Wednesday, 25 June 2008

मोबाइल के फायदे

----मोबाइल के फायदे ----
आज हर कोई मोबाइल का आदी होता जा रहा है। इस के बढ़ते नशे ने हर एक को जकड़ लिया है। चाहे वो बच्चा हो जा बुजुर्ग कोई नही जो इस नशे को छोड़ने को तैयार हो। इस नशे का असर हमारी समरण शक्ति पर भी हो रहा है। जिस से हम सब अंजान है। पहले जहां हर बात हम आसानी से याद रखते थे आज हम छोटी-छोटी बात के लिए मोबाइल पर निर्भर होने लगे हैँ। चाहे कोई अपना काम हो या फिर किसी को याद कराने का काम। हर छोटी बात को मोबाइल पर डाल कर याद करने की कोशिश करना कितना आसान लगने लगा है। इतना ही नही मोबाइल की मैमोरी मैं अपने रोजाना मैं इस्तेमाल होने वाले नंबर को लिख कर कितना हल्का महसूस होता है जैसे कितना बढ़ा बोझ उतर गया। बस एक बटन दबाया और मिल गया नंबर। जिसे याद करने के लिए हम कितनी कोशिश करते घर की दीवार, कॉपी या डायरी का इस्तेमाल होता था। पहले हम को नंबर भी याद रहते थे। पर आज याद रखने का सवाल ही नही होता मोबाइल है न हर मर्ज़ की दवा। मोबाइल का एक और फायदा देखने को मिल रहा है। आसानी से हम झूठ बोलने के आदी होते जा रहे है। इतना ही नही एसएमएस फंडा भी बडा काम का है। जहां भी बैठे हो बात करो किसी को कानों कान ख़बर नही कहा लगे हो। साइंस के तरक्की करने का फायदा किसी को मिले न मिले प्रेम रोग के शिकार मरीज़ इस का भरपूर लाभ ले रहे हैँ। अब घर में चिठ्ठी पकड़े जाने का डर भी ख़तम हो गया हैँ मोबाइल पर संदेश भेजा और उत्तर के लिए इंतजार भी नही करना पड़ता। लेकिन कहते है की मोबाइल का ज्यादा फायदा नुकसान की देता है। इस लिए इस्तेमाल करेँ पर संभल कर।

Tuesday, 24 June 2008

ऐ भाई जरा सोचो तो

.......... ऐ भाई जरा सोचो तो आज इतनी तेज रफ्तार जिन्दगी में हर वक्त बस कल की चिंता में डूबे रहते है। आज के बारे में सोचने बेठै तो भी कल की चिंता सताने लगती है की कल कैसा होगा कल किया होगा। इस चक्कर में लोग पंडितो और तांत्रिको के दरवाज़े पर दस्तक देने वालो की भीड़ बढ़ती जा रही है। अपनी जेब ढ़ीली कर लोग उन को माला माल कर रहे है। जरा भाई एक पल के लिए मेरी बात पर गौर तो फरमाएं की किस के दहलीज पर आप माथा टेकने जा रहे है। अगर वो कल के बारे में जानते तो किया अपना कल ना सवार पाते। क्यों ये दुकानदारी खोल कर लोगों की आंखों पर पट्टी बांधने का काम करते। लेकिन आप तो अपना कल ख़ुद ही खराब कर रहे हैं । इन की जेब भर कर। ये मैं इस लिए बता रही हूं। आज मेरे पास कुछ इस तरह का मामला आया तांत्रिको के चक्कर में पड़ कर एक आदमी ने अपनी पूंजी तो गवां दी साथ में अपना जीवन भी तबाह कर लिया। रोज अखवारो के पन्नो पर एक आध ऐसी खबर पढ़ने को मिल ही जाती है जिस में तांत्रिक के चक्कर में लड़के या लड़की की बलि दे दी। लेकिन फिर भी हम पढ़े लिखे लोग आंखों पर पट्टी बांध कर उन के दरवाजों पर पहुंच जाते है। एक तरफ तो हम सब कहते रहते हैं हम पढ़े लिखे हैं, लेकिन दूसरी तरफ़ अनपढ़ लोगों की तरह इन की बातों पर बिश्वास कर आंखे बंद कर लेते हैं। पता नही कब हम लोग गहरी नींद से जग पायेंगे और कब तक हम इन के चक्कर मै अपनी जमा पूंजी को बर्बाद करते रहेंगे। उस पल का इंतजार मुझ को तो हैं। अगर आप को हैं तो ख़ुद से शुरूआत करेँ। क्योंकि एक-एक जुड़ कर ही काफिला तैयार होगा और हम नया सवेरा ला पांएंगें।

