Saturday, 1 November 2008

ये कैसी संस्कृति, ये कैसा विस्तार

विनोद के मुसान
भारतीय संस्कृति में धर्म का बड़ा स्थान है। संविधान नेप्रत्येक नागरिक को अपने धर्म के अनुसार जीवन व्यापन करने, उसकी रक्षा करने और उसके विस्तार का अधिकार प्रदत्त किया है। यहां तक तो ठीक है, लेकिन दि कत तब आती है, जब संविधान में दिए गए इस अधिकार का लोग दुरुपयोग करने लगते हैं, जिससे दूसरे कई लोगों को दि कत होती है। बात 'धर्म` से जु़डी होती है, इसलिए कोई खुलकर विरोध भी नहीं कर पाता है। लेकिन बापू के इस देश में ऐसा नहीं होना चाहिए, जैसा कि वर्तमान में हो रहा है।


मैली होती गंगा : गोमुख से निकलने वाली निर्मल और स्वच्छ गंगा हरिद्वार के बाद अपना रंग बदल देती है। या आपने कभी सोचा है, ऐसा यों होता है। यकीनन उसमें जगह-जगह सीवरेज और फैि ट्रयों से निकलने वाला गंदा पानी मिल रहा है। लेकिन, गंगा में आस्था रखने वाले उसके या कर रहे हैं। उसे साफ रखने के बजाय उसे और गंदा कर रहे हैं। पूजा-अर्चना के बाद प्रसाद की पॉलीथीन, बच्चे के मुंडन के बाद उसके बाल, साथ में लाई गई अन्य गंदगी गंगा में बहा दी जाती है। नहाने के बाद मैले कपड़े उसमें निचाे़ड दिए जाते हैं।
एक कुप्रथा देखिए-पता नहीं किस मूर्ख ने इसकी शुरूआत की-ऋषिकेश में राम झूला के पास एक घाट है, जहां लोग नहाने के बाद अपने अंडरवियर छाे़ड जाते हैं। पूछने पर आस-पास बैठे पंडे बताते हैं, ऐसा करने से आदमी पूरी तरह शुद्ध हो जाता है। लेकिन, वहां घाट पर बिखरे सैकड़ों अंडरवियर को देखकर मन खिन्न हो जाता है। गंगा हमारी मां के समान है, लेकिन उसके बेटों को कौन समझाए कि बेटा अब तुम जवान हो गए है। कम से कम नहाने के बाद अपना अंडरवियर तो संभाल लो। या अब भी इसे मुझे ही धोना पड़ेगा।
नगर कीर्तन : आप घर से किसी जरूरी काम के लिए निकले और रास्ते में आपको मिल गया नगर कीर्तन। सड़कें जाम। ट्रैफिक का बुरा हाल। पुलिस वालों द्वारा अमुक चौराहे पर आपको तब तक रोके रखा जाता है, जब तक की पूरा नगर कीर्तन गुजर जाए। इस दौरान ट्रैफिक में कोई मरीज भी फंसा होता है तो किसी की बस या ट्रेन छूटने वाली होती है। इतना ही नहीं इस दौरान नगर कीर्तन के साथ गुजरने वाला जत्था अपने पीछे सड़कों पर छाे़ड जाता है तमाम गंदगी। जिससे साफ करने वाला कोई नहीं। नगर कीर्तन का स्वागत करने वाले अपने श्रद्धा जताने को जगह-जगह लंगर तो लगा देते हैं, लेकिन इस ओर ध्यान नहीं देते की पीछे छूटने वाली गंदगी को कौन साफ करेगा। खासकर के पंजाब में यह दृश्य आम है।
जगराते : भगवान ने रात बनाई है सुकून से सोने के लिए। लेकिन आए दिन गली-मोहल्लों में होने वाले जगराते इसमें खलल डालते हैं। मुझे नहीं लगता दुनिया के किसी भी धार्मिक ग्रंथ में यह बात लिखी हो कि ऊंची आवाज में की गई तों की प्रार्थना भगवान जल्दी सुनते हैं। फिर यह शोर यों? आजकल हर गली मोहल्ले में कुछ लोगों ने अलानां-कमेटी, फलानां-कमेटी बनाकर हर साल निश्चित दिन पर जगराता कराने का ठेका ले रखा है, जिसके खर्चे वे आम जन से चंदे के रूप में वसूलते हैं। जगराता कमेटी को कोई फर्क नहीं पड़ता कि किसी के बच्चों की परीक्षा हो रही है, या आस-पास के घरों में कोई बीमार है। आधुनिक युग में भि की यह परंपरा कम से कम मुझे तो रास नहीं आती, आपका या कहना है।
