Monday 25 February 2008

मीडिया का मतलब सिर्फ दिल्ली ही नहीं

('आउटलुट' के संपादक आलोक मेहता से बातचीत)
आलोक मेहता न सिर्फ एक पत्रकार के रूप में जाने जाते हैं बल्कि लेखक और साहित्यकार के रूप में भी उनकी ख्याति है। नई दुनिया (इंदौर) अखबार से बतौर उपसंपादक पत्रकारिता शुरू करने वाले आलोक मेहता नवभारत टाइम्स (समाचार संपादक), हिन्दुस्तान (कार्यकारी संपादक), दैनिक भास्कर (संपादक)जैसी महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां संभाल चुके है और फिलहाल आउटलुक हिंदी साप्ताहिक के संपादक हैं। पत्रकारिता की लक्ष्मण रेखा, राइन के किनारे, स्मृतियां ही स्मृतियां, राव के बाद कौन, आस्था का आंगन, सिंहासन का न्याय, अफगानिस्तान बदलते चेहरे जैसी पुस्तकों के लेखक आलोक मेहता को नेशनल हारमानी अवार्ड फॉर जर्नलिज्म और एक्सीलेंस इन जर्नलिज्म अवार्ड समेत कई पुरस्कार मिल चुके हैं। एडिटर्स गिल्ड ऑफ इंडिया के अध्यक्ष के नाते भी उनकी सक्रियता है। मौजूदा पत्रकारिता की स्थिति-परिस्थितियों पर उनसे बातचीत की संदीप कुमार और सत्यकाम अभिषेक ने। प्रस्तुत है उनसे हुई चर्चा के महत्वपूर्ण अंश :-

लगभग चार दशक से निरंतर पत्रकारिता। उपसंपादक से संपादक तक का शानदार सफर, क्या अंतर देखा आपने इन वर्षों में?
- बहुत अंतर आया है। 1970 में जब नई दुनिया से शुरूआत की तो अखबार की अपनी सीमाएं हुआ करती थीं। छह से आठ पृष्ठ होते थे। 80 के दशक में अखबार 10-12 पेज के हुए पर आज पन्ने अधिक हैं। साधन अधिक हैं। काम करने की सुविधाएं भी अधिक हैं। मेरा मानना है कि मीडिया का विस्तार हुआ है। चुनौतियां बढ़ीं हैं। दबाव भी बढ़े हैं, आर्थिक भी, सामाजिक भी। लेकिन साथ ही निरंतर काम करने की गुंजाइश भी पत्रकारिता में बढ़ी है, घटी नहीं है। कमियों की बात करें तो तब भी पत्रकारिता में कमियां थीं। ऐसा नहीं है कि तब संपादक और प्रकाशक धोखा देते थे या वे किसी राजनीतिक दल या सत्ता से जुड़े हुए नहीं होते थे। देखिए, बात कल की मीडिया की हो या आज की, पन्ने आठ हों या 16, महत्वपूर्ण यह है कि जैसी परिस्थिति है और जो सुविधाएं हैं, उसमें आप किस तरह बेहतर करके दिखाते हैं।

आपने चुनौतियों की बात की। क्या आपका अभिप्राय इलेक्ट्रोनिक मीडिया से प्रिंट को मिलने वाली चुनौतियां से है?
- देखिए ऐसा नहीं है कि टेलीविजन के आने के बाद अखबारों-पत्रिकाओं की प्रसार संख्या में कमी आई है। लेकिन इतना अवश्य कहा जा सकता है कि हर अखबार और पत्रिका के सामने यह चुनौती है कि वे टीवी से बेहतर क्या और कैसे दे सकते हैं। इसे आप एक चुनौती के रूप में भी देख सकते हैं और श्रेष्ठ साबित होने की प्रतियोगिता के रूप में भी। समाचार मीडिया में जो समाचारों और विचारों का विस्फोट-सा सामने आया है उससे यह चुनौती जरूर उभरकर सामने आई है कि आप बेहतर प्रस्तुतिकरण के साथ बेहतर सामग्री कैसे दें।

आपने प्रस्तुतिकरण की चर्चा की। क्या आपको नही लगता कि आज की मीडिया में टेक्नोलॉजी ज्यादा हावी हो गयी है?
- यह ठीक है कि टेकनोलॉजी का विस्तार हुआ है और इस कारण प्रस्तुतिकरण का रंग-ढंग बदला है। लेकिन मीडिया में टेक्नोलॉजी एक हद तक ही सहायता कर सकती है, असली ताकत तो कटेंट ही है। जैसे कि कुछ समय पहले देश के एक बड़े पूंजीपति ने 100 करोड़ की पूंजी और सबसे अच्छी टेक्नोलॉजी लगाकर अखबार निकालना शुरू किया। प्रसार संख्या बढ़ने की बात तो दूर, अखबार ही बंद हो गया। मतलब, टेक्नोलॉजी और पूंजी की भी एक सीमा है। कंटेंट के बिना आप अखबार-पत्रिका कब तक चला पाएेंंगे? कुछ अखबारों ने भी कंटेंट से समझौता कर एडिटर को नजरंदाज करने की कोशिश की थी पर यह ज्यादा दिन तक नही चला। आखिर आप थाली में सिर्फ चटपटा और मसालेदार ही कबतक परोसेंगे, घी-मक्खन भी तो डालना ही होगा।

फिर भी लोग कहते हैं कि मीडिया का पतन हो गया है?
- जो लोग कहते हैं कि मीडिया का नाश हो गया है, पतन हो गया है, उनसे मेरी सहज असहमति है। लोगों के साथ मुश्किल ये है कि वे बंद अखबारों से ही पूरी मीडिया का आकलन कर लेते हं। आप दिल्ली के चार अखबारों को ही देखकर, जो कि 40 लाख बिकते हैं, पूरे मीडिया के पतन हो जाने की बात कैसे कर सकते हैं। देश के अन्य हिस्सों से जो देशबंधु, नवज्योति, प्रभात खबर, मलयालम मनोरमा, नई दुनिया, लोकमत, भास्कर आदि निकल रहे हैं, आप उसे कैसे नजरंदाज कर सकते हैं? ये करोड़ों की तादाद में बिक रहे हैं। आखिर 40 लाख बड़ा है या 10-15 करोड़। मीडिया का मतलब सिर्फ दिल्ली से प्रकाशित अखबार ही नहीं होता।

तो क्या आप यह कहना चाह रहे हैं कि तथाकथित राष्ट्रीय अखबारों की अपेक्षा क्षेत्रीय अखबार अच्छा कर रहे हैं?
- बिलकुल, मेरा तो यही मानना है। प्रभात खबर, इनाडु, मातृभूमि को देख लीजिए। प्रसार संख्या ही सब कुछ नहीं होती। एक अच्छा अखबार निकालना भी कम बड़ी बात नहीं होती। हो सकता है इस अखबारों में भी कमियां होंगी, उतने रंग-बिरंगे नहीं होंगें लेकिन इसके बावजूद इनकी पठनीयता है, लोग इसे पढ़ना चाहते हैं। ये अखबार गंभीर विषयों को उठा रहे हैं और बिक भी रहे हैं। मीडिया, समाज और जनमानस में इन अखबारों की भूमिका को नजरंदाज नहीं किया जा सकता। आप देखेंगे कि जब चुनाव की घंटी बजती है तो पीएम भी यही पता करता है कि उड़ीसा में कौन सा क्षेत्रीय अखबार है उसको इंटरव्यू देता है।

कहा जाता है कि पहले मीडिया सिटीजन्स के लिए होता था पर अब कंज्यूमर्स के लिए है। आप क्या कहना चाहेंगे?
- मेरा कहना है कि पाठकों के लिए है। मार्केटिंग के लोग कंज्यूमर्स कह सकते हैं। पहले भी पाठकों के लिए ही अखबार होता था, आज भी है। मैं फिर कहूंगा कि पाठकों को उपभोक्ता वे लोग कह रहे हैं जो 40 लाख अखबार बेचते हैं। ऐसा दो-चार अखबार वाले कहते हैं और कंटेट की परवाह न कर अखबार को प्राडॅक्ट की तरह बेचने की कवायद करते है। पर इन्हीं चंद अखबारों को मापदंड नहीं बनाया जा सकता। देश के अन्य जो अखबार 10-15 करोड़ बिकते हैं, वे तो पाठकों को उपभोक्ता-मात्र मानकर नहीं चलते। चूंकि दिल्ली से छपने वाला एक बड़ा अखबार कहता है कि पाठक उपभोक्ता है तो यह मैसेज चला जाता है कि पाठक उपभोक्ता है। लेकिन यह गलत धारणा है।

आजकल संपादक नाम की संस्था के गौण होने और उसपर मैनेजमेंट के हावी होने की बात कही जा रही है। आप कई जगह संपादक रहे हैं? क्या कहता है आपका अनुभव?
- आपको जानकर आश्चर्य होगा कि 50-60 के दशक के अखबारों में पहले पृष्ठ पर खबर के लिए महज एक कॉलम की गुंजाइश थी, शेष सात कॉलम में विज्ञापन छपा होता था। इसलिए यह कहना कि पहले संपादकों को भरपूर छूट थी, प्रबंधन का दबाव नहीं था, सही नहीं है। संपादक जो भी करते थे या कर सकते थे, वह मालिक की सहमति के दायरे में ही। जिस समय यूनियन बहुत मजबूत हुआ करती थी, बड़े-बड़े संपादकों तक को एक दिन में निकाल बाहर किया गया। न सिर्फ इमरजेन्सी के समय बल्कि उसके बाद भी संपादकों को रातों -रात चलता कर दिया गया। आजादी के बाद के सबसे बड़े प्रकाशक माने जाने वाले एक सज्जन तो अपने संपादकों को अश्लील गाली तक दिया करते थे। आज मालिक अधिक-से अधिक क्या कर सकते हैं? यही न कि नोटिस दे सकते हैं। सीमा पार कर जाने पर या असहमति होने पर संपादक भी तो छोड़ सकता है। मैंने भी छोड़ा है। अब खुद ही तय कीजिए कि संपादकों का पतन आज ज्यादा है या उस समय ज्यादा था।

आप एडिटर्स गिल्ड ऑफ इंडिया के अध्यक्ष भी हैं, क्या वहां इन सब बातों पर चिंता होती है?
- जरूर होती है। मैं चार साल तक गिल्ड का सचिव रहा, मैथ्यू साहब अध्यक्ष थे। हमने सालभर तैयारी करके बाकायदा एक कोड ऑफ कंडक्ट बनाया। दरअसल, राज्यसभा जाने के चक्कर में संपादक भी समझौते करने लगे हैं, पार्टी विशेष की तारीफ में कसीदे पर कसीदे गढ़े जा रहे हैं। एडिटर्स गिल्ड ने बराबर संपादक नाम की संस्था के पतन पर चिंता व्यक्त की और यह सोचा कि हमें भी अपने लिए कुछ कोड ऑफ कंडक्ट बनाने चाहिए। अगर हम पहल न करें और सरकार इसके लिए कुछ कानून बनाए तो यह एक तरह से सेंसरशिप हो जाएगी। पत्रकारिता में प्रदूषण नहीं है, ऐसी बात नहीं है लेकिन महत्वपूर्ण यह है कि खुद को इससे किस तरह बचाकर रखा जाए।

