मनाक शायद और कुछ नहीं हो सकती। साधु महात्मा कहते हैं कि जितना पाप एक हजार गायों को मारने से होता है, उससे भी ज्यादा पाप एक कन्या या कन्या भ्रूण की हत्या से होता है।

Thursday 16 October 2008

सादा जीवन, उच्च विचार, यही पहचान हैं उनकी

विनोद के मुसान
15 अ टूबर को एक संत का जन्मदिन था। बहुत से लोगों को नहीं पता। लेकिनउनका जन्मदिन था। समाचार पत्रों में सरकार, राजनीतिक पार्टियों या किसीसंस्था ने कोई विज्ञापन नहीं दिया। शायद वे आज भी जीवत हैं ! इसलिए।लेकिन वे एक सच्चे संत हैं, इसलिए उनकी तरह उनके 'भ तों` को भी इस बातसे कोई फर्क नहीं पड़ना चाहिए। माफ करना, जिस शख्सियत की मैं बात कररहा हूं, उन्हें कभी सम्मानित मदर टैरेसा या सिस्टर अल्फोंसा की तरह संत कीउपाधि प्रदान नहीं की गई। लेकिन, मेरी नजरों में वे किसी संत से कम नहीं।सादा जीवन उच्च विचार, यही पहचान है उनकी। 15 अ टूबर, 1931 कोरामेश्वरम में एक मछुवारे के घर एक लाल ने जन्म लिया और एक दिन वहअपने कर्मों की बदौलत देश के सर्वोच्च नागरिक बन गए।
नाम बड़ा तो दर्शन भी बड़े। मैं बात कर रहा हूं पूर्व राष्ट ्रपति डा. एपीजे अब्दुल कलाम की। एक ऐसे आदमी कीजिन्होंने भारत को विकसित राष्ट ्र बनाने का सपना देखा। सपने तो हम-तुम भी देखते हैं, लेकिन हमारे सपनों मेंहम अपनी उन्नति को ढूंढते हैं, लेकिन वे हमेशा विश्व कल्याण की बात करते हैं। माफ करना मुझे भी ज्ञात नहीं थाकि उनका जन्मदिन है। दफ्तर में एक खबर का संपादन करते हुए पता चला की फलां-फलां स्कूल में बच्चों ने पूर्वराष्ट्रपति का ७४वां जन्मदिन 'चिल्ड्रन एनोवेशन डे` के रूप में मनाया। अपनी सामान्य जानकारी पर अफसोसहुआ, लेकिन उससे भी ज्यादा अफसोस यह देखकर कि किसी भी राजनीतिक पार्टी या संस्था द्वारा उनके जन्मदिनपर एक बधाई का प्रेस नोट तक जारी नहीं किया गया। जरा-जरा सी बात पर हो-हल्ला करने वाले ये लोग कितनेअवसरवादी हैं, यह देखकर दुख हुआ। इस बात से आप भी अनभिज्ञ नहीं हैं कि इस देश में सोनिया गांधी, राहुलगांधी, मायावती और सत्ता में बैठे ऐसे अन्य नेताआें के जन्मदिन पर पूरे का पूरा शहर बधाई देने वाले होर्डिंग्ससे पाट दिया जाता है। कुछ पूर्व संतों का जन्मदिन आज भी बड़ी धूमधाम से मनाया जाता है। अच्छी बात है।लेकिन, इन सबके पीछे निहित स्वार्थ छीपे हैं। आज कई ऐसे संत हैं, जिन्हें उनके भ तों ने सिर्फ संत नहीं रहनेदिया। बल्कि उनके नाम की आड़ में कई 'संस्थाएं` खोल रखी हैं। जिनको चलाने के लिए उनका जन्मदिन मनानाभी जरूरी हो जाता है। अगर वे ऐसा नहीं करें तो कई लोगों की राजनीतिक और धार्मिक संस्थाएं बंद हो जाएंगी।
खैर इस देश में बुरा लिखने को बुराईयों की कमी नहीं। मिसाइल मैन के जन्मदिन पर मेरी और तमाम दूसरेदेशवासियों की तरफ से उनको ढेर सारी बधाईयां। मैं दुआ करूंगा उनके जीवित रहते उनका सपना जरूर साकार हो, ताकी मेरी तरह इस देश के सौ कराे़ड से ज्यादा लोगों को विकसित भारत में रहने का अवसर प्राप्त हो।

Monday 13 October 2008

ऐसे बाप की नैतिक जिम्मेदारी क्या होनी चाहिए ?