Friday, 20 June 2008

ताकि बलात्कार का सौदा न हो

राष्ट्रीय महिला आयोग ने बलात्कार पीड़ित महिलाआें को दो लाख रुपये आर्थिक सहायता देने की योजना बनाई है। इस पैसे से उन्हें पुनर्वास, चिकित्सा और कानूनी सुविधा उपलब्ध कराई जाएगी। राष्ट्रीय महिला आयोग के इस प्रस्ताव पर महिला एवं बाल विकास मंत्री रेणुका चौधरी ने अपनी मुहर लगा दी है। इसमें २०,००० रुपये तत्काल सहायता, ५०,००० रुपये चिकित्सा सहायता और पुनर्वास के लिए दी जाएगी। इसके बाद एक लाख तीस हजार रुपये की अंतिम राशि दी जाएगी।
आयोग की यह पहल निश्चय ही स्वागत योग्य है, लेकिन विभिन्न सरकारी योजनाआें की दशा को देखते हुए मन में कई सवाल भी खड़े करती है। कुछ हजार रुपये के लिए जान तक लेने पर उतारू अपराधी किस्म के लोग सरकारी योजना के दो लाख रुपये हथियाने के लिए तरह-तरह के हथकंडे नहीं अपनाएंगे, ऐसा सोचना भी गलत होगा। दो लाख के लोभ में बलात्कारी और बलात्कार पीड़ित साथ मिलकर साजिश रच सकते हैं। संभव है कि बलात्कार की पुष्टि करने वाले सेहत मुलाजिम, केस की जांच करने वाले पुलिसकर्मी और दो लाख की सहायता मंजूर करने वाले सरकारी अधिकारी तक अपना हिस्सा तय कर इस साजिश में शामिल हो जाएं। ऐसे में बलात्कार के मामलों में अप्रत्याशित वृद्धि से इनकार नहीं किया जा सकता। साथ ही यह तय करना मुश्किल हो जाएगा कि सहायता का सच्चा हकदार कौन है। यदि ऐसा हुआ तो वास्तविक पीड़ित दो लाख रुपये पाने के लिए दफ्तरों के चक्कर ही काटती रह जाएंगी।
योजना को लेकर कुछ आशंकाएं तो आयोग को भी हैं, तभी तो आयोग की अध्यक्ष गिरिजा व्यास कहती हैं कि इसे लागू करने से पहले सहायता के मापदंड बनाए जाएंगे, जिससे इसका दुरुपयोग न हो सके। आयोग को चाहिए कि मापदंड तय करने से पहले इसके विभिन्न पहलुआें पर विशेषज्ञों से राय ले, ताकि पूरी तरह दुरुस्त योजना तैयार हो सके, जिसमें जालसाजों के लिए झोल न हो और पीड़ित पापड़ न बेलते रह जाएं।