'भजनों` का शोर : सुबह तड़के चार बजे मुर्गे की बाक, घर के पास स्थित मंदिर से आती शंक की ध्वनि, मस्जिद से आजान और गुरुद्वारे के लाडस्पीकर से सुनाई देती गुरुवाणी यकीनन कर्णप्रिय होती है। नए दिन की शुरूआत को आलौकिक करने वाली ये ध्वनियां भारतीय जनमानस के हृदय में बसी हैं। लेकिन, आधुनिक युग में धार्मिक वातावरण अब वैसा नहीं रहा। आज जब एक गली में दो गुरुद्वारे तीन मंदिरों और एक मस्जिद से एक साथ ये ध्वनियां उत्पन्न होती हैं तो 'शोर` का रूप धारण कर लेती हैं, जो कतई कर्णप्रिय नहीं लगती। धर्म के विस्तार की हाे़ड में हमने गली-गली में इतने मंदिर, मस्जिद और गुरुद्वारे खड़े कर दिए हैं कि अब वे धार्मिक स्थल कम और धर्म के नाम पर खोली गई दुकानें ज्यादा लगती हैं।
प्रसाद का 'प्रदूषण` : जैसा कि मैने पहले भी कहा, आस्था के उन्माद में हम भूल जाते हैं, हमारे द्वारा लगाए गए लंगर के बाद पीछे छूटने वाली गंदगी की ओर कोई ध्यान नहीं देता। जहां कहीं भी प्रसाद का वितरण होता है, अकसर वहां इतनी गंदगी छाे़ड दी जाती है कि अगले दिन वहां खड़ा रह कर कोई सांस भी नहीं ले सकता। यह हाल तमाम धार्मिक स्थलों का है। हम प्रसाद ग्रहण करने के बाद उसके पात्र को जहां-तहां फेंक देते हैं। इस परंपरा कोई बदलना होगा। जैसे हम अपने घरों में सफाई रखते हैं, इसी तरह सार्वजनिक स्थलों का भी हमें ध्यान रखना होगा।
अंत में,
उपरो लिखी गई बातों से मेरा आशय किसी की धार्मिक भावना को ठेस पहुंचाना नहीं है। बल्कि मैं सिर्फ इतना कहना चाहता हूं, धर्म के नाम पर हम ढकोसला करें। धार्मिक ग्रंथों में लिखी बातों का अध्ययन करें और उन पर चलने का प्रयास करें। दिखावे की भि से जीवन कभी भवसागर पार नहीं कर सकता। इतिहास गवाह है, जितने भी संत हुए हैं, उन्होंने अपने कर्मों की बदोलत मोक्ष प्राप्त किया। एक व्यवहारिक उदाहरण देना चाहूंगा। आप तय करें, किस की भि में शि है।
-एक आदमी किसी धार्मिक स्थल पर जाता हैं, कई घंटे लाइन में खड़े रहने के बाद उसका नंबर आता है, इसके बाद वह घर के लिए बस पकड़ता है। बस में एक वृद्धा खड़ी है, जिसे सीट नहीं मिलती। लेकिन, वह आदमी उसकी ओर से मुंह फेर लेता है और सोने का नाटक करने लगता है।
-एक आदमी कभी किसी धार्मिक स्थल पर नहीं जाता है। उसका मानना है, प्रभु घट-घट में निवास करते हैं। वह अकसर बस में बड़े बुजुर्गों और गर्भवती महिलाआें को अपनी सीट देकर घंटों खड़े होकर सफर करता है। अपने इसी तरह के कर्मों को वह अपनी पूजा मानता है

Sunday, 26 October 2008

आखिर भगवा धारियों में उबाल क्यो ?