इस देश में जब भी अपराध की कोई बड़ी घटना होती है तो हम तुरंत गृहमंत्री से नैतिक आधार पर इस्तीफे की मांगकर बैठते हैं। ऐसे में जब किसी जिम्मेदार पद पर बैठे बड़े अधिकारी का बेटा ही क्राइम का मास्टरमाइंड निकले तो क्या उससे नैतिक आधार पर इस्तीफा नहीं मांगा जाना चाहिए?
पंजाब के फिल्लौर में पिछले गुरुवार की रात मुंबई के एक व्यापारी से पौने दो करोड़ के हीरे लूट लिए गए थे। लूटकी इतनी बड़ी घटना के बाद पंजाब के पुलिस अधिकारियों में खलबली मच गई थी। पुलिस ने आरोपियों का पता लगाने के लिए कई टीमें बनाई और दो दिनों में ही पूरे मामले का खुलासा कर लूटे गए हीरे बरामद कर लिए। खबरों के मुताबिक लुटेरा निकला विजिलेंस ब्यूरो पटियाला के एसएसपी शिवकुमार का बेटा मोहित शर्मा, जो लुधियाना में हीरों का व्यापारी है। साजिश रचने में उसका सहयोगी निकला खुद एसएसपी का सरकारी गनमैन हरबंस। शक की सूई एसएसपी के एक और गनमैन की ओर इशारा कर रही है, जो अभी पुलिस पकड़ से दूर है। मुंबई के व्यापारी ने गुरुवार दिन में मोहित को हीरे दिखाए थे और रात में लूट की यह वारदात हुई। पुलिस ने मोहित और हरबंस को गिरफ्तार कर लिया है। पुलिस की कामयाबी में मोबाइल काल डिटेल्स की अहम भूमिका रही।
मैं इस राय के बिल्कुल खिलाफ हूं कि बेटे की करतूतों की सजा बाप को दी जाए। लेकिन नैतिक जिम्मेदारी भी कुछ चीज होती है भाई।
विजिलेंस के एसएसपी पर आंतरिक सुरक्षा की बड़ी जिम्मेदारी होती है। उसके पास ऐसी महत्वपूर्ण जानकारियां भी होती हैं, जिसके गलत हाथों में पड़ जाने से देश की आंतरिक सुरक्षा को बड़ा खतरा हो सकता है। ऐसे में जब एसएसपी का बेटा क्राइम का मास्टरमाइंड निकले, तो बड़े साहब जिम्मेदारी से कैसे मुक्त हो सकते हैं? सवाल यह हैकि यदि एसएसपी साहब को पता था कि उसका बेटा कानून को ठेंगा दिखा रहा है तो बाप की चुप्पी या अपराध नहीं है? और यदि उसे अपने बेटे के बारे में ही पता नहीं था कि उसका बेटा गलत रास्ते पर चल रहा है, तो फिर या उसे विजिलेंस के एसएसपी जैसे अहम पद रहने दिया जाना चाहिए? देश के नीति निर्धारकों को इस सवाल पर सोचना होगा। यहां यह भी उल्लेखनीय है कि एसएसपी शिवकुमार पंजाब के पूर्व मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह के खिलाफ चल रही विजिलेंस जांच और पंजाब के पूर्व डीजीपी एसएस विर्क के खिलाफ हो रही जांच में भी शामिल हैं।