एक तरफ मिन्नतें, दूसरी तरफ पिटाई

एक तरफ मिन्नतें, दूसरी तरफ पिटाई
बिहारी मजदूरों से ये कैसी प्रीत निभाई
पंजाबी एक तरफ बिहारी मजदूरों की मिन्नतें कर रहे हैं कि वे उनके खेतों की देखभाल करे, वहीं दूसरी ओर काम कर रहे मजदूरों का पैसा मांगने पर पीटा भी जा रहा है। ऐसा ही हुआ है तरनतारन के गांव स्कतरा में, जहां धान लगवाई गत वर्ष से अधिक मांगने पर जमींदारों के लड़कों ने गरीब मजदूरों के घर पर हमला करके उनकी धुनाई कर दी। हमलावरों ने घर की महिलाआें, व्यि तयों को जाति सूचक शब्द व बेइ्ज्जत करके घरों के सामान की तोड़फोड़ भी भी। घरों में लगाई सब्जी और छायादर पे़ड भी काट डाले। गांव के ही कुछ लोगों की मदद से पीड़ितों ने डीसी को शिकायत भी कर दी है।
गांव के खेत मजदूर कश्मीर सिंह, सुखदेव सिंह, कुलवंत सिंह व जसविंदर सिंह ने बताया कि आज के मंहगाई युग में कोई मजदूर अपने खून-पसीने से मेहनत कर अपनी मजदूरी अधिक मांग लेता है तो बदले उनके साथ मारपीट की जाती है। उन्होंने आरोप लगाया कि धान लगाने की एवज में मजदूरों ने अधिक देहाड़ी मांगी थी। लेकिन जमीदारों ने पहले तो देने से इनकार कर दिया। फिर जब उनसे काम लिया गया तो उन्हें कम पैसे टकाने की कोशिश की गई। विरोध करने पर जमींदारों के लड़कों ने बीती रात मजदूरों के घर में घुसकर उनके साथ मारपीट की। कई लोगों को चोटें आई है।

Thursday, 19 June 2008

आस्था से खिलवाड़

बाबा बर्फानी की एक झलक पाने के लिए महीनों की कड़ी मशक्कत के बाद पहलगाम पहुंचे श्रद्धालुआें को दर्शन से पहले बुधवार को लाठियां खानी पड़ी। कई श्रद्धालु चोटिल हुए, जबकि इस दौरान मची भगदड़ में कई बेहोश हो गए। महिलाआें, बच्चों और बुजुर्ग श्रद्धालुआें को खास तौर पर काफी परेशानियों का सामना करना पड़ा। इस बदइंजामी के लिए श्राइन बोर्ड और जम्मू-कश्मीर पुलिस प्रशासन को सीधे तौर पर जिम्मेदार ठहराया जा सकता है। आतंकियों की धमकी को नजरअंदाज कर और मौसम की चुनौतियों से जूझने के जज्बे के साथ जान जोखिम में डालकर देश के कोने-कोने से पहुंचे श्रद्धालुआें को कम से कम इतनी उम्मीद तो रही ही होगी कि सरकार और यात्रा के प्रबंध में जुटी संस्थाएं उनकी मुश्किलें कम करेंगी। लेकिन हुआ ठीक उसके उलट। यह आस्था से खिलवाड़ नहीं तो और या है?
इस सालाना धार्मिक आयोजन के लिए सालभर उच्चस्तरीय बैठकों का दौर चलता है, देश और प्रदेश की सरकारें तमाम प्रबंधों की समीक्षा करती हैं और विभिन्न इंतजामों के नाम पर बड़ी राशि खर्च भी की जाती है। इसके बावजूद सैकड़ों-हजारों किलोमीटर दूर से तमाम मुश्किलों का सामना करते हुए पहलगाम पहुंचे श्रद्धालुआें को बदइंतजामी का सामना करना पड़ा है, यह अत्यंत निंदनीय है। पहले ही दिन रिकार्ड करीब २५ हजार श्रद्धालुआें ने पवित्र गुफा में बाबा के दर्शन किए। एक दिन में अधिकतम १० हजार श्रद्धालुआें की पाबंदी के बावजूद इतनी बड़ी संख्या में भ तों के दर्शन करने से श्राइन बोर्ड की कार्यप्रणाली पर सवालिया निशान लगा है। या श्राइन बोर्ड के साथ-साथ जम्मू-कश्मीर सरकार भी तत्काल जरूरी कदम उठाएगी, ताकि ऐसी घटनाआें की पुनरावृत्ति न हो?