मालेगांव बम धमाके में साध्वी प्रज्ञा सिंह का नाम आने से 'भगवा' में आखिर उबाल क्यों हैं ? क्या सिर्फ़ मुसलमान ही आंतकी हो सकते हैं ? "भगवाधारी" का जब नाम आया तो सारे भगवाधारी नाराज हो गए । जब मुल्ला, मौलवी और मुसलमानों पर उंगली उठाई जा सकती है, तो हिंदू संगठनों में कुछ भगवाधारियों पर उंगली क्यों नहीं उठ सकती है । चलो कुछ देर के लिए मान लेते हैं कि साध्वी प्रज्ञा का धमाके से कोई संबंध नहीं है, तो डर किस बात की है । साध्वी उमा भारती बिल्कुल ठीक कर रही हैं, लेकिन यह कोई प्रज्ञा का चरित्र प्रमाण पत्र नहीं है, जिसे ठीक समझा जाए । देश से जुड़ी हुई गंभीर बात है, जिस पर सभी दलों को एक होकर काम करना चाहिए । ऐसा नहीं कि देश में कुछ मुसिलम संगठन ही आंतकी गतिविधियों में संलिप्त हैं, हिंदू संगठनों के कुछ मठाधीश भी इस दायरे में आ रहे हैं । हालांकि कभी छात्र नेता रहीं प्रज्ञा का चंबल के आस-पास इलाके में प्रवचन करना लोगों को पच नहीं रहा है । मान लेते हैं कि प्रज्ञा निर्दोष है, तो जांच से घबराना कैसे ? बवाल पर उबाल फैलाने के लिए न्यूज चैनलों ने काम शुरू कर दिया है । कोई मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज को जोड़ रहा है तो कोई वरिष्ठ अफसर से मोहब्बत की बात कर रहा है । छात्र राजनीति के बाद साध्वी बनी प्रज्ञा में क्या बदलाव आया , जिससे उनका नाम आतंकी गतिविधियों से जुड़ गया ? इस पूरे मसले पर भगवाधारी ही नहीं तमाम हिंदू संगठनों को एक होकर गंभीरता से सोचना होगा । पूरे मामले को इमानदारी के साथ जांच होनी चाहिए ।

Wednesday, 22 October 2008

किसने बनाया राज ठाकरे को ऐसा?