सीधा-सा सवाल है कि एक पत्रकार को राजनीति में जाना चाहिए या नहीं? अब तो मालिक भी राज्यसभा पहुंचने लगे हैं?
- मैं तो इसके बिल्कुल खिलाफ हूं। मेरा तो कहना है कि अगर आपको राजनीति में जाना है तो जाइए पर पहले पत्रकारिता छोड़िए। कुछ सालों तक क्षेत्र में जाकर समाज के लिए काम कीजिए ,भले ही आपको राज्यसभा में जाना हो।

क्या आप मानते हैं कि पेज थ्री पेज वन पर आ रहा है और ऐसा है तो क्यों?
- देखिए, इसमें मानने या न मानने वाली कोई बात नहीं है। सब दिख रहा है। दरअसल, हुआ यह है कि भारत में टैबलॉयड अखबार नहीं निकले और हमने गंभीर अखबारों को टैबलॉयड बना दिया। जिन संस्थानों में मैंने काम किया, वहां भी ये बात आती थी कि पंजाब केसरी का मुकाबला करना है। पर मेरा कहना था कि हम पंजाब केसरी की तरह एक और अखबार निकाल सकते हैं। जैसे, लंदन में टाइम्स भी निकलता है और सन और मिरर भी। अगर बड़े संस्थानों से टैबलॉयड अखबार भी साथ निकलते तो इस तरह का पतन नहीं होता। आज तो बेचने के लिए सीरियस अखबारों का भी टैबलॉयडीकरण कर दिया जा रहा है।

संदीप कुमार- इन दिनों स्टार न्यूज (नोएडा) में कार्यरत हैं और सत्यकाम अभिषेक न्यूज एजेंसी यूनीवार्ता (दिल्ली) में हैं। यह इंटरव्यू पिछले साल तब लिया गया था जब ये दोनों भारतीय जनसंचार संस्थान, नई दिल्ली में पत्रकारिता प्रशिक्षणार्थी थे।)

BE A JOURNALIST

-BY ANAND PRATAP SINGH-
Journalism is concerned with collection and dissemination of news through the print media as well as the electronic media. This involves various areas of works like reporting, writing, editing, photographing, broadcasting or cable casting news items.
Journalism is classified into two on the basis of media- (i) Print Journalism and (ii) Electronic (Audio/Visual) Journalism. Print Journalism includes newspapers, magazines and journals. In print journalism one can work as editors, reporters, columnists, correspondents etc. Electronic journalism includes working for Radio, Television and the Web. In the web, skilled people are required to maintain sites by web newspapers (which cater only to the web and do not have print editions) and popular newspapers and magazines who have their own web editions. In electronic journalism one can be a reporter, writer, editor, researcher, correspondent and anchor.
Career in journalism is a prestigious profession as well as a highly paid one. Journalist play a major role in the development of nation. It is through them that we get information about daily happenings in the society. The purpose of journalism itself is to inform and interpret, educate and enlighten the people.
The opportunities for journalists are endless and at the same time the job has become more challenging, as the new world is proving the adage that "the pen (and the camera) is mightier than the sword." Simple reporting of events is no more sufficient, more specialisation and professionalism in reporting is required. Journalists specialize in diverse areas, such as politics, finance and economics, investigation, culture and sports for newspapers and periodicals.
Eligibility : Bachelor's degree or post-graduate degree in journalism / mass communication is required to pursue a career in this field.
Job Prospects and Career Options : They can find employment with newspapers, periodicals and magazines, central information service, press information bureau, websites, AIR and TV channels like Doordarshan, ZEE TV, Star TV etc.
Remuneration : The minimum salary as per government directive has to be Rs. 5500 to Rs. 9000 for reporters and senior reporters, Rs. 5000 to Rs. 10,500 for the chief reporters and sub-editors
Eligibility & Course Areas
Minimum eligibility for Bachelor degree in journalism is 10+2 and for Post graduate degree courses a Bachelor degree in journalism. Some institutes also provide one year certificate courses in journalism for which eligibility is 10+2. There are also courses in specialized areas of journalism like sports, television, photo, press law etc.
No course or training can claim to make one, a journalist. The courses train persons in the technical aspects only, to ensure one's success in the field one must have an inborn ability to write and produce new stories in correct, concise and interesting style. Latest trend in this regard is that big groups of newspapers advertise the posts of trainees for which all graduates are eligible. After conducting the entrance examination, suitable graduate trainees, with flair for writing are selected and employed. In other words, now the formal academic qualification for being a reporter, copy writer or correspondent is not essential.
Institutes
1. MAKHANLAL CHATURVEDI NATIONAL UNIVERSITY OF JOURNALISM, BHOPAL
2. TAKE ONE SCHOOL OF MASS COMMUNICATION, NEW DELHI
3. NRAI SCHOOL OF JOURNALISM, NEW DELHI
4. INDIARA GANDHI OPEN UNIVERSITY, NEW DELHI
5. JAMIA MILIA ISLAMIYA UNIVERSITY, NEW DELHI
KONARK UNIVERSITY, PURI
DIN DAYAL UPADHYAY GORAKHPUR UNIVERSITY, GORAKHPUR

Friday 22 February 2008

उपन्यासकार जगदीश चंद्र को समझने के लिए

हिंदी की आलोचना पर यह आरोप अकसर लगता है कि वह सही दिशा में नहीं है। लेखकों का सही मूल्यांकन नहीं किया जा रहा है। गुटबाजी से प्रेरित है। पत्रिकाआें के संपादकों की मठाधीशी चल रही है। वह जिस लेखक को चाहे रातों-रात सुपर स्टार बना देता है। इन आरोपों को सिरे से खारिज नहीं किया जा सकता। आलोचना का हाल तो यह है कि अकसर रचनाकर को खुद ही आलोचना का कर्म भी निभाना पड़ता है। मठाधीशी ऐसी है कि कई लेखक अनदेखे रह जाते हैं। उनके रचनाकर्म को अंधेरी सुरंग में डाल दिया जाता है। कई ऐसे लेखक चमकते सितारे बन जाते हैं जिनका रचनाकर्म कुछ खास नहीं होता।

इन्हीं सब विवादों के बीच कुछ अच्छे काम भी हो जाते हैं। कुछ लोग हैं जो ऐसे रचनाकारों पर भी लिखते हैं जिन पर व त की धूल पड़ चुकी होती है। ऐसा ही सराहनीय काम किया है तरसेम गुजराल और विनोद शाही ने। इन आलोचक द्वव ने हिंदी साहित्य के अप्रितम उपन्यासकार जगदीश चंद्र के पूरे रचनाकर्म पर किताब संपादित की। जिसमें इन दोनों के अलावा भगवान सिंह, शिव कुमार मिश्र, रमेश कंुतल मेघ, प्रो. कुंवरपाल सिंह, सुधीश पचौरी, डा. चमन लाल, डा. रविकुमार अनु के सारगर्भित आलेख शामिल हैं। इनके अलावा देवेंद्र इस्सर का जगदीश चंद्र पर एक आत्मीय संस्मरण भी शामिल है। इन लेखकों ने अपनी रचनाआें में जगदीश चंद्र के कृत्तव से लेकर व्यि तत्व का मूल्यांक इतने बेबाक और आत्मीय तरीके से किया है कि यह किताब हिंदी आलोचना में मील की पत्थर साबित हो सकती है।

ऐसा माना जाता है कि दलितों पर मुंशी प्रेमचंद के बाद यदि किसी लेखक ने अपनी लेखनी चलाई है तो वह हैं जगदीश चंद्र। उन्होंने अपने तीन उपन्यासों धरती धन न अपना, नरककंुड में बास और जमीन अपनी तो थी में दलितों से संबंधित विसंगतियांे को पूरी सि त से उकेरा है। इन उपान्यासों के कई चरित्र प्रेमचंद के उपान्यासों के चरित्रों से मुकाबला करते हैं।

एक जगह तरसेम गुजराल लिखते हैं कि प्रेमचंद ने गोदान में होरी को छोटे किसान से भूमिहीन मजदूर के रूप में परिवर्तित होते दिखाया है। जबकि जगदीश चंद्र के उपन्यास धरती धन न अपना में भूमिहीन दलित सामने आया है। काली का चित्रण दलित जीवन का खाका बदलने की संघर्ष गाथा है परंतु वहां के पिछड़े लोगों को उसी तरह न्याय नहीं मिलता जैसे सूरदास को। उ त पंि तयों से पाठकों के सामने जगदीश जी का रचनाकर्म खुलता है। ऐसा मूल्यांकन है जो बेहद ईमानदारी और संवेदनशीलता की मांग करता है और जिसे निभाया गया है।

भूमिहीन मजदूरों के दर्द को आवाज देने वाले जगदीश चंद्र ने फौजी पृष्ठ भूमि पर भी तीन उपान्यास लिखे हैं। तरसेम गुजराल लिखते हैं कि जगदीश चंद्र को अर्नेस्ट हेमिंग्वे बहुत पसंद थे। हेमिंग्वे की तरह ही वह भी एक बड़े स्वप्न के उपन्यासकार हैं। हेमिंग्वे की तरह ही उन्होंने युद्धकालीन भयावह परिस्थितियों का जोखिम उठाकर पत्रकारिता की भूमिका का निर्वाह किया। दोनों की यथार्थ की पहंुच फोटोग्राफिक यथार्थ या खबर नवीसी से आगे की है। फौजी जीवन के अपने अनुभव को उन्होंने आधा पुल, टुंडा लाट और लाट की वापसी जैसे तीन उपन्यासों में समेटा है।

विनोद शाही ने अपने साक्षात्कार-वह मूलत: एक लेखक ही थे (जगदीश चंद्र की पत्नी श्रीमती क्षमा वैद्य और बेटे पराग वैद्य के साथ भेंटवार्ता।) में जगदीश जी के जीवन के कई पहलुआें को उकरते हैं। साक्षात्कार की भूमिका बहुत ही संवेदनशीलता और आत्मीयता से लिखी गई है। यही वजह है कि शाही जी जगदीश चंद्र के व्यि तत्व की कई खूबियों को बाखूबी समझा और लिखा। जिसे पढ़कर पाठक भावविभोर हो जाता है। इस साक्षात्कार से जगदीश चंद्र के कृतित्व से लेकर व्यि तत्व तक कई पहलू खुलते हैं। लेखक के दांपत्य और पारिवारिक जीवन के कई यथार्थ सामने आते हैं। एक लेखक की पत्नी को कितना कुछ सहना और समेटना पड़ता है इस बात से समझा जा सकता है। विनोद शाही सवाल करते हैं कि जिस उपन्यास पर वह काम कर रहे होते थे, अवचेतन तौर पर वे उसी में हमेशा जीते रहे होंगे ओर जब भीतर-भीतर कोई कड़ी या सूत्र अचानक जु़ड जाता होगा तो ...पर उनके ऐसे व्यवहार से एक पत्नी के तौर पर आपको कोफ्त नहीं होती थी? श्रीमीती क्षमा वैद्य जवाब देती हैं - होती थी। शुरू-शूरू में जब मैं उन्हें ऐसा करते देखती तो बड़ी उपेक्षित महसूस करती। मुझे या बच्चों को साथ लेकर वे कम ही घूमने जाते थे। हो सकता है अकेले घूमते हुए भी वह लिखने से जु़डी बातें सोचते होंगे। ....अच्छा तो नहीं लगता था पर मैंने ही धीरे-धीरे इस स्थिति के साथ समझौता कर लिया था। मैंने खुद को उकने मुताबिक ढाल लिया था, योंकि मैं उन्हें लिखने से जबरन रोकना नहीं चाहती थी।