Wednesday, 18 June 2008

जनता ने कुर्सी वापस खिंची

(जन प्रतिनिधियों के दुर्व्यवहार को दूर करने के लिए सांसदों और विधायकों को वापस बुलाने का अधिकार मतदाताआें को होना चाहिए -सोमनाथ चटर्जी, लोकसभा अध्यक्ष)

छत्ताीसगढ़ में मतदाताआें ने तीन नगर पंचायत अध्यक्षों को वापस बुलाया
काम से जी चुराने वाले और भ्रष्ट ाचार में लिप्त महानुभावों के लिए अब चेत जाने का समय आ गया है। देश के इतिहास में पहली बार छत्तीसगढ़ के दो जिलों की जनता ने मतदान के जरिए तीन नगर पंचायत अध्यक्षों की कुर्सी वापस खींच ली है। जाहिर है अब काम नहीं करने वाले जन प्रतिनिधियों को कुर्सी नहीं मिलेगी। राज्य के दुर्ग जिले में नवागढ़, गंुडरदेही और अंबिकापुर जिले की राजपुर नगर पंचायतों के अध्यक्षों को जनता ने हटा दिया है।
जनप्रतिनिधियों के खिलाफ सोमवार को मतसंग्रह कराया गया गया था और वोटिंग के नतीजे मंगलवार को घोषित किए गए। यह भी एक संयोग है कि पिछले शुक्रवार को ही लोकसभा अध्यक्ष सोमनाथ चटर्जी ने तिरुवनंतपुरम में कहा था कि काम नहीं करने वाले और दुर्व्यवहार करने वाले सांसदों और विधायकों को वापस बुलाने का अधिकार मतदाताआें को मिलना चाहिए। छत्तीसगढ़ के चुनाव अधिकारी सुशील त्रिवेदी ने कहा कि छत्तीसगढ़ नगरपालिका अधिनियम के मुताबिक मतदाताआें को काम नहीं करने वाले नगर पंचायत अध्यक्षों को वापस बुलाने का अधिकार है। इसी अधिनियम के तहत मतदान कराया गया। गुंडरदेही नगर पंचायत अध्यक्ष भारती सोनकर के खिलाफ पार्षद लंबे समय से अभियान छे़डे हुए थे। उन पर राजनीतिक वजहों से विकास कार्यों में बाधा डालने और भ्रष्टाचार के आरोप लगाए जा रहे थे। गंुडरदेही के कुल ३४२५ मतदाताआें ने इस मतदान में शिरकत की। इनमें से १९९७ वोटरों ने भारती को हटाए जाने का समर्थन किया तो १३८९ लोग नगर पंचायत प्रमुख को बनाए रखने के पक्ष में थे। ५९ वोट अवैध घोषित किए गए।
इसी तरह दुर्ग जिले की ही नवागढ़ नगर पंचायत के अध्यक्ष सीताराम गे़डेकर को हटाए जाने के मसले पर मत देने पहुंचे कुल २०२३ शहरवासियों में से ११४६ ने प्रस्ताव पर सहमति दी तो ८०० लोगों ने बरखास्तगी का विरोध किया। ७१ लोगों के मत खारिज कर दिए गए। निर्दलीय चुनाव लड़कर नगर अध्यक्ष बने गे़डेकर की जाति को लेकर विवाद था और विकास कार्यों में रुचि न लेने के आरोप भी उन पर लगाए जा रहे थे।
अंबिकापुर जिले की राजपुर पंचायत भी इस ऐतिहासिक प्रक्रिया की गवाह बनी। यहां के नगर पंचायत अध्यक्ष खोरेन खल्को विपक्षी दल भाजपा के साथ अपने साथी कांग्रेसजनों के भी निशाने पर थे। लंबे अभियान के बाद उन्हें हटाए जाने के प्रस्ताव पर मतदान कराया गया। इस वोटिंग में १५९५ वोटरों ने हिस्सा लिया। इनमें से ८१३ निवासियों ने खल्को को नकार दिया तो ७४० मतदाताआें ने उन्हें बनाए रखने का समर्थन किया।