राज ठाकरे और उनके मवालियों के बारे में कुछ लिखने से पहले काफी देर तक सोचता रहा। गरज ये थी कि ऐसे लोगों के बारे में कुछ लिखना अपनी उर्जा और आपका वक़्त, दोनों बर्बाद करना है। लेकिन दूसरा ख्याल ये था कि अगर 'ठाकरों' के बारे में कुछ नहीं लिखा, तो शायद ये अपने ज़मीर और अपनी कलम के साथ गद्दारी होगी। लिहाज़ा, काफ़ी जद्दोजहद के बाद आखिरकार लिखने का फ़ैसला किया।
सभी जानते हैं कि किसी बच्चे बहकते कदमों को अगर वक़्त रहते नहीं रोका जाए, तो ये कदम अक्सर इतनी दूर नहीं निकल जाते हैं कि फिर उसके लिए लौटना मुश्किल हो जाता है। राज ठाकरे बच्चे तो नहीं हैं, लेकिन उनकी बदमाशियों पर महाराष्ट्र सरकार समेत ज़्यादातर राजनीतिक और गैरराजनीतिक हस्तियों की चुप्पी मुझे एक लापरवाह अभिभावक की जैसी ज़रूर लगती है। कहने की ज़रूरत नहीं है कि राज ठाकरे को अगर वक़्त रहते ही एक मराठी होने से पहले एक हिंदुस्तानी होने का पाठ पढ़ा दिया जाता, तो आज महाराष्ट्र नफ़रत की आग में इस तरह धू-धू कर नहीं जल रहा होता।
मराठी मानुष तरक्की करें, इससे भला किसे ऐतराज़ होगा? महाराष्ट्र में करें, इससे भी किसी को क्या शिकायत होगी? लेकिन मराठियों की तरक्की और उनके लिए जगह बनाने के नाम पर अगर किसी दूसरे सूबे से आए बेगुनाह लोगों के साथ अमानुषिक हरकत की जाए, तो इसे कतई बर्दाश्त नहीं किया जा सकता। लेकिन जिस तरह पहले ही दिन से महाराष्ट्र सरकार राज नाम के 'नासूर' को हल्के तौर पर ले रही है, ये उसी का नतीजा है कि आज हालात हाथ से बाहर होते जा रहे हैं। कुछ माह पहले जब राज ने मराठियों को रिझाने के लिए गैरमराठियों का अपमान किया था, जया बच्चन के बहाने यूपी-बिहार पर हमला बोला था, तभी अगर उन्हें कानूनी तौर पर कड़ी सबक सिखा दी गई होती, तो आज महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना के मवालियों के हौसले इतने बुलंद नहीं होते। लेकिन तब महाराष्ट्र सरकार ने इस मामले पर कानूनी राय लेने की बात कह कर इसे अनदेखा करने की कोशिश की। इससे पहले भी सरकारें उनके चाचा बाल ठाकरे के साथ ऐसा ही करती रही हैं। लेकिन सोचिए कि अगर ऐसी ही कोई हरकत किसी आम आदमी ने की होती, तो यही सरकार और इसी पुलिस ने उसी कानून की दुहाई दे कर उस आम आदमी की खाल में भूसा भर दिया होता।
जैसे किसी की जान लेनेवाला शख़्स भी ख़ुद को हर हाल में जस्टीफ़ाई करने की कोशिश करता है, ठीक उसी तरह अपनी गुंडागर्दी के बाद महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना भी ख़ुद को सही साबित करने में जुटी है। उस रोज़ जब एक चैनल के एंकर ने राज के एक चेले (कोई राऊत नाम है उसका) से इन हरकतों का सबब पूछा तो उसने झट असम और उत्तर पूर्व के राज्यों में जारी बिहारी विद्वेष की दुहाई दे डाली। मानों उत्तर पूर्व के कुछ लोग अगर बिना सोचे समझे कुएं में कूद जाएं, तो वो भी कूद जाएंगे। लेकिन इन मवालियों को ये कौन समझाए कि अगर तमाम मराठियों के साथ पूरे देश में भी यही सुलूक किया जाने लगे, तो महाराष्ट्र और मराठी मानुष का क्या होगा? वैसे जमशेदपुर में जिस तरह टाटा मोटर्स के अधिकारी एस।बी. बोरवंकर (मराठी होने की वजह से) के घर हमला हुआ, उससे तो लगता है कि अब शायद इस तरह की वारदातों की शुरुआत हो चुकी है। लेकिन ये सिर्फ़ मराठियों के लिए नहीं, बल्कि पूरे देश के लिए एक चिंता की बात है। क्योंकि अगर हर तरफ़ क्षेत्रीयता के नाम पर लड़ाई शुरू हो जाए, तो किसी गृहयुद्ध से कम नहीं होगा। लेकिन भला हो हमारे मुल्क के राजनेताओं का, जिन्हें वोटबैंक के सिवाय शायद कुछ भी नज़र नहीं आता।
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अपने एक पत्रकार साथी ने राज की करतूतों पर कुछ ऐसे विचार भेजे हैं। आप भी ग़ौर करें।
Yes, we all should support Raj Thackeray and take his initiative ahead by doing more...
We should teach our kids that if he is second in class, don't study harder.. just beat up the student coming first and throw him out of the school
Parliament should have only Delhiites as it is located in delhi
Prime-minister, president and all other leaders should only be from Delhi
No Hindi movie should be made in Bombay. Only Marathi.
At every state border, buses, trains, flights should be stopped and staff changed to local men
All Maharashtrians working abroad or in other states should be sent back as they are SNATCHING employment from Locals
Lord Shiv, Ganesha and Parvati should not be worshiped in our state as they belong to north (Himalayas)
Visits to Taj Mahal should be restricted to people from UP only
Relief for farmers in Maharashtra should not come from centre because that is the money collected as Tax from whole of India, so why should it be given to someone in Maharashtra?
Let's support Kashmiri Militants because they are right in killing and injuring innocent people for the benefit of their state and community..
Let's throw all MNCs out of Maharashtra, why should they earn from us? We will open our own Maharashtra Microsoft, MH Pepsi and MH Marutis of the world
Let's stop using cellphones, emails, TV, foreign Movies and dramas. James Bond should speak Marathi
We should be ready to die hungry or buy food at 10 times higher price but should not accept imports from other states
We should not allow any industry to be setup in Maharashtra because all machinery comes from outside
We should STOP using local trains... Trains are not manufactured by Marathi manoos and Railway Minister is a Bihari
Ensure that all our children are born, grow, live and die without ever stepping out of Maharasthra, then they will become true Marathis
--Sumit Nagpal