इन बातों में एक लेखक की पत्नी की सारी व्यथा समाहित है। इससे अंदाजा लगाया जा सकता है कि एक लेखक यदि कोई रचना करता है तो उसमें उसके परिवार का भी कितना योगदान होता है। यह ऐसा सहयोग होता है जो उपेक्षित ही रह जाता है। कभी सामने नहीं आ पाता।

दो सौ पेज की जगदीश चंद्र एक रचनात्मक यात्रा पुस्तक में वह सब कुछ है जो एक लेखक को समझने के लिए जरूरी होता है। जाहिर सी बात है कि तरसेम गुजराल और विनोद शाही ने इसे बड़ी मेहनत और मनोयोग से तैयार किया है। किताब पढ़ने के बाद यदि पाठक निराश नहीं होता तो इसके लिए यह दोनों बधाई के पात्र हैं।

इस किताब को पंचकूला के सतलुज प्रकाशन, एससीएफ, २६७, द्वितीय तल, से टर-१६, ने प्रकाशित किया है। पेपरबैक संस्करण कीमत है मात्र सौ रुपये।
- ओमप्रकाश तिवारी

Thursday 21 February 2008

मुंबई, देश निकाला और राज ठाकरे

वरिष्ठ कथाकार धीरेंद्र अस्थाना का उपन्यास देश निकाला पढ़ रहा था तो उसी दौरान मंुबई में राज ठाकरे उत्तर भारतीयों के खिलाफ बयान देकर मंुबई को हिंसा की आग में झोक दिया था। देश निकाला की पृष्ठ भमि मंुबई की है और इस उपन्यास का लेखक उत्तर भारतीय है। जिस संवेदना से मंुबई के बारे में लेखक ने लिखा है उसे शायद राज ठाकरे न समझ सकें। इस रचना की समालोचना करते समय पहली किस्त को इसी लिए राज ठाकरे के कारनामों से जाे़डकर देखा गया है। जिसका मकसद उपन्यास की समालोचना के साथ राज ठाकरे के कृत्य की समीक्षा करना भी है।


यह अजीब संयोग रहा है कि जब मुंबई में राज ठाकरे के गुंडे उत्तर भारतियों के खिलाफ हिंसा पर उतर आए थे और राज ठाकरे विषवमन कर रहे थे, तब मैं नया ज्ञानोदय के फरवरी २००८ अंक में प्रकाशित वरिष्ठ कथाकार धीरेन्द्र अस्थाना का उपन्यास 'देश निकाला` पढ़ रहा था। वैसे तो राज ठाकरे की हरकतों और इस उपन्यास में कोई साम्य नहीं है, लेकिन कुछ बातें हैं जो एक दूसरे से जु़डती हैं। मसलन, शीर्षक को ही ले लिया जाए। अस्थाना जी ने पुरुष की दुनिया (देश) से औरत को खारिज किए जाने का अपने उपन्यास की विषयवस्तु बनया है और शीर्षक दिया है 'देश निकाला`। पुरुष के देश से औरत को देश निकाला ही मिलता है। ऐसे ही राज ठाकरे की मुंबई से उतार भारतीयों को देश निकाला दिया जा रहा है। मुंबई जो भारत में है और भारत जो हर भारतीय का है। ऐसे में यह कहना कि मुंबई केवल महाराष्ट्रियों की ही है। तानाशाही ही नहीं देशद्रोह भी है।
भारत क्षेत्रीय फूलों से गुंथी एक माला है और इसी रूप में वह सुरक्षित है। इस माला से यदि एक भी फूल टूटता है तो उसकी सुंदरता और अखंडता खंडित हो जाएगी। फिर भारत एक देश नहीं रह सकता। क्षेत्रीय अस्मिता तभी तक अच्छी लगती है जब तक वह राष्ट ्रीयता को खंडित नहीं करती। यदि वह ऐसा करने लगती है तो उसका उपचार जरूरी हो जाता है। ऐसे लोगों पर अविलंब राष्ट ्रद्रोह का मामला दर्ज किया जाना चाहिए।
आव्रजन यानी एक स्थान से दूसरे स्थान को पलायान इस दुनिया यानी मानव सभ्यता का शाश्वत नियम है। यदि ऐसा न होता तो आज हम भूमंडलीकरण और ग्लोबवर्ल्ड की बात न करते। मानव हमेशा ही अपने विकास के लिए एक जगह से दूसरी जगह पलायन करता रहा है। जब किसी स्थान या क्षेत्र के संशाधनों पर कुछ लोगों का कब्जा हो जाता है तो अन्य लोगों के लिए वहां से पलायन ही अंतिम विकल्प बचता है।
ऐसे लोग अपने अस्तित्व के लिए संघर्ष करते हुए भटकते हैं और जहां रोजी-रोटी की व्यवस्था हो जाती है वहां टिक जाते हैं। ऐसे में स्थानीय और बाहरी संघर्ष आरंभ हो जाता है। स्थानीय लोगों को लगता है कि बाहर से आने वाले लोग उसका हक मार रहे हैं। इसी मानसिकता को चालक सियासत दा लोग हवा देते हैं। यही राज ठाकरे कर रहे हैं। पहले यही उनके चाचा बाल ठाकरे कर चुके हैं। अब राज ठाकरे उनके पदचिन्हों पर हैं। सफल न बाल ठाकरे हुए न राज ठाकरे होंगे। कुछ जख्म बाल ठाकरे ने दिए थे कुछ राज ठाकरे दे जाएंगे।
बहरहाल, अब धीरेंद्र अस्थाना के उपान्यास की बात करते हैं। अस्थाना जी अपने उपन्यास देश निकाला में खिलते हैं कि -चलना मुंबई का चरित्र है। जानते हैं, मुंबई की लोकल ट्रेनों में चलने वाली गायन मंडलियों के बीच कौन सा गाना अकसर गाया जाता है? तू न चलेगा तो चल देंगी राहें। मंजिल को तरसेंगी तेरी निगाहें। तुझको चलना होगा। तुझको चलना होगा। जाहिर है मुंबई के इस चरित्र निर्माण में महाराष्टि ्रयों का अकेला योगदान नहीं है। मुंबई को उत्तर भारतीयों और अन्य लोगों ने भी अपने खून पसीने से सींचा है। मुुंबई फिल्मी दुनिया है। लेकिन इस दुनिया में कितने लोग मुंबई के हैं। कथित बाहरी लोगों को यदि निकाल दिया जाए तो मुंबई से फिल्मी दुनिया उजड़ जाएगी। मुंबई से उत्तर भारतियों को निकाल दिया जाए तो देश की आर्थिक राजधानी का खिताब मुंबई से छिन जाएगा। फिर किस पर गर्व करेंगे राज ठाकरे। मुंबई पर केवल राज ठाकरे को ही गर्व नहीं होता, मुंबई पर हर भारतीय को गर्व होता है। जैसे आगरा के ताजमहल और दिल्ली की कुतुबमीनार और लाल किला, इलाहबाद का संगम, वाराणसी और हरिद्वार के गंगा घाट।
वर्ष २००६ जुलाई माह (२६-२७) में मुंबई में ऐसी बारिश हुई कि हाहाकार मच गया। मुंबई वासियों ने ऐसी तबाही का मंजर शायद ही कभी देखा होगा। अस्थाना जी अपने उपन्यास में इस बारिश का विशेष उल्लेख करते हैं। कैसी विसंगति है कि शहर को संघाई बनाने का सपना। बारिश के पानी में कागज की नाव बनकार भटक रहा है। भारी बारिश और लोकल जाम, मुंबई के लिए नया नहीं है लेकिन अब पहली बार मुंबई वासी खुद को ठगा सा महसूस कर रहे हैं।
आगे तबाही के मंजर का चित्रात्मक वर्णन करते हुए अस्थाना जी लिखते हैं कि चारों तरफ अंधेरा, फोन खामोश, टीवी रेडियो बंद। सड़कों और घरों में कमर कमर तक पानी। गाडियां बंद। लोग अपनी कारों के भीतर बीच सड़क पर डूबकर मर गए और दिवारें गिर गइंर्। चट्ट ानें खिसक गइंर्। मकान ढग गए, पीने का पानी और खाने को अन्न नहीं। हर तरफ हाहाकार पर हिंदुस्तान को जिस शहर पर कोहेनूर की तरह अभिमान था वह कैसे भयावह भंवरों के बीच अनाथ शिशु की लाश सा पानी पर डोल रहा है। समुद्र की छाती पर मुंबईकरों के सपने शव की तरह पड़े हैं। यह धीरेंद्र अस्थाना की भाषा है जिसका कोई जवाब नहीं और जो पढ़ने वाले को दीवाना बना देती है। यह उनकी भाषा की ही ताकत है कि वह अपने पाठकों को ऐसा बांधते हैं कि उनहें पढ़ने वाला अभिभूत हो जाता है। वैसे तो देश निकाला स्त्री विमर्श पर लिखा गया है। लेकिन इसकी खास बात यह है कि २००६ जुलाई माह में हुई मुंबई की बारिश के भयावह मंजर का वर्णन। बारिश के बहाने लेखक मंुबई के चरित्र को विश्लेषित करता है।
-मुंबई कभी नहीं सोती। वह अनंत जागरण का शहर है। बहुत हद तक न्यूयार्क की तरह। मुंबई के लोग पूरे आठ महीने धारासार बारिश का इंतजार करते हैं। मानसून शहर की जिंदगी में रोमांस की तरह आता है। लेकिन इस बार वह मौत की तरह आया और कर्मठ उत्सवधर्मी तथा जिंदादिल लोगों को तहस-नहस कर गया।

पूरे उपन्यास में ऐसी जादुई भाषा की भरमार है। मुंबई की उस भयानक बारिश को तब टीवी चैनलों ने अपने कैमरे से लाइव दिखाया था, लेकिन अपने इस उपन्यास में अपनी भाषा से उस भयावह मंजर का जो चित्रण धीरेंद्र अस्थाना करते हैं उसके आगे तो टीवी चैनलों के दृश्य फीके पड़ जाते हैं।
उपन्यास की शुरूआत होती है -सीढ़ियों पर सन्नाटा बैठा हुआ था। इस सन्नाटे के बीच से नि:शब्द गुजरते हुए गौतम सिन्हा अपने फ्लैट के सामने आ गए। यह वैसी ही शुरूआत है जैसे किसी जमाने में नौटंकी शुरू होने से पहलीे नगाड़ा और टंकी बजाने वाला टंकी और नगाड़े से ऐसी धुन निकालता था कि अपने घरों में आराम से सो रहे लोग भी जग जाते थे और उनके कदम खुद व खुद उस धुन की तरफ बढ़ जाते थे। वह तभी रुकते थे जब वे उस स्वर के करीब पहुंच जाते थे। उपन्यास में जब लेखक लिखता है कि -मंच पर मिले थे। मंच पर जिये थे। नेपथ्य में फिसल गए। तो वह बहुत बड़े दृश्य को इन शब्दों में समेट रहा होता है। शायद इसी को कहते हैं गागर में सागर भरना।

- देश निकाला उपन्यास की समालोचना की दूसरी किस्त का इंतजार करें।
- http://www.smalochna.blogspt.com
- http://www.Katha-kahani.blogspot.com

Wednesday 20 February 2008

बिना दुम के दुम हिलाना देह का इस्तेमाल नहीं है?

