Wednesday 3 December 2008

राजनीती को हिकारत की चीज न बनायें

मुंबई के आतंकी हमले के बाद देश में राजनीती व राजनेताओ को लेकर जिस तरह की बहस छिड़ रही है वह ऐसे खतरनाक मौड़ की और ले जा रही है जंहा लोकतान्त्रिक व्यवस्था पर ही सवालिया निशान लग गया है । राजनीति किसी भी समाज व्यवस्था का बुनियादी पहलू है। मानव को जंगली अवस्था से सभ्यता की और ले जाने में राजनीति का बड़ा रहा है। यूँ कहे की मानव को विभिन् समाज व्यवस्थाओं में बंधे रखने में राजनीति ही बुनियादी पहलू है। जब मानव ने सभ्यता के युग में परवेश किया तो समाज की भिन्न भिन्न किर्याओं को संगठित करने के लिए ही राजनीति अस्तित्व में आई। ये बात अलग है की समाज के प्रभुताव्शाली वर्ग ने राजनीति को अपने हितों की पूर्ति के लिए इस्तेमाल किया है। मगर फिर भी समाज विकास की प्रकिर्या में राजनीति के योगदान को नही नाकारा जा सकता। राजनीति सामंती काल में भी उतनी ही महत्वपूर्ण थी जितनी लोकतंतर में है। सवाल राजनीति के वर्गीय सरोकारों का है। शायद यही कारण है की अपने वर्गीय स्वार्थों में लिपटे वर्तमान संसदीय नेताओं को देश की आम जनता की तकलीफों से कोई सरोकार नही है। भाजपा के नकवी , महाराष्ट्र के उपमुख्यमंत्री आर आर पाटिल हो या फ़िर केरल का मुख्यमंत्री सब को यही तिलमिलाहट हो रही है की जनता अपने अधिकारों को मांग रही है। आम जनता का गुस्सा जायज है। उसके निकलने के तरीके भी अलग अलग हो सकते हैं। मगर समाज के जिम्मेवार हिस्से होने के नाते मीडिया से जुड़े लोगों द्वारा भी जब इस तरह की बहसों को जानबूज कर बढावा दिया जाता है तो शंका होती है। पडोशी देश पकिस्तान में राजनीत को बदनाम होता देख कर ही वंहा सेना ताक़तवर हुई जिसकी परिणिति सेना द्वारा तख्तापलट के रूप में हुई। किसी भी देश में सैनिक ताना शाही लोकतंतर की बजाये ज्यादा निरंकुश साबित हुयी है। इसलिए लोकतंतर को कोसने की बजाये उसे साफ करने की और ध्यान देना चाहिए। जनता के आन्दोलन और उसका पर्तिरोध ही इस सफाई का कारगर तरीका भी है।