छत्तीसगढ़ नगरपालिका अधिनियम, १६१ की धारा ४७ के मुताबिक अगर नगर पालिका के तीन चौथाई चुने हुए प्रतिनिधि नगर निगम के अध्यक्ष को हटाने के लिए जिलाधिकारी को लिखित में अर्जी देते हैं तो जिला प्रशासन इसकी जांच कर राज्य सरकार को अपनी सलाह भेजता है। इसके बाद राज्य सरकार चुनाव कराने के लिए राज्य चुनाव आयोग को प्रस्ताव भेजती है जिससे अध्यक्ष के भाग्य का फैसला हो सके।

कैसे होता है चुनाव
मत पत्र पर दो कुर्सियों के निशान होते हैं। एक कुर्सी पर किसी व्यि त को बैठे हुए दिखाया जाता है जबकि दूसरी कुर्सी खाली होती है। अगर मतदाता चुने हुए प्रतिनिधि को वापस बुलाना चाहते हैं तो उन्हें खाली कुर्सी पर मुहर लगानी होती है। अगर मतदाता संबंधित जन प्रतिनिधि को सत्ता में बनाए रखना चाहते हैं तो कुर्सी पर बैठे हुए व्यि त पर मुहर लगानी पड़ती है।

इन देशों में है स्थानीय स्तर पर जनप्रतिनिधियों को वापस बुलाने का अधिकार

अमेरिका, जर्मनी, कनाडा, वेनेजुएला

आतंकवाद पर भारी पड़ी आस्था और श्रद्धा

तवी के सन्नाटे को सुबह श्रद्धालुआें के जयकारों ने ताे़डा
जम्मू। सांबा एनकाउंटर, रामगढ़ से टर में अमरनाथ यात्रा पर हमला करने आए आतंकियों की गिरफ्तारी, किश्तवाड़ में ग्रेफ के लेफ्िटनेंट कर्नल समेत पांच लोगों की हत्या। यात्रा शुरू होने से पूर्व आतंकियों द्वारा पिछले एक महीने में श्रद्धालुआें को खौफजदा बनाने और यात्रा को बाधित करने के लिए यह साजिशें रची गई। अमरनाथ यात्रा के पहले जत्थे में शामिल २८३७ श्रद्धालुआें की बाबा बर्फानी के प्रति श्रद्धा और आस्था ने इन साजिशों को फ्लाप कर दिया। कुल मिलाकर श्रद्धालुआें के रुझान ने साबित कर दिया कि आतंकवाद पर आस्था और श्रद्धा भारी पड़ी। शिविर में मौजूद श्रद्धालुआें की जुबान पर हर हर महादेव और भोले बाबा का उत्साह वर्धक जयकारा भी यहीं संदेश दे रहा था।
अमरनाथ यात्रा पर आए श्रद्धालु भोले बाबा के प्रति श्रद्धा, विश्वास और आस्था का मुकाबला आतंकवाद से करने को राजी नहीं थे। हर श्रद्धालु सब कुछ भोले बाबा पर छाे़ड कर बेखौफ शिव भ ती के खुमार में लीन था। इससे पूर्व बुधवार रात को दो बजे बजे यात्रा का स्थायी रोशनी से नहा रहा था। एक तरफ तवी नदी का सन्नाटा तो दूसरी तरफ नदी के किनारे पर स्थित शिविर में श्रद्धालुआें की यात्रा संबंधी तैयारी की सुगबुगाहट शुरू हो गई। एक घंटे की शांति के बाद तीन बजे शिविर से बसों में सवार होने की एनाउंसमेंट के साथ ही स्पीकर पर भोले बाबा के भजनों के कैसेट बजने लगे। सुबह की हलकी ठंडक इस दौरान भोले बाबा के जयकारों के साथ गर्मी में तबदील हो गई। शिविर के आस-पास लगी सभी हाई मास्क लाइटों को भी आन होते ही श्रद्धालुआें के सामान की सुरक्षा जांच और बसों में सीटों की बुकिंग का सिलसिला अपने अपने काउंटरों पर शुरू हो गया। हाई मास्क लाइटों समूचा यात्री निवास परिसर और आधार शिविर मानो रोशनी से नहा रहा था। सवा तीन बजे से ही निजी वाहनों वाले श्रद्धालु अपने वाहनों में सवार होकर सुरक्षा जांच के बाद रवाना होने के लिए जत्थे की कतार में लग गए।
इस दौरान आला पुलिस और प्रशासनिक अधिकारियों का शिविर में पहुंचकर मुआयना करने का सिलसिला भी शुरू हो गया। शिविर के चारों तरफ बनाए गए टावरों पर जवानों की तैनाती के अलावा अंधेरे में सादी वर्दी में सर्च लाइट लेकर भी जवानों को तैनात किया गया था। नई दिल्ली, राजस्थान, उत्तराखंड, गुजरात, पंजाब, हरियाणा, मध्य प्रदेश और उत्तर प्रदेश आदि राज्यों से आए श्रद्धालुआें लेख राज, नरेश श्रवण, सरवेश कुमार, भगत सिंह और संदीप सोलंकी का कहना था कि आतंकवाद की तुलना भोले बाबा से नहीं की जा सकती। हर जगह आतंकवाद है, इसलिए आस्था और श्रद्धा के कारण उन्होंने सब कुछ भोले बाबा पर छाे़ड दिया है। जो भोले बाबा करेंगे, वहीं हमे मंजूर है।