Friday 3 October 2008

जुर्माने की रकम कहां जाएगी ये कौन बताएगा

गांधी जयंती से सार्वजनिक स्थलोंपर धुआं उड़ाने वालों पर जुर्माने का प्रावधान कर दिया गया है। यह एक सुकूनदायक फैसला है। इससे उन सभी लोगों को राहत मिलेगी, जो बेवजह इन धूम्रछल्लों को निगलने को मजबूर होते थे। किसी व्यि त की सेहत खराब हो और वह ट्रेन अथवा बस से जा रहा हो, ऐसे में किसी के धूम्रछल्ले उस पर कहर बन कर टूट जाते हैं। बीड़ी-सिगरेट पीने वाले से मना करो तो उल्टे वह 'खली` बनकर रेसलिंग करने को तैयार मिलता। अन्यथा कहेगा कि 'तू कहीं का डीसी लागे है, जो थारे कहे में बीड़ी न पीयूं`।
बहरहाल अब इतना तो तय है कि सरेआम धुआं उड़ाया तो २०० रुपये जुर्माना भरना पड़ेगा। होटल, रेस्तरां, पब और सभी दफ्तर और अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे भी अबसे नो स्मोकिंग जोन रहेंगे। यहां तक कि हु का बार, मनोरंजन पार्क और बस स्टॉप जैसे सार्वजनिक स्थलों पर भी तंबाकू के धुएं के छल्ले नहीं उड़ाए जा सकेंगे।
विस्तृत के लिए क्लिक करें

कैसे खुश होगी 'बापू` की आत्मा

विनोद के मुसान
किसी को अपने घर-दफ्तर या कहीं और पहुंचने की इतनी जल्दी भी हो सकती है, यह देखकर बड़ी हैरानी हुई। मन में गुस्सा आया, सोचा यों इस व्यि से इसी की भाषा में बात की जाए। लेकिन, उसी पल गांधी जी का ध्यान आया और मैं मन मसोस कर रह गया। दूसरा, गांधी जयंती पर गांधीगीरी में भी बात कर सकता था, लेकिन उसका समय नहीं था। इसके बाद मैंने उस वृद्धा को सहारा देते हुए अमुक व्यि पर अफसोस जाहिर किया और आगे बढ़ गया। सोचा, ऐसा तो नहीं होना चाहिए था गांधी जी के सपनों का भारत। इस देश में जहां खचाखच भरी बस में बड़े-बू़ढों को देखकर नौजवान अपनी सीट छाे़ड देते हैं, भला ऐसा कोई कैसे कर सकता है।
दरअसल, साप्ताहिक अवकाश होने के चलते एक मित्र ने खाने पर आमंत्रित किया था। बस स्टैंड पर पहुंचकर मैं बस का इंतजार कर रहा था। तभी, विपरीत दिशा को जाने वाली एक लोकल बस आई और लोग उसमें भे़ड-बकरियों की तरह चढ़ने लगे। यहां तक तो ठीक था। लेकिन, अंत में जैसे ही एक वृद्धा बस में चढ़ने लगी, ठीक उसी पल बस भी चलने लगी। वृद्धा बस में चढ़ पाती, इससे पहले भागता हुआ एक युवक आया और वृद्धा को का देते हुए बस में चढ़ गया। वृद्धा जमीन पर पड़ी ठीक से संभल भी नहीं पाई थी कि बस चल पड़ी। मैं सारा मंजर देख रहा था। इसके बाद मेरे पास दो विकल्प थे। या तो मैं किसी तरह बस रुकवा कर उस युवक को सबक सिखाता या वृद्धा को संभालता। पल भर में मन में कई तरह के ख्याल आए, गुस्सा भी आया और हैरानी भी हुई। उस युवक की कम की लाचारी पर अफसोस करने के बाद अंतत: मैंने वृद्धा को उठाया और बगल की एक दुकान से पानी लाकर पिलाया। दुकान वाले को ही वृद्धा को सुरक्षित बस बैठाने का आश्वासन लेकर मैं आगे बढ़ गया।
दिन था, दो टूबर। यानी गांधी जी का जन्मदिवस। इस दिन को भारत ही नहीं वरन पुरी दुनिया में अहिंसा दिवस के रूप में मनाया जाता है। ऐसे में उपरो मंजर की कल्पना कीजिए और फिर कहिए, 'मेरा भारत महान` यकीनन, अगर आप सच्चे भारतीय हैं तो जरूर आपका सिर शर्म से झुक गया होगा। गांधी जैसे महान व्यि तत्व के आदर्श तो बहुत ऊंचे थे, ये तो छोटी सी बात है। बड़े-बू़ढों का सम्मान करो, सड़क पर कू़डा मत फेंकों, पंि में आकार व्यवस्था बनाए रखने में साथ दो आदि तमाम ऐसी व्यवहारिक बातें शायद कुछ लोगों ने सीखी ही नहीं हैं। और कुछ लोग जिन्हें इनका ज्ञान है, वे इन बातों को अपने व्यवहार में ही नहीं लाते। मन में ग्लानि सी होती है, जब कोई अंग्रेज हमारी दरिद्रता, भूख, गरीबी और अल्प व्यवहारिक ज्ञान को कैमरे में कैद कर अपने देश ले जाता है। इस देश में अपार सुंदरता भी है, लेकिन हम उसे प्रस्तुत नहीं कर पाते। इस देश में ज्ञान भी और सम्मान भी, लेकिन हम उसे बांट नहीं पाते। हम लड़ते हैं, झगड़ते हैं और कुछ स्वार्थी लोगों को कहते हैं, आओ देखो हमारा घर जल रहा है, चाहो तो आकर अपनी रोटियां सेंक लो। बापू के सपनों का भारत, शायद ऐसा नहीं रहा होगा।
अंत में
अभी भी कुछ नहीं बिगड़ा है, सुधरने की कसम खाने के लिए किसी खास दिन की दरकार नहीं होनी चाहिए। बापू का जन्मदिवस इस साल की तरह हर साल आएगा। लेकिन, कोशिश यही होनी चाहिए अगली बार जब बापू की आत्मा ऊपर से देखे तो उसे वृद्धा को सहारा देकर बस में चढ़ता कोई युवक दिखाई दे। यकीन मानिए बापू की आत्मा जरूर खुश होगी।