कामगार औरतों की आत्मा पर अपमान के अनगिनत निशान होते हैं। औरतों ने मुंह खोलना शुरू किया तो एक दूसरे इतिहास की रचना होगी, पर कौन देगा उन्हें मुंह खोलने का अधिकार? उन्हें खुद ही हासिल करना होगा।?
- प्रसिद्ध रंगकर्मी उषा गांगुली


समाज में कामकाजी महिलाआें का चरित्र 'संदिग्ध` के दायरे में रहता है। दफ्तर में महिला कर्मचारी की तर की 'संदिग्ध` नजरों से देखी जाती है। कभी-कभी अश्लील फब्तियां भी कसी जाती हैं। समाज में कामकाजी महिला की उन्नित भी 'संदिग्धता` के दायरे में ही रहती है। मुंह पर न सही, पीठ पीछे लोग उसके चरित्र पर फिकरे कसते ही हैं। जबकि ऐसी ही उन्नति यदि कोई पुरुष करता है तो उसका नाम भ्रष्ट ाचार से जाे़डा जाता है। उसे नंबर-२ की कमाई कहा जाता है। पुरुष सत्ता मूलक समाज की यही मानसिकता स्त्री को केवल वस्तु मानने के लिए विवश करती है। पुरुष स्त्री को देह से आगे देख-समझ नहीं पाता है। स्त्री के प्रति पुरुष की मानसिकता कितनी घृणित है उसे समाज में फैली तमाम गलियों से समझा जा सकता है। कोई की जब किसी को गाली देता है तो मां-बहन और बेटी की गाली देता है। पुरूष के हंसी-मजाक में भी औरत के शारीरिक अंग का उल्लेख बेहद अश्लील और अभद्रता से किया जाता है। सड़क पर या गली में संभोगरत कुत्ते-कुतियों को देखकर पुरुष नहीं शर्माता लेकिन महिला शर्मा जाती है, जो नहीं शर्माती उसे बेशर्म का तमगा दे दिया जाता है। ऐसी मानसिकता के साथ कोई समाज औरत के प्रति कैसे संवेदनशील हो सकता है? कामकाजी महिलाएं (इसमें मीडिया भी शामिल है) जब अपने दफ्तरों में तर की करती हैं तो उनका संबंध उनके बॉस से सहज ही जाे़ड दिया जाता है। (हालांकि कई बार यह सही होता है कि स्त्री अपने देह को माध्यम बनाकर सफलता के दुर्ग पर अपना परचम लहराती है, लेकिन इसे ही सत्य मान लेना उचित नहीं कहा जाएगा। इसे स्त्री कौम की बेइज्जती भी कहा जाएगा।
किसी दफ्तर में कोई लड़की (युवती या महिला) आई नहीं कि उसे पटाने के लिए युवकों-वयस्कांे (पुरुषों) में हाे़ड लग जाती हैं। आखिरकार लड़की भी हाड़-मांस की बनी है। उसके पास भी दिल-दिमाग है। संवेदनाएं और भावनाएं हैं। वह कब तक बची रह सकती है? इस प्रक्रिया में यदि उसने किसी सहकर्मी या बॉस का ही दामन थाम लिया तो बाकी के 'असफल` लोग उसके पीछे पढ़ जाते हैं। उसके चरित्र पर चटकारे ले-लेकर बातें करते हैं। जिसमें से अधिकतर कुंठित दिमाग की उपज कपोल कल्पित कथाएं होती हैं, जो अश्लीलता के नरककुंड में सरोबोर होती हैं।
लड़की पट गई तो वह चरित्रहीन हो गई, लेकिन जो उसे पटाने का काम करते हैं उनके चरित्र को या कहा जाए?

दफ्तरोें में, खास करके मीडिया के, देखा गया है कि लड़की (युवती-महिला)को पटाने के लिए पुरुष उसके हर काम को करने के लिए तैयार रहता है। कभी-कभी तो वह अपना भी काम करता है और लड़की के बदले भी करता है। पुरुष की इस प्रक्रिया (हरकत)को या कहा जाए? या वह अपनी देह से स्त्री की देह तक पहुंचने का कार्य नहीं करता? या जब किसी युवती-स्त्री का किसी युवक या पुरुष से संबंध बन जाता है तो इस संबंध के लिए केवल स्त्री की दोषी होती है? पुरुष नहीं होता? एक समान हरकत के लिए दोहरी मानसिकता समझ से परे होती है। पुरुष सत्ता यही मानसिकता पुरुषों में बचपन से ही घोलती है। इस संस्कार को हमारा नैतिक मूल्य कहा जाता है।

हमारे समाज में जिससे बलात्कार होता है वह घृणित हो जाती है और जो बलात्कार करता है वह अपराधी भी नहीं हो पाता, योंकि कानून सुबूत खोजता है और स्त्री अपनी 'अस्मिता` गंवाकर भी सुबूत नहीं दे पाती। समाज में ऐसे भी लोग मिल जाते हैं जो यह कहते फिरते हैं कि कोई पुरुष किसी महिला का बलात्कार करता ही नहीं। उनका कहना होता है कि बलात्कार में भी महिला की सहमती होती है, बिना सहमती के यौन संबंध बनाया ही नहीं जा सकता। ऐसी बातें करने वाले पता नहीं किस प्रयोगशाला में इसका परीक्षण किए होते हैं।
यहां अस्मिता शब्द पर गौर करना चाहिए। या महिला की ही अस्मिता होती है। पुरुष की नहीं होती? यदि नहीं होती तो यों? अवैध संबंधों से पुरुष का नैतिक पतन नहीं होता लेकिन स्त्री का चरित्र खराब हो जाता है। चरित्र के प्रति इस तरह का दोहरा मापदंड यों?
एक और अहम बात पर गौर किया जाना चाहिए। वह यह कि तर की के लिए देह का इस्तेमाल या केवल औरत ही करती है?
कामकाजी महिला दफ्तर में या समाज में तर की करती है तो कहा जाता है कि उसने देह का इस्तेमाल किया। हालांकि ऐसा सोचने वाले यह भूल जाते हैं कि औरत कई मायनों में पुरुष से ज्यादा जीवट और मेहनती होती हैं। और स्वाभमानी भी लेकिन चूंकि वह पुरुषों की अपेक्षा अधिक संवेदनशील और भावुक होती हैं इसीलिए पुरुष उसका इस्तेमाल भी करता है और बदनाम भी।

यह तो हुई स्त्री की बात, लेकिन तर की के लिए या पुरुष अपनी देह का इस्तेमाल नहीं करता? या वह अपने स्वाभिमान से समझौता नहीं करता? अश्लीलता की हद तक चाटुकारिता करने को या कहेंगे? यह भी तो शरीर का ही इस्तेमाल है कि आप के पास पूंछ नहीं है लेकिन फिर भी हिला रहे हैं...। देह का इससे अश्लील इस्तेमाल और या हो सकता है? औरतों के पास जो है वह तो उसका इस्तेमाल करती हैं लेकिन पुरुष के पास जो नहीं है वह उसका भी इस्तेमाल करता है। इसीलिए यह कहना ठीक नहीं होगा कि तर की के लिए औरतें ही देह का इस्तेमाल करती हैं। इस मामले में पुरुष भी पीछे नहीं हैं।
- ओमप्रकाश तिवारी

Friday 15 February 2008

डा. परमानंद श्रीवास्तव को 'भारत-भारती`

उत्तर प्रदेश के हिंदी संस्थान ने वर्ष २००६ के पुरस्कारों की घोषणा की है। डा. परमानंद श्रीवास्तव को 'भारत-भारती` सम्मान दिया जाएगा।

१-लोहिया साहित्य -डा. श्याम सिंह 'शशि`
२-हिंदी गौरव - डा. कुंवर बेचैन
४-महात्मा गांधी साहित्य सम्मान - डा. वेद प्रताप वैदिक
५-दीनदयाल उपाध्याय सम्मान - डा. प्रभाकर श्रोत्रिय
६-अवंती बाई सम्मान - डा. (श्रीमती) गिरीश रस्तोगी को दिया जाएगा।

भारत-भारती के रूप में २.५१ लाख रुपये व शेष के लिए दो-दो लाख रुपये प्रदान किए जाएंगे।

एक लाख रुपये का 'साहित्य भूषण` सम्मान
१-डा. शेर जंग गर्ग
२-डा. छैलबिहारी लाल गुप्त उर्फ राकेश गुप्त
३-उमेश जोशी
४-आशा श्रीवास्तव
५-धनंजय अवस्थी
६-डा. गिरिराज शरण अग्रवाल
७-डा. किशोरी शरण शर्मा
८-कौशलेंद्र पाण्डेय
९-देवकीनंदन शांत
१०-ओमप्रकाश वाल्मीकि

लोक भूषण, कला भूषण, विद्या भूषण, विज्ञान भूषण, पत्रकारिता भूषण, प्रवासी भारतीय हिंदी भूषण, बाल साहित्य भारती, सौहार्द व हिंदी विदेश प्रसार सम्मान वर्ष २००६ के लिए दिए गए हैं।


एक-एक लाख रुपये का लोक भूषण सम्मान
- डा. विद्या विन्दु सिंह
कला भूषण सम्मान डा. - उर्मिल कुमार थपलियाल
विद्या भूषण सम्मान - डा.सत्यदेव मिश्र
विज्ञान भूषण सम्मान - डा.सैयद आसिफ हुसैन आबिदी
पत्रकारिता भूषण सम्मान - मधुसूदन आनंद
प्रवासी भारतीय हिन्दी भूषण सम्मान - गंगारत्न पाण्डेय
बाल साहित्य भारती सम्मान - नरेश चंद्र स सेना

एक लाख एक हजार रुपये के सौहार्द सम्मान
१- डा. कालीचरण चौधरी (ओड़िया),
२- डा.जमील अहसन (उर्दू)
३- डा. भूषण लाल कौल (डोगरी/कश्मीरी),
४- डा.पी.के. बालसुब्रह्मण्यम (तमिल)
५- डा. वी.डी. हेगड़े (कन्नड़)
६- डा. रामचंद्र राय (बांग्ला)
७- सिम्मी हर्षिता (पंजाबी)
८-डा. दामोदर खड़से (मराठी)
९- सुश्री बी. आम्बा 'माधवी` (तेलुगु)
पच्चीस हजार रुपए का हिंदी विदेश प्रसार सम्मान डा. पी. जयरामन को दिया गया है।
विश्वविद्यालय स्तरीय सम्मान डा. उषा सिन्हा व डा. कमला शंकर त्रिपाठी को दिया गया है।