Tuesday, 21 October 2008

रानीगंज में माकपाइयों की गुण्‍डागर्दी, सांस्‍कृतिक कार्यक्रम रद्द कराया

नन्‍दीग्राम से जारी माकपा की गुण्‍डागर्दी का एक नमूना पिछले दिनों देखने को मिला। रानीगंज (प. बंगाल) के सांस्कृतिक-सामाजिक मंच 'मानविक' द्वारा आयोजित 'गणमित्र सम्मान समारोह' (19-20 अक्टूबर, 2008) को भारत की कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्‍सवादी) के स्थानीय नेताओं और कार्यकर्ताओं ने गुण्डागर्दी और धमकियों द्वारा आतंक फैलाकर स्थगित करने पर विवश कर दिया। माकपा का यह सांस्कृतिक आतंकवाद .एस.एस.-विहिप-भाजपा आदि के ''सांस्कृतिक राष्ट्रवाद'' की ही तरह यह माकपा के ''सांस्कृतिक जनवाद'' का एक नमूना है।
रानीगंज (प. बंगाल) की सामाजिक-सांस्कृतिक संस्था 'मानविक' इस वर्ष पाँचवाँ गणमित्र सम्मान कवयित्री और सामाजिक-सांस्कृतिक कर्मी कात्यायनी को देने वाली थी। यह सम्मान सुविख्यात बांग्ला लेखिका महाश्वेता देवी के हाथों दिया जाना था। इस अवसर पर आयोजित दो दिवसीय सांस्कृतिक आयोजन (19-20 अक्टूबर) के दौरान दो परिसंवाद, कविता-मंचन और फिल्म प्रदर्शन के कार्यक्रम और कवयित्री सम्मेलन भी होने थे। इस आयोजन में स्थानीय और निकटवर्ती रचनाकारों-संस्कृतिकर्मियों के अतिरिक्त दिल्ली, कोलकाता, पटना, रांची, भोपाल आदि शहरों के कई लेखक-कवि-संस्कृतिकर्मी भी हिस्सा लेने वाले थे।
इस आयोजन के क़रीब हफ्ता भर पहले से माकपा के कार्यकर्ताओं ने रानीगंज में धमकी और गुण्डागर्दी का सिलसिला शुरू कर दिया। न केवल आयोजकों और उनके परिवारों को तबाह कर देने की धमकी दी गयी, बल्कि इस बात का व्यापक प्रचार किया गया कि आयोजन में भाग लेने वालों को गम्भीर परिणाम भुगतने के लिए तैयार रहना चाहिए। 'मानविक' के अध्यक्ष के पिता को, जो हृदय रोग से गम्भीर रूप से ग्रस्त हैं, धमकाया गया कि उनका परिवार और व्यवसाय तबाह कर दिया जायेगा। सचिव और अन्य सहयोगियों को धमकी दी गयी कि वे रानीगंज में रह नहीं पायेंगे। विभिन्न शहरों में आमन्त्रितों को फोन करके और माकपा के सांस्कृतिक संगठनों के सूत्रों से दबाव डलवाकर उक्त आयोजन में हिस्सा लेने से रोका गया। माकपा के स्थानीय लोगों का कहना था कि यह आयोजन दो शर्तों पर हो सकता है। पहली शर्त, इसमें महाश्वेता देवी न आयें क्योंकि वे वाममोर्चा सरकार की नीतियों की मुखर आलोचक रही हैं और नन्दीग्राम में माकपा-विरोधी मुहिम का उन्होंने भी समर्थन किया था। दूसरी शर्त, यह थी कि कात्यायनी को माकपा के विरुध्द एक शब्द भी नहीं बोलना होगा और सम्मान ग्रहण करने के अतिरिक्त किसी प्रकार के राजनीतिक-सांस्कृतिक प्रचारकार्य में हिस्सा नहीं लेना होगा। ज़ाहिर है कि आयोजकों ने इन अपमानजनक शर्तों को स्वीकार नहीं किया और स्थानीय तौर पर क़ायम व्यापक आतंक राज के चलते विगत 16 अक्टूबर को उन्हें यह आयोजन स्थगित करने की घोषणा करनी पड़ी।