दूसरों की प्रशंसा भी काजिए अमितजी


वेद विलास
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यह सच है कि आप एक बड़े अभिनेता है। आपको शताब्दी का कलाकार कहा जाता है। यह भी सच है कि आपके पिता एक बड़े कवि थे , उनकी लिखी मधुशाला को लोगों ने बड़े चाव से पढ़ा है और रस्सास्वादन किया है। यह भी सच है कि आपकी पुत्रवधु बहुत संुदर है उसे विश्व की सबसे सुंदर महिला कहा जाता है। आप इन बातों पर नाज करते हैं तो इसका आपको हक भी है। आखिर आपके जीवन में यश ही यश है। इससे किसी को या ऐतराज हो सकता है। अगर कुछ अजीब लगता है तो यही कि दुनिया केवल इन्ही बातों तक नहींं सिमटी है। जरा इससे बाहर भी झांकिए।
आप हमेशा समारोह और यहां वहां अपने पिता की कविता पढ़ते नजर आते हैं। उनकी चर्चा करते हैं। यह अच्छी बात है पित्र ऋण चुकाना चाहिए। अपने पिता को याद भी करना चाहिए। लेकिन जरा याद कीजिए आपके पिता के दौर में ही कितने बड़े बड़े यशस्वी कवि लेखक साहित्यकार हुए हैं जो आपके पिता केमित्र भी रहे हैं। लेकिन कभी आपसे उनकी चर्चा सुनने को नहींं मिलती। कहींं आप उनका जिक्र नहीं करते। अगर कभी भूल से जयशंकर प्रसाद , सुमित्रानंदन पंत का नाम ले लेंगे एक दो कविता उनकी भी पढ़ लेंगे तो इस देश पर एहसान ही करेंगे। आखिर आपको तो यह नाम भी पंतजी ने ही दिया हुआ है। हर जगह आप हरिवंश राय बच्चनजी पर ही अटक जाते हैं। विस्तृत पढ़ने के लिए क्लिक करें