एक लाख रुपये का मधुलिमये स्मृति पुरस्कार कैलाश चंद्र मिश्र को दिया गया है।

वर्ष २००६ में प्रकाशित महिला रचनाकार की कथा कृति अपने-अपने मरुस्थल पर आठ हजार रुपये का पं. बद्री प्रसाद शिंगलू स्मृति सम्मान पुरस्कार विनीता शु ला को दिया गया है।

वर्ष २००४ के लिए बीस-बीस हजार के नामित पुरस्कारों में बाल साहित्य के लिए सूर पुरस्कार कल्पनाथ सिंह को, अवधी के लिए मलिक मुहम्मद जायसी पुरस्कार डॉ. राम बहादुर मिश्र को, ब्रज भाषा के लिए श्रीधर पाठक पुरस्कार अम्बिका प्रसाद शु ल 'अम्बिकेश` को, भोजपुरी केलिए राहुल सांकृत्यायन पुरस्कार बृज मोहन प्रसाद अनारी को, राष्ट ्रीय एकता एवं भावनात्मक समन्वय संबंधी साहित्य केलिए कबीर पुरस्कार पवन कुमार सिंह को, नाटक केलिए भारतेन्दु हरिश्चन्द्र पुरस्कार डॉ. विश्वनाथ मिश्र को, शिक्षा के लिए मदन मोहन मानवीय पुरस्कार डॉ. मया शंकर सिंह को, विधि/विधि शास्त्र केलिए मोतीलाल नेहरू पुरस्कार अमरनाथ सिंह को, धर्म/दर्शन केलिए भगवानदास पुरस्कार आर.पी. मित्तल को, निबंध केलिए महावीर प्रसाद द्विवेदी पुरस्कार अनन्त राम मिश्र अनन्त को, भाषा/भाषा विज्ञान श्यामसुन्दर दास पुरस्कार डॉ. कमल सिंह को, वनस्पति/प्राणिशास्त्र/आयुर्विज्ञान केलिए बीरबल साहनी पुरस्कार प्रो. एम.सी. पन्त को, उपन्यास के लिए प्रेमचन्द्र पुरस्कार शैलेंद्र सागर को, खण्डकाव्य के लिए जयशंकर प्रसाद पुरस्कार सुशील सरित को, आलोचना के लिए रामचन्द्र शु ल पुरस्कार वेद प्रकाश गर्ग को, इतिहास केलिए आचार्य नरेन्द्र देव पुरस्कार प्रो. सुगम आनन्द को, गीत/मु तक/गजल के लिए निराला पुरस्कार निर्मल शु ल को, पत्रकारिता केलिए बाबूराव विष्णु पराड़कर पुरस्कार अमी आधार निडर को, गणित/भौतिकी/रसायन केलिए के.एन.भाल पुरस्कार श्रीनारायण लाल श्रीश को, युवा लेखन केलिए बाल कृष्ण शर्मा नवीन पुरस्कार के.डी.सिंह को, कहानी केलिए यशपाल पुरस्कार दया नन्द पाण्डेय को, संस्कृति केलिए हजारी प्रसाद द्विवेदी पुरस्कार डॉ. रीना अस्थाना को, यात्रा वृतान्त/जीवनी/संस्मरण/रेखाचित्र के लिए सच्चिदानन्द हीरानन्द वात्स्यायन अज्ञेय पुरस्कार राजीव श्रीवास्तव को, मासिक/द्विमासिक/त्रैमासिक पत्रिकाआें के लिए सरस्वती पुरस्कार डा. सत्यवान को, समस्त विधाआें में केवल महिला साहित्यकारों की कृति पर के लिए महादेवी वर्मा पुरस्कार- सुश्री किरन सिंह को, व्यंग्य के लिए पं. श्री नारायण चतुर्वेदी पुरस्कार- डा.सुशील सिद्धार्थ को, कविता के लिए विजय देव नारायण साही पुरस्कार- वीरेंद्र सारंग को दिया गया है।

आठ-आठ हजार रुपये के नामित पुरस्कारों में बाल साहित्य के लिए सोहन लाल द्विवेदी पुरस्कार- अखिलेश श्रीवास्तव चमन को, अवधी के लिए वंशीधर शु ल पुरस्कार- सुश्री रामाआर्य पाण्डेय को, ब्रज भाषा के लिए हृषीकेश चतुर्वेदी पुरस्कार-सतीश आर्य को, भोजपुरी के लिए भिखारी ठाकुर पुरस्कार-रामानंद राय गंवार को, राष्ट्रीय एकता एवं भावनात्मक समन्वय संबंधी साहित्य के लिए नज़ीर अकबराबादी पुरस्कार-अनुराग आग्नेय को, नाटक के लिए मोहन राकेश पुरस्कार-विनय श्रीवास्तव को, शिक्षा के लिए बाबू श्यामसुन्दर दास पुरस्कार-डा. शरद चंद्र मिश्र को, विधि/विधि शास्त्र के लिए परशुराम चतुर्वेदी पुरस्कार डा.संत प्रसाद गुप्त को, धर्म/दर्शन के लिए नंद किशोर देवराज पुरस्कार डा.देवी सहाय पाण्डेय दीप को, निबंध केलिए गुलाबराय पुरस्कार-के.एस. तूफान को, वनस्पति/प्राणिशास्त्र/आयुर्विज्ञान के लिए आचार्य रघुवीर प्रसाद त्रिवेदी पुरस्कार- डा.पृथ्वीनाथ पाण्डेय, उपन्यास के लिए अमृत लाल नागर पुरस्कार डा.भालचंद्र तिवारी को, खंड काव्य के लिए आनंद मिश्र पुरस्कार- सुरेश कुमार शु ल संदेश को, आलोचना केलिए राम बिलास शर्मा पुरस्कार- डा.राजकुमार को, इतिहास के लिए ईश्वरी प्रसाद पुरस्कार- गोपीचंद्र श्रीनागर को, गीत/ मु तक/गजल के लिए बलबीर सिंह रंग पुरस्कार-मधुकर अस्थाना को, पत्रकारिता के लिए धर्मवीर भारती पुरस्कार-डा. शीला मिश्र को, युवा लेखन के लिए डा.रांगेय_राघव पुरस्कार- डा.अंजली को, कहानी के लिए राम प्रसाद विद्यार्थी 'रावी` पुरस्कार शैलेंद्र श्रीवास्तव को, लोक साहित्य विवेचन के लिए बलभद्र प्रसाद दीक्षित 'पढ़ीस` पुरस्कार- डा. सियाराम 'सिंधु` को यात्रावृतांत/जीवनी/संस्मरण/रेखाचित्र के लिए जगदीश गुप्त पुरस्कार-डा.कमल सिंह को, मासिक/द्विमासिक/ त्रैमासिक पत्रिकाआें पर धर्मयुग पुरस्कार - अनंत प्रकाश तिवारी को, समस्त विधाआें में केवल महिला साहित्यकारों की कृति पर विद्यावती कोकिल पुरस्कार-डा. उषा चौधरी को, व्यंग्य के लिए शरद जोशी पुरस्कार-महेश चंद्र द्विवेदी को, कविता के लिए नरेश मेहता पुरस्कार-राजीव पांडे को दिया गया है।

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यह मेरे घर का सम्मान है : परमानंद


उत्तर प्रदेश हिंद संस्थान का सर्वोच्च सम्मान भारत-भारती परमानंद श्रीवास्तव को मिला। वह इसे अपने घर का सम्मान बताते हैं और कहते हैं कि ७२ पार, लगता है अभी-अभी तो शुरू किया है। गजब की ऊर्जा और अथाह जिजीविषा लिए प्रो. परमानंद के लिए यह सम्मान घर का वह सम्मान है जिसे वह अपनी पाठशाला भी मानते हैं। भारत-भारती के लिए परमानंद श्रीवास्तव के नाम की घोषणा के तत्काल बाद गोरखपुर में सूरजकुंड स्थित उनके आवास पर जब 'अमर उजाला` के संजय तिवारी ने उनसे बातचीत की। बातचीत के प्रमुख अंश: -
-आज के दिन भारत-भारती का मिलना कैसा लग रहा है?
-इसे पुस्तक मिलन कहेंगे...वैलेंटाइंस है...प्रेमी युगल गिफ्ट देते हैं। मैं साहित्य का होलटाईमर हूं। गिफ्ट देने के लिए पुस्तकों से अच्छा कुछ भी नहीं। मैं तो इसे मातृ-पितृ दिवस मानता हूं और अपनी दुनिया के उन लोगों को जरूर याद करता हूं जिनसे ऊर्जा ली है।
वेराउन सपनों की कथा कहो, नेरुदा की २० प्रेम कविताएं, रूसी कवि एफ्तेसेंको की आत्मकथा एक अजब दास्तान...ये सब मुझे बहुत कुछ देती है।

सवाल : साहित्य, परिवार और इस माे़ड पर यह सम्मान कुछ नया अनुभव तो होगा? अनुभूति कैसी है?

जवाब : अभी-अभी दिल्ली पुस्तक मेले से लौटा हूं। मेरी दुनिया वहीं है। उत्तर प्रदेश हिंद संस्थान से आज घोषित भारत-भारती मेरे घर का सम्मान है। घर मेरी पहली पाठशाला है। मेरी पत्नी प्रारंभ से ही मुझे शब्द देती रही है। मेरी बेटिया, मेरे नाती किंशुक, ऋत्विक, बकुल- वे मेरे साथ न सिर्फ संवाद करते हैं, बल्कि नए समय का सपना भी दिखाते हैं।

सवाल : लेखन का माहौल और जीवन के संघर्ष एक साथ तालमेल कैसे बन पाता है? वह भी आज के समय में?

जवाब : साहित्य मेरा आे़ढना-बिछौना है। मैं रोज लिखता हंू।_ हिंदी पाठक जानत_ा है कि मुझे विमला देवी फाउडेशन का द्विजदेव सम्मान मिला। के.के. बिडला फाउडेशन का व्यास सम्मान मिला। यह कविता का अर्थात पर था। इसी माह मेरी आने वाली किताबें हैं- प्रतिनिधि कविताएं-संपादक अरुण कमल, इस बार सपने में तथा अन्य कविताएं- संपादक अनामिका, कविता का अर्थात पेपर बैक-वाणी प्रकाशन और गोरखपुर के शैवाल प्रकाशन से सन्नाटे में बारिश, यह कॉलम नुमा निबंध है। नेरुदा की ७० कविताएं अविधा प्रकाशन से आ रही है। पहल में विस्थापन और संस्कृति लेख माला के रूप में आ रही है। एक विस्थापित की डायरी का पाकिस्तान में अनुवाद हो रहा है। पाकिस्तान हिंदी प्रकाशक हमारी रचनाआें का उर्दू तर्जुमा छाप रहे हैं। यह सब इसी समय में हो रहा है। इसलिए तालमेल के लिए अलग से सोचने और चिंतित होने के जरूरत नहीं।

सवाल : विगत कुछ वर्षो से गोरखपुर हिंदी के लिए चर्चित हो रहा है, खासकर सम्मान के साथ। इस पर कुछ कहना चाहेंगे?