कोलकाता और प. बंगाल के अन्य नगरों के अख़बारों में और टी.वी. चैनलों पर इस ख़बर के आने के बाद जब महाश्वेता देवी ने भी क्षोभ प्रकट करते हुए बयान दिया और संस्कृतिकर्मियों ने बड़े पैमाने पर विरोध प्रकट किया, तो पश्चिम बंगाल के एक माकपा-सम्बध्द सांस्कृतिक संगठन और एक लेखक संगठन के प्रतिनिधि ने बयान दिया कि महाश्वेता देवी का माकपा-विरोध जगज़ाहिर है और कात्यायनी नक्सल राजनीति से जुड़ी हैं।
यदि विचारों में धुर-विरोध है, तो माकपाइयों को वैचारिक विरोध और बहस के जनवादी तरीक़ों का ही इस्तेमाल करना चाहिए, न कि गुण्डागर्दी और आतंक-राज का सहारा लेना चाहिए। जो लोग वैचारिक विरोध का यह तरीक़ा अपनाते हैं वे लोग हुसैन की कला-प्रदर्शनी पर बजरंगदली फसिस्टों के हमले और तोड़फोड़ की राजनीति का विरोध भला किस मुँह से करते हैं?
रही बात नक्सलवादी होने के आरोप की, तो माकपा और भाकपा जैसी पार्टियां सत्ताभोगी, संसदमार्गी, अर्थवादी राजनीति करती हैं और संशोधनवादी हैं। चीन मार्का ''बाज़ार समाजवाद'' बर्बर और निरंकुश सर्वसत्तावादी पूँजीवाद है। लेकिन साथ ही, आतंकवाद या ''वामपन्थी'' दुस्साहसवाद की राजनीति भी पूरी तरह गलत है। नक्सलवाद अपने आप में कोई राजनीतिक कैटेगरी नहीं है। प्राय: इस श्रेणी में आतंकवादी वामपन्थी धारा और क्रान्तिकारी जनसंघर्ष की धारा - दोनों को शामिल कर लिया जाता है। हम क्रान्तिकारी जनसंघर्षों के पक्षधर हैं और माकपा की ''बाज़ार-समाजवादी'' आर्थिक नीतियों का और उस कुलीन मध्यवर्गीय सुधारवादी धर्मनिरपेक्षता का विरोध करते हैं जो साम्प्रदायिक फासीवाद के विरुध्द व्यापक जनता को सड़कों पर लामबन्द करने के बजाय संसद में कभी कांग्रेस तो कभी सपा तो कभी बसपा के साथ गँठजोड़ करने और राजधानी की सड़कों पर फ़ासीवाद का रस्मी विरोध करने में यक़ीन रखती है। माकपा के संशोधनवाद का विरोध करना और क्रान्तिकारी वामपन्थी विचारों की हिमायत करना यदि नक्सलवाद है तब नक्सलवादी कहलाने में कोई परहेज नहीं है।
रानीगंज प्रसंग वस्तुत: नन्दीग्राम प्रसंग की सांस्कृतिक दायरे में पुनरावृत्ति मात्र है। मुद्दा चाहे आर्थिक हो या सांस्कृतिक, माकपा का रवैया सभी मामलों में निरंकुश सर्वसत्तावादी ही होता है। माकपा-भाकपा जैसी पार्टियाँ पूरी दुनिया की अन्य सामाजिक-जनवादी पार्टियों और एन.जी.ओ. की तरह, नवउदारवादी आर्थिक नीतियों के विकल्प के लिए संघर्ष करने के बजाय उन्हें मात्र ''मानवीय चेहरा'' देने लायक पैबन्दसाज़ी करना चाहती हैं। इनका मॉडल चीन का ''बाज़ार समाजवाद'' है जो बर्बर फ़ासिस्ट तरीक़े से वहाँ लागू हो रहा है। नन्दीग्राम ने सिद्ध कर दिया है मौक़ा मिलने पर माकपा भी उसी तरीक़े से नवउदारवादी नीतियों को लागू करेगी। माकपा के गुण्डा राज की वास्तविक झलक पानी हो तो कोलकाता से बाहर प. बंगाल के अन्य छोटे-छोटे शहरों-कस्बों में जाना पड़ेगा। वैसे कोलकाता में भी इसकी बानगी देखने को मिल जाती है। माकपा का ''समाजवाद'' दिल्ली में कुलीन लिजलिजे सुधारवाद के रूप में सामने आता है और प. बंगाल में सामाजिक फ़ासीवाद (चेहरा समाजवादी, आचरण फ़ासीवादी) के रूप में सामने आता है।