ई-मेल जी की जय हो

ई-मेल जी की जय हो
-थपलियाल राजीव
ई-मेल जी आपकी जय हो। आप न होते तो हम इ कीसवीं सदी में होते हुए भी न होते। आपके पदार्पण से बहुत कुछ बदल गया है। आपने आते ही कबूतर जा-जा के जमाने को लात जमाकर हमें चकाचक इंटरनेटी युग को पटक दिया। पहले प्यार मोहब्बत करने वाले झाड़ियों को तलाशा करते थे कि उसकी छांव तले एक-दूसरे को निहार सकंे। उनकी धड़कने शताब्दी की माफिक भागा करती थी कि कहीं कोई कटखना मानवजात उन्हें देख न ले। प्यार की शीतलता में भय की गर्मी। यानी परिणाम मौत।
लेकिन, आपने प्रेमी-प्रेमिकाआें को मौत के भय से दूर कर दिया है। वे अपने-अपने घर बैठे ही आपको 'अंगुलिकाआें` की छुअन मात्र से एक-दूसरे के दीदार पलक झपकते कर सकते हैं। फिर वे चाहें जितनी बतियां चाटा करें, दीवारों के कानों को फुस्फुसाहट तक पल्ले नहीं पड़ने वाली।
आपने शांति स्थापना में क्रांतिकारी परिवर्तन ला दिया है। सतयुग था तो सिंहासन की लड़ाई में इंद्र को हर व त वज्र लेकर पंगा करने को तैयार रहना पड़ता था। संचार के साधन के रूप में नारद महाराज को खबरें लेकर हर पल स्वर्ग से मृत्युलोक और मृत्युलोक से बैकुंठ का च कर लगाने होते थे। भागते-भागते दम फूल जाता था और सांसे उखड़ने लगती थी पर बॉस का आर्डर था कि पांव रुकनेे नहीं चाहिए। बेचारे!
त्रेतायुग आया तो उसमें भी जमीन-सिंहासन को लेकर भिड़ंत होने का क्रम जारी रहा। इस युग में अग्निवाण-ब्रह्मास्त्र के जरिए मामले सुलटाए गए। मैसेज के लिए वानरों का सहयोग लिया गया। लेकिन, इस झमेले में संदेशकर्ता को डर अलग रहता था कि कहीं कपि महाराज ने किसी आश्रम के बगीचे में ठंू-ठां कर दी दी तो ऋषि-मुनि का श्राप झेलना होगा।
द्वापर युग में आकाशवाणियों ने काम चलाया। इसमें भी पंगा कि गलत मौके पर बोल गई तो दुल्हा-दुल्हन जा पहंुचे कैद में।
लेकिन, कलियुग में आपने इस सब झंझटों से मुि त दिलवा दी। अब खून-खच्चर के बजाय शुद्ध अहिंसावादी तरीका अपनाया जाने लगा है। कभी सुई की नोक के बराबर जमीन के लिए महाभारत हो गया था, लेकिन आज आपकी बदौलत दौलत के लिए कहीं भी भाइयों में अस्त्र-शस्त्र नहीं उठ रहे हैं। शब्द वाणों से काम चलाया जा रहा है और दोनों पक्ष एक-दूसरे को परास्त करने के लिए कंप्यूटरवा के मार्फत ई-मेल भेज रहे हैं। एक पक्ष ई-मेल से हमला करता है तो दूसरा भी जवाबी ई-मेल करता है। इस आघात में न कहीं र त बहता है और न कहीं सिर कटता है। मगर, हमले का उ ेश्य पूरा हो जाता है सामने वाला पक्ष बिलबिलाते हुए शीश झुका लेता है। अगर, उसकेपास फालतू का टाइम हो और जंग को लंबा चलाना चाहे तो भी नो प्राबलम। उसके तरकश के बाण खत्म नहीं होंगे।
इस प्रकार हे ई-मेल! प्रेम और शांति केे क्षेत्र में दिए योगदान के लिए हम आपके समक्ष नतमस्तक हैं। सची-मुची में दिल से समर्पित प्रेमिका की भांंति आपकी मंगलकामना करते हुए जय-जैकार करते हैं।