जवाब : भारत-भारती पिछले वर्ष रामदरश जी को मिला। मुझे व्यास मिला। रामचंद्र तिवारी जी, विश्वनाथ जी, रामदेव शु ल, गिरीश रस्तोगी, देवेंद्र आर्य सहित अनेक रचनाकार हिंदी जगत में सम्मानित हो चुके हैं। यह हिंदी पत्रकारिता की सक्रियता से संभव हो पा रहा है और खास बात यह कि गोरखपुर में नयी खिड़कियां खुल रही हैं।

- साभार अमर उजाला

Thursday 14 February 2008

पीएम हाउस में मोर नाचा

कहानी

ओमप्रकाश तिवारी

सुबह नींद मोबाइल की धुन बजने से खुली। आंख मिचमिचाते हुए मोबाइल के मुंह को खोला तो उधर से एक मित्र की आवाज आई।
- या कर रहे हो?
- या करें?
- आज का अखबार देखा?
- नहीं, या हो गया? अमेरिका पर आतंकवादी हमला हुआ है या?
- अरे नहीं यार।
- फिर या देश से गरीबी मिट गई?
- सुबह-सुबह या बकवास कर रहा है?
- बकवास मैं कर रहा हूं कि तू। कितनी बढ़िया नींद आ रही थी। जगा दिया।
- अरे जागो प्यारे मोहन, यह जागने का व त है।
- यों? या देश से बेरोजगारी खत्म हो गई?
- अरे, नहीं यार।
- फिर या अमेरिका ने किसी देश पर हमला किया है?
- ऐसा कुछ भी नहीं हुआ है।
- तो फिर या हुआ है?
- पीएम हाउस में मोर नाचा है प्यारे मोहन।
- तू पागल हो गया है या? मोर जंगल में नाचता है बच्चे।
- इसीलिए तो कह रहा हूं प्यारे मोहन, जागो, उठो और अखबार पढ़ो।
दोस्त ने फोन काट दिया। मेरी भी नींद भाग गई।
साले मोर को या हो गया? जंगल छाे़डकर पीएम हाउस में आ गया। सोचते हुए चारपाई से उठा। दरवाजे पर गया और अखबार उठा लाया।
पहले पन्ने पर ही पीएम हाउस में नाचते हुए मोर की तस्वीर छपी थी।
-अरे वाह! यह तो कमाल हो गया। पूरा का पूरा सिद्धांत और दर्शन ही बदल गया। मेरे मुंह से ये शब्द अनायास ही निकल पड़े।
तस्वीर के साथ समाचार भी छपा था। शीर्षक था-पीएम हाउस में मोर नाचा। लिखा था कि आज जब प्रधानमंत्री अमेरिका की यात्रा पर जाने से पहले अपने मंत्रिमंडल के सहयोगियों से विदा ले रहे थे तो उसी व त पीएम हाउस में एक मोर नाचने लगा। मोर को नाचते देख पीएम हाउस में अफरा तफरी मच गई। हर कोई यही कह रहा था कि यह मोर यहां पर कैसे आ गया? प्रेस फोटोग्राफरों और टीवी कैमरा वालों के लिए यह ऐतिहासिक क्षण था। सभी नाचते हुए मोर की तस्वीर अपने कैमरे मेें कैद करने लगे। कुछ उत्साही टीवी पत्रकार और कैमरामैन तो मयूरनृत्य को लाइव दिखाने लगे। सबसे पहले की हाे़ड में चैनल वाले टूट पड़े और उसके पत्रकार मोर के बारे में कुछ भी बोले जा रहे थे। चैनलों के स्टूडियो में बैठी एंकर भी अजीबो गरीब सवाल पूछे जा रही थी। ब्रेकिंग न्यूज चल रही थी कि पीएम हाउस की सुरक्षा में सेंध। मोर पीएम हाउस में घुसा और नृत्य कर रहा है। सुरक्षा बलों के बयान लिए जा रहे हैं। नेताआें से टिप्पणी मांगी जा रही है। स्टूडियों में विशेषज्ञ बुला लिए गए है। गहन परिचर्चा भी आरंभ हो गई है। चैनल देखकर ऐसा लगा कि देश पर घोर विपदा आ गई है। एक चैनल की एंकर ने अपने संवाददाता से सवाल किया कि या अब भी प्रधानमंत्री अमेरिका की यात्रा पर जाएंगे? संवाददाता ने कहा कि इस संबंध में जानकारी तो नहीं मिल पाई है लेकिन मेरा मानना है कि पीएम को अपनी यात्रा रद कर देनी चाहिए। यात्रा से पहले अपशगुन हुआ है। अभी मोर घुस आया है। अगर आतंकवादी घुस आता तो या होता। एंकर ने फिर सवाल किया कि यदि आतंकवादी घुस आता तो या होता? कितना नुकसान पहुंचाता? या मार दिया जाता? या अपने मकसद में कामयाब हो जाता? संवाददाता फिर बोला कि कुछ भी हो सकता था। वह अपने मकसद में कामयाब भी हो जाता। पकड़ा भी जा सकता था।
टीवी चैनलों की इस गहमा गहमी के बीच पीएम अपने मंत्रिमंडल के सहयोगियों से विदाई लेते रहे। हर कोई उन्हें झुकर सलाम कर रहा है। फूलों का गुलदस्ता भेंट कर रहा है और तस्वीरें खिंचवा रहा है, लेकिन मोर के नाचने से यहां पर व्यवधान पड़ा। चूंकि मीडिया मयूरनृत्य पर मोह गया तो नेतानृत्य की तस्वीर कौन खींचे? ऐसे में नेताआें की त्योरी चढ़ गई। सुरक्षाबलों को आदेश हुआ कि मोर को जल्दी भगाओ। इस पर जवाब मिला कि चैनल वाले लाइव दिखा रहे हैं। यह जवाब मिलना था कि एक नेता चीखा। इसीलिए तो कह रहा हूं कि मोर को भगाओ, नहीं तो ये मूर्ख लोग पता नहीं या- या करेंगे? यहां प्रधानमंत्री इतने महत्वपूर्ण दौरे पर जा रहे हैं। हम लोग मिलने आए हैं। ऐसी शुभ घड़ी पर इस कार्यक्रम को दिखाने के बजाए मयूरनृत्य का सीधा प्रसारण कर रहे हैं।
कुछ जवान मोर को भगाने के लिए गए तो मीडिया वालों ने विरोध कर दिया। बोले यार इतनी बढ़िया बाइट्स मिल रही है। यों चौपट कर रहे हो। जो इसे लाइव दिखा रहे हैं उनकी टीआरपी बढ़ जाएगी। ऐसे में भैये यह मोर नहीं हमारे लिए तो भगवान है। इसकी आरती कर लेने दे भाई।
जवान बोले कि लेकिन नेता जी विरोध कर रहे हैं। कह रहे हैं कि उनके कार्यक्रम को लाइव करो। यह सुनना था कि कई टीवी चैनल के पत्रकार हंसकर बोले कि उनसे बोलो कि ऐसा ही नृत्य वह भी करें। उनका भी सीधा प्रसारण कर देंगे। अभी तो आप जाओ और इसे नाचने दो। इसके जवाब में एक जवान ने चुटकी ली कि भाई नृत्य तो वह भी कर रहे हैं लेकिन आप लोगों को उनकी नाच शायद अच्छी नहीं लग रही है।

मोर को बिना भगाए जवान वापस लौटे तो एक नेता चीखा कि या हुआ?
- मीडिया वाले मोर को भगाने नहीं दे रहे हैं।
- तो इन सालों को भी भगा दो। नमक हराम, कमीने कहीं के।
- जवान जाने लगा तो नेता फिर चीखा। साले ऐसे न मानें तो मोर को गोली मार दो।
- लेकिन सर, वह राष्ट ्रीय पक्षी है और यह मीडिया वाले।
- तो या हुआ? हम किसी की परवाह नहीं करते। नेता गुस्से में बोला।
इसी बीच पीएम वहां से निकल कर बाहर आ गए। वह अपनी कार में बैठे ही थे कि मीडिया भी उनके पीछे भागा।
मयूरनृत्य का सीधाा प्रसारण बंद।
जब मीड़िया वाले चले गए तो मोर ने भी नाचना बंद कर दिया। इधर-उधर निगाह दाै़डाया और पास की झाड़ियों में गुम हो गया।
समाचार पढ़कर जम्हाई ले रहा था कि मित्र का फोन फिर आया।
- अखबार पढ़ा या?
- हां, पढ़ा।
- तो यह बताओ पीएम हाउस में मोर यों नाचा?
मुझसे कोई उत्तर देते नहीं बना, मैं चुप रहा। फिर मुझे लगा कि मित्र से ही पूछ लेना चाहिए।
- इसका उत्तर तो तू ही बता सकता है बच्चे।
- साजिश प्यारे मोहन साजिश
किसकी?
- पाकिस्तान की
वह भला यों?
- योंकि प्रधानमंत्री अमेरिका की यात्रा पर जा रहे थे। पाकिस्तान नहीं चाहता कि हमारे रिश्ते अमेरिका से ठीक हों।
- वह भला यों?
- योंकि यदि अमेरिका हमारा दोस्त बन जाएगा तो पाकिस्तान किसके दम पर हमें धमकाएगा। यों? सही कह रहा हूं न?
- अब तू कह रहा है तो सच ही कह राह होगा।
दोस्त ने फोन काट दिया। मैं सोच में पड़ गया। पीएम हाउस में मोर यों नाचा? या कारण हो सकता है? यही सब सोचते-सोचते मुझे नींद आ गई।
सपने में मेरी मुलाकात पीएम हाउस में नृत्य करने वाले मोर से होती है। मंै उससे सवाल करता हूं।
- हे मेरे देश के राष्ट ्रीय पक्षी। आपने पीएम हाउस में नृत्य यों किया?
- योंकि आपके प्रधानमंत्री अमेरिका की यात्रा पर जा रहे थे।
- महोदय, उनकी अमेरिका यात्रा से आपके नृत्य का या संबंध?
- हे भले मानुस। या तुम इतना भी नहीं जानते कि पूरी दुनिया में अमेरिका के इशारे के बिना पत्ता भी नहीं हिलता।
- जानता हूं वत्स।
- तो, श्रीमान जी बेवकूफों जैसा सवाल यों कर रहे हैं?
- वत्स, बेवकूफ तो तुम हो जो जंगल छाे़डकर पीएम हाउस में नाच रहे हो।
- नहीं श्रीमान। आपका आरोप निराधार और बेबुनियाद है। आपको ज्ञात होना चाहिए कि धरती पर जंगल कितने बचे हैं। कितने प्राणी लुप्त हो गए हैं। हमारी जाति भी संकट में है। इसी संकट के निदान के लिए मैं पीएम हाउस गया था। सोचा था बढ़िया नृत्य करुंगा तो पीएम प्रसन्न हो जाएंगे। लेकिन वहां तो पहले से ही नृत्य करने वाले मौजूद थे। उनके आगे मेरी एक न चली। हां, मीडिया वालों ने अपने चैनलों पर दिखाकर मेरे महत्व को रेखांकित जरूर किया, लेकिन उन्होंने भी मुझे आतंकवादी बनाकर प्रस्तुत किया। खैर, इससे या फर्क पड़ता है। मुझे कवरेज तो मिल ही गई। अब यह खबर अमेरिका तक तो पहुंच ही जाएगी। हो सकता है अमेरिका हमारी जाति के लिए भी कुछ करे। किसी पैकेज-वैकेज की घोषणा करे। ताकि हम विलुप्त होने से बच जाएं।
- वत्स, तुम तो बड़े समझदार निकले।
- श्रीमान जी, यह समझदारी आदमियों की सोहबत से ही आई है।
- मैं समझा नहीं वत्स।
- श्रीमान जी, जब मैं बहुत छोटा था तो मुझे एक आदमी जंगल से पकड़ कर ले गया। मैं अपने माता-पिता और दोस्तों के लिए बहुत तड़पा, लेकिन उसने मुझे पिंजरे मेंं कैद करके रखा। धीरे-धीरे मुझे भी अच्छा लगने लगा। मां-बाप को भूल गया। इस तरह आदमियों वाले गुण मुझमें आते गए। बाद में तो वह मुझे पिंजरे से आजाद कर दिया। फिर भी मैं जंगल में नहीं गया। योंकि मैं जान गया था कि जंगल रह ही नहीं गए हैं। हमारी जाति संकट में है। ऐसे में उसी आदमी के साथ रहने में ही मुझे अपनी भलाई दिखी। सोचा इसके यहां रहकर ही मैं अपनी जाति केलिए कुछ कर सकता हंू। धीरे धीरे उसकी सारी आदतें मुझमें आ गइंर्। बिना दुम के भी दुम हिलाने की उसकी कला मुझे बहुत पसंद आई। वह इसी कला से बड़े से बड़ा काम करवा लेता। एक दिन मंैने भी सोचा कि मैं भी इस कला का प्रदर्शन करके अपनी जाति को बचाऊंगा। बस यही सोचकर पीएम हाउस पहुंच गया। अब देखो या परिणाम सामने आता है।
- परिणाम अच्छा ही आएगा वत्स।
- मैं वत्स नहीं, तुम्हारी पत्नी हूं। इतना दिन चढ़ गया और अभी तक सो रहे हो। पत्नी की आवाज सुनकर मैं जागा तो बड़ी देर तक खुद पर यकीन नहीं हो रहा था।

Tuesday 12 February 2008

सृजनकर्ता और सेल्समैन की तुलना नहीं हो सकती

ओमप्रकाश तिवारी
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आजकल बहस हो रही है कि या फिल्मी लेखक और गीतकार-साहित्यकार नहीं हैं? वैसे तो यह बहस के लिए कोई मुद्दा ही नहीं है। लेकिन यह बाजारवाद है, जैसे बाजार में कुछ भी बिक सकता है और बहुत अच्छा नहीं बिकता, वैसे ही बाजारवाद में किसी भी मुद्दे े पर बहस की जा सकती है। चाहे वह देश व समाज के लिए जरूरी हो या न हो। ऐसी बहसों को बल मिला है जब से ब्लॉग लेखक पैदा हुए हैं। तकनीक की यह नई विधा बहसों और सूचनाआें के विस्फोट के साथ सामने आई है और विकसित हो रही है। इस विधा में कोई संपादक नहीं है। लिखने वाला ही संपादक है। इस कारण कभी-कभी यह अभिव्यि त की स्वतंत्रा का दायरा ताे़डकर स्वच्छंद हो जाती है।
कहा जा रहा है कि बहस पुरानी है, लेकिन टीवी पत्रकार रवीश कुमार अपने ब्लॉग कस्बा पर इसे फिर से हवा दी है। वह पूछते हैं कि लोकप्रिय गीतकारों, खासकरके फिल्मी गीतकारों को कवि यों नहीं माना जाता? प्रसून जोशी जैसे गीतकारों पर नामवर सिंह जैसे आलोचक यों नहीं लिखते? यों उन्हें साहित्य अकादमी वगैरह पुरस्कार नहीं दिए जाते? और तो और दावा यह भी किया जा रहा है कि बालीवुड के नए गीतकार और पटकथा लेखक इस पतनशील व त में प्रगतिशील रचना कर रहे हैं। या मासूम दावा है, पतनशील व त में प्रगतिशील रचना। जिन लोगों का नाम लेकर यह दावा किया गया है उन्हें यदि प्रगतिशील मान लिया जाए तो शायद प्रगतिशील शब्द के नए अर्थ गढ़ने पड़ेंगे। प्रगतिशीलता को फिर से परिभाषित करना पड़ेगा।
रवीश कुमार अच्छे फीचर राइटर हैं। उन्हें अपनी स्टोरी को इस पतनशील व त में बेचना आता है। जी हां, बेचना ही कहेंगे इसे, योंकि यदि उनकी स्टोरी को टीआरपी न मिले तो उसकी कोई बाजार वैल्यू नहीं रह जाती। फिर वही लोकप्रिय स्टोरियां रद्दी की टोकरी में फेंक दी जाती हैं। जो लोकप्रिय है वह अच्छा हो, प्रगतिशील हो यह जरूरी नहीं है। लोकप्रियता को प्रगतिशीलता का जामा पहनाना नदानी होगी। रवीश कुमार खुद कोई प्रगतिशील फीचर स्टोरी तैयार करें और यदि वह बाजार के मानकों को नहीं पूरा करेगी तो उसका प्रसारण नहीं किया जाएगा। अपने अब तक केकैरियर में वह इस बात को कई बार महसूस भी कर चुके होंगे। यदि अपनी सभी भावनाआें और संवेदनाआें को वह लोकप्रिय बनाकर टीवी पर बेच पाते तो शायद उन्हंे ब्लॉग लेखक न बनना पड़ता। जाहिर है कि रवीश कुमार ने एक अलग दुनिया को एक दूसरी दुनिया में घुसे़डने का प्रयास किया है। बताने की जरूरत नहीं है कि फिल्मी दुनिया एक अलग दुनिया है तो साहित्य की दुनिया उससे बिल्कुल अलग है। फिल्मी दुनिया के लोग स्टार कहे जाते हैं और लाखों-कराे़डों रुपयों में खेलते हैं। जबकि साहित्य जगत के लोग खास करके हिंदी साहित्य के किसी लेखक के लिए तो हजारों रुपये मिलना भी किसी सपने के समान होता है। फिल्मी दुनिया में ग्लैमर है, पैसा है और स्टारडम है। यह लोग इंसान की भावनाआें और संवेदनाआें का धंधा करते हैं। अ सर इनका कोई सामाजिक सरोकार भी नहीं होता। समाज, देश, भावना और संवेदना का इस्तेमाल यह लोग पैसा कमाने के लिए करते हैं। यह कितना अजीब लगता है कि हिंदी की रोटी खाने वाले अभिनेता, अभिनेत्रियां और फिल्मी दुनिया के अन्य लोग अंग्रेजी में ही गिटिर-पिटिर करते हैं।
साहित्यकार का सरोकार समाज, इंसान, देश-दुनिया से जु़डा होता है, बाजार से नहीं। साहित्यकार मूल्यों की रचना समाज और देश को ध्यान में रखकर करता है। जबकि फिल्मी लेखक की रचाना बाजार आधारित होती है। वह अपनी रचना का मूल्य बाजार से वसूल लेता है। जो फिल्मी राइटर ऐसा नहीं कर पाता वह फ्लाप घोषित कर दिया जाता है और उसका कैरियर चौपट हो जाता है।
प्रसून जोशी लोकप्रिय फिल्मी गीतकार हैं तो उन पर नामवर सिंह यों लिखें? उन पर लिखने के लिए रवीश कुमार तो हैं! प्रसून जोशी जब मनोहर श्याम जोशी जैसा कुछ करेंगे, रचेंगे तब उन पर नामवर सिंह लिखेंगे। वैेसे भी लोकप्रियता को यदि प्रतिशीलता का पैमाना माना जाए तो सुरेंद्र मोहन पाठक, ओम प्रकाश शर्मा और वेद प्रकाश शर्मा जैसे लेखकों को पहले प्रगतिशील मानना पड़ेगा और नामववार सिंह को पहले उन पर लिखना पड़ेगा। साहित्य अकादमी और ज्ञानपीठ तथा अन्य पुरस्कारों के लिए इनकी दावेदारी प्रसून जोशी व अन्य फिल्मी लेखकों से शायद अधिक मजबूत होगी।
जिस तरह फिल्म फेयर पुरस्कार किसी साहित्यकार को नहीं मिल सकता, उसी तरह किसी फिल्मी लेखक को साहित्य अकादमी पुरस्कार नहीं मिल सकता और मिलना भी नहीं चाहिए। मूल्यों का सृजन करने वाले और सृजित मूल्यों को बेचने वालों की तुलना कैसे की जा सकती है? एक सृजनकर्ता है और एक सेल्समैन।

Saturday 9 February 2008

मुंबइॆ िकसी की बपौती नहीं


अानंद िसंह
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बिहार अौर उत्तर प्रदेश के लोगों के िखलाफ जहर उगलने के बाद बाला साहेब ठाकरे के पुत्र उद्धव ठाकरे अौर उनके भतीजे राज ठाकरे ने अप उन समस्त लोगों को अपना िनशाना बनाया है जो बाहरी राज्यों से यहां अाकर अपना जीवन-यापन कर रहे हैं। ताजा बयान उद्धव ठाकरे का अाया है िजन्होंने कहा है िक मुंबई में रहने वाले बाहरी लोगों को मराठी सीखनी ही होगी। उनका यह भी कहना है िक मुंबइॆ एयरपोर्ट का नाम मराठी में होना चािहए, िहंदी या अंग्रेजी में नहीं। राज अौर उद्धव का बयान संकीर्णता की पराकाष्ठा है। यह उन लोगों को बढ़ावा देने वाला है जो छोटे राज्यों के बहाने देश भर में लोगों को लड़ाने का काम कर रहे हैं। जब इॆश्वर ने हमें बनाने में भेद नहीं िकया तो ये राज अौर उद्धव कौन होते हैं एक इंसान को मराठी या िबहारी के चश्मे से देखने वाले? राज अौर उद्धव, इन दोनों भाइॆयों ने िमल कर िजस तरीके से गैर मरािठयों के िखलाफ अिभयान चला रखा है, वह पूवाॆंचल (नाथॆ-इॆस्ट) के अल्फा मूवमेंट की याद िदलाता है। गोरखपुर में रहने वाले मराठी पिरवारों से जब मैंने बातचीत की तो उन सभी ने एकस्वर में राज का िवरोध िकया अौर दो टूक कहा िक ये लोग मराठा कौम को बरबाद कर रहे हैं। इनका कहना था िक राज का मराठी समाज में कोइॆ खास स्थान नहीं है िसवाय इसके िक वह बाला साहेब के भतीजे हैं। यही सत्य है। इस बात की जरूरत सबसे अिधक है िक अब लोग इनकी बातों का कड़ा से कड़ा प्रितकार करें।

Tuesday 5 February 2008

क्यों नहीं खेलेगी सानिया?


भारत की टेनिस सनसनी कही जानेवाली सानिया मिर्जा ने भारत में नहीं खेलने का ऐलान कर उन लोगों के मुंह पर तमाचा मारा है जो उसे बेमतलब के विवादों में घसीटकर अपनी दुकानदारी चला रहे थे।
ये वही लोग हैं जिनकी अपनी कोई खास पहचान नहीं। उन्हें सानिया की तंग ड्रेस से कोई मतलब नहीं, उन्हें तिरंगे के मान की भी चिंता नहीं। वे तो बस सानिया की पहचान पर कीचड़ उछालकर अपनी पहचान बनाना चाहते थे। अगर ऐसा नहीं होता तो सानिया की बजाय अपने घर और आसपास के लोगोंं पर अपने सड़े विचार लागू करते। लेकिन इस स्थिति मेंं उन्हें कोई पब्लिसिटी नहीं मिलती। सानिया के यहां नहीं खेलने से भी इन्हें कोई फर्क नहीं पड़ता। योंकि ये लोग टेनिस के भी प्रेमी नहीं हैं योंकि उन्हें टेनिस की गेंद नहीं सानिया की टांगें दिखती हैं। फर्क उन्हें पड़ता है जो सानिया में एक राष्ट्रीय गर्व का अहसास करते हैं। उसकी हर झन्नाटेदार शाट और जीत पर जिनका सीना फूल जाता है। देश में बढ़ती गरीबी और अधिकतर मोर्चे पर पराजय के बीच जीत के जज्बे को सेलीब्रेट करते हैं। जो धर्म, मजहब और राजनीति से आगे बढ़कर हुनर को सलाम करते हैं, उन्हें सानिया के अपनी जमीन पर नहीं खेलने फर्क पड़ता है। फिर आप ही बताइए कि सानिया को इन लोगों के लिए योंं नहीं खेलना चाहिए?
दुखी सानिया ने कहा है कि वे किसी और विवाद से बचने के लिए बंगलुरू ओपन स्पर्धा से ही दूर रहेंगी। उन्होंने कहा कि मेरे मैनेजर ने मुझे भारत में नहीं खेलने की सलाह दी है। सानिया ने अफसोस जताया कि वे जब-जब भारत में खेली हैं, उन्हें किसी न किसी परेशानी का सामना करना पड़ा। इसलिए इस बार हमने न खेलना ही ठीक समझा। कभी कट्टरपंथियों ने टेनिस कोर्ट पर पहने जाने वाली पोशाक पर आपत्ति जताई तो हाल ही उन पर पिछले दिसंबर में हॉपमैन कप के दौरान राष्ट्रीय ध्वज तिरंगे का अपमान करने का आरोप लगा और उनके खिलाफ देश की कुछ अदालतों में मुकदमे भी दायर किए गए। कोर्ट से बाहर के इन बवालों से सानिया इतनी दुखी थीं कि एक बार तो उन्होंने टेनिस को ही छोड़ने का इरादा कर लिया था।

Monday 4 February 2008

Sunday 3 February 2008

यहां प्रेम करना गुनाह है


धर्मवीर
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हरियाणा में प्रेमी जाे़डों की हत्या का सिलसिला जारी है। शुक्रवार को जहां कुरूक्षेत्र में अपने प्र्रेम को परवान न चढ़ता देख प्रेमी जाे़डे ने खुद ही अपनी जीवनलीला समाप्त कर ली, वहां यमुनानगर में बिरादरी की नाक के ठेकेदारों ने एक प्रेमी जाे़डे को पीट-पीट कर मार डाला। पंचायत ने बाद में दोनों पक्षों को यह कह कर चुप करवा दिया की दोनो पक्षों कोे बराबर का नुकसान हुआ है। मामला किसी तरह मीडिया की नजर में आ गया,तब जाकर कहीं केस दर्ज हुआ। मगर इसे मीडिया की मजबूरी कहा जाए या फिर मीडिया में बैठे लोगों की सामंती मानसिकता कि जो संवाददाता कंपकपा देेने वाली सर्द रात में मामले की तमाम बारीकियंा लेकर आया उसी केअखबार ने खबर को उसके संस्करण में नही छापा। डर रहा होगा कि ऐसी खबर सेे अखबार के हित प्रभावित हो सकते हैं।
यमुनानगर के छौली गांव के प्रवीण व नीलम का कसूर इतना ही था कि उन्होने खाप पंचायतों के कुख्यात हरियाणा में अंतरजातीय प्र्रेम का दु:साहस किया। दोनों को पकड़ कर तब तक पीटा गया जब तक की उनक ी जान नही निकल गई। जैसा कि अ सर होता है पंचायत ने मामले को गांव की नाक का सवाल समझा और न्यायिक प्रक्रिया को गांव में निपटा ही दिया। लड़की वालों के माथे पर अपराध की कोई सिकन नही बल्कि नाक को बचाने का गर्व झलक रहा था। हरियाणा के सामाजिक चरित्र पर बहस करने वाले मा र्सवादी चिंतक भले ही ऐसी घटनाआें को सामंती अवशेष मान कर खारिज कर दे मगर प्रेमी जाे़डों की हत्याआें का यह सिलसिला कुछ और ही कहता है। हरियाणा में ऐसी हत्याआें को न्यायसंगत ठहराने के लिए बाकायदा एक राजनैतिक तानाबाना बन चुका है। खाप पंचायतों को और अधिक संगठित रूप देने के लिए हाल ही में जाट तख्त की चर्चा शुरु हो चुकी है। जाट तख्त के विचार को हवा देने वाली आदर्श जाट महासभा ने अपने घोषणापत्र में अंतरजातीय विवाहों के खिलाफ ऐसी ही सजा का खुले तौर पर समर्थन किया है। गोत्र के नियम कड़े करके आए रोज शादियों को ताे़डना व पति-पत्नि क ो भाई बहन बनाना हरियाण की नियति बन चुका है। ऐसी घटनाएं साबित कर रही है कि २१वीं सदी में प्रवेश करने वाला हरियाणा वास्तव में आज भी कबाइली युग में जी रहा है। खाप पंचायतों के ये फतवे प्रेमी जाे़डों तक सीमित नही है। इनके निशाने पर तमाम तरह की परिवर्तनकामी ताकतें है। प्रतिक्रियावादी ताकतों को डर है कि किसी भी तरह का परिवर्तन इनकी सत्ता को उखाड़ फैंकेगा। ये हत्याएं अपनी सत्ता को बचाए रखने की छटपटाहट का ही परिणाम है।

Saturday 2 February 2008

हर कामकाजी महिला पुरुष के लिए चालू

धर्मवीर
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आपने आज के समय का एक महत्वपूर्ण सवाल उठाया है। मगर सवाल मीडिया का ही नही है। पुरूष ने तमाम उत्पादक क्षेत्रों में महिलाआें के कदम रखने पर इसी अस्त्र का प्रयोग किया है। पुरूष के लिए हर कामकाजी महिला 'चालू`है। इंर्ट भट्ठ े पर काम करने वाली मजदूर से लेकर इलेे ट्रोनिक चैनल की एंकर तक सब को एक ही लाठी से हांका जाता है।यही कारण है कि लंबे समय तक महिलाएं ऐसे किसी क्षेत्र में उतरने का साहस ही नही कर पाई।अब जब उसने कुछ खतरे उठाने की सोच ही ली तो पुरूष अपनी मर्दानगी पर उतर आया है।अपने एकाधिकार को बचाए रखने का अच्छा तरीका निकाला है हम पुरूषों ने। पहले से ही समाजिक इज्जत और खानदान की नाक का सवाल बना कर महिलाआें के लिए अवसर सीमित कर दिए जाने के बाद उन्हे मुख्यधारा से बिल्कुल बेदखल करने का यह निहायत ही छिछोरा काम हैं। आखिर हम महिला को एक शरीर की बजाय इंसान यों नही मान पा रहे। इसके साथ ही यह भी उतना ही कड़वा सच है कि बालीवुड की तरह साहित्य या फिर मीडिया के हंस भी मोती चुगने का मौका नही छाे़डते। मीडिया के परमेश्वर ही आज इस बहस को छे़ड कर अपनी नंगई पर उतर आए हैं। शायद यही कारण है कि महिलाआें के संदर्भ में बौदि्घकता अ सर मात खा जाती है। मीडिया में जेंडर सेंसटिव वातावरण को कायम करना हमारी पहली जिम्मेवारी है। तभी महिलाएं भी देह द्वार की बजाय दुर्ग द्वार पर दस्तक दे पाएगी।

यह सच नहीं है जनाब!


मीडिया में महिलाओं की स्थिति पर बहस में स्थिति बड़ी अजीब सी दिख रही है। ढेर सारे मीडियाकर्मी साथियों के फोन आए पर इस पर सच लिखने का साहस कम ही लोग दिखा पा रहे हैं। इस कड़ी में वरिष्ठ पत्रकार संजय मिश्रा की बेबाक टिप्पणी-

संजय
मिश्रा
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मीडिया नारद ने बहुत ही गैर जरूरी सा लगने वाला बहुत ही जरूरी सवाल उठाया है, क्या मीडिया में महिलाओं की सफलता देह से होकर गुजरती है? पहले तो इस सवाल से कन्नी काट जाने का मन हुआ। सोचा क्या बेकार सवाल है। अपनी गलतफहमी को हम मीडिया वाले सच बनाने के लिए क्या-क्या न बवाल काटते रहते हैं। मगर, मेरे मगज में यह सवाल कुछ उस तरह की कीड़े की तरह घुस गया, तो रेंगता है, तो ऐसी खुजली होती कि दिमाग भन्नाए जा रहा है।
मीडिया में महिलाओं की सफलता देह से होकर गुजरती है, यह वाक्य उतना ही झूठ है, जितना कभी यह माना जाता था कि पृथ्वी चपटी है। लेकिन इस सवाल के पीछे जो सच है, वह उतनी ही कडुवा। मीडिया की जमात में ऐसे भी शामिल है, जो आंखों ही आंखों से अपनी किसी महिला सहकर्मी का बलात्कार कर सकते है। मतलब वे ब्लाऊज के अंदर ब्रा का रंग अपने साथियों को खींसे निपोर कर बताते हैं। वे यह बताते हैं कि ब्लाऊज के पीछे तीसरे नंबर का बटन टूटा हुआ है। वे स्तनों की गोलाई पर भी चर्चा करते हैं। जब इससे भी मन नहीं भरता, तो महिला सहकर्मी की देह की चर्चा कथित तौर पर अपने साहित्य में करते हैं। इसका नमूना है हंस का मीडिया अंक, जिसकी तमाम कहानियों महिला सहकर्मियों की देह से शुरू होती है और देह पर ही खत्म हो जाती है। इस मीडिया अंक को हमारे साथी रूदाली अंक के नाम से भी याद करते हैं।
मीडिया में रिलेशनशिप को सेक्स का एंगल उन भुख्खकड़ों के कारण, उन कुंठित लोगों के कारण मिल जाता है, जो हर सफलता में सेक्स का राज तलाशते हैं। कास्टिंग काउज का स्टिंग आपरेशन मीडिया मे होता नहीं है लेकिन हर दिन इस पर चटकारे जरुर लिए जाते हैं। मुझे तो भविष्य का एक सवाल अभी से दिख रहा है-क्या चिकने लौंडे टाइप पुरूष पत्रकारों की सफलता भी देह से होकर गुजरती है। जरा मेरे सवाल पर भी गौर फरमाइएगा।