बाप से चार जूता आगे

बाप से चार जूता आगे
पड़ोस में रहने वाले रामभरोसे मालपानी जब अपने सुपुत्र के टीचर से मिलने पहुंचे, तो टीचर ने थोड़ी देर उन्हें घूरा और फिर बोली, 'ऐसा कीजिए, अपने सुपुत्र करमचंद मालपानी को किसी दूसरे स्कूल में दाखिला दिलवा दें। अब उसे इस स्कूल में ज्यादा दिन तक बरदाश्त नहीं किया जा सकता है।` मालपानी जी ने दांत निपोरते हुए कहा, 'मैडम, आखिर मेरे बेटे ने ऐसा या किया कि आप उसे रेस्टीकेट करने पर तुली हुई हैं।`
'देखिये, आपका बेटा भी आपकी तरह कुछ ज्यादा ही प्रतिभावान है। मैथ वाली टीचर मिस सिन्हा बता रही थीं कि पैरेंट्स-टीचर मीटिंग में जब भी आप आते हैं, तो उनसे चोंच लड़ाने की कोशिश करते हैं। और आपके सुपुत्र...तौबा..तौबा...आपसे भी चार जूता आगे। उसकी उम्र दस साल है, लेकिन फ्लर्ट करता है पांच साल से लेकर बीस साल तक की लड़कियों से। हथेली पर अपना दिल लिए स्कूल की हर छात्रा से 'डेट` पर चलने की गुजारिश करता रहता है। इससे स्कूल की बदनामी और माहौल खराब होता है। ऐसा कीजिए, अब आप पिता-पुत्र इस स्कूल पर मेहरबानी करें और अपने नौनिहाल को यहां से ले जाएं।`
टीचर की बात सुनकर मिस्टर मालपानी भड़क उठे। बोले, 'आप मामले को कुछ ज्यादा ही बढ़ा-चढ़ाकर पेश कर रही हैं। मेरा बेटा मेरी तरह रसिक है, लेकिन बदमाश कतई नहीं है। और अगर रसिक होना गुनाह है, तो इसके लिए भी फिल्म इंडस्ट्री जिम्मेदार है। उसकी इस काबिलियत का विकास फिल्मों से हुआ है। अब बच्चा जैसी फिल्में देखेगा, वैसा ही आचरण करेगा। उसके रोल मॉडल भी तो इमरान हाशमी हैं।`
इतना कहकर मिस्टर मालपानी रुके और बोले, 'आपको इस बात का अंदाजा नहीं है कि मेरा बेटा कितना ऊपर जाएगा। उसने एक साल पहले कहीं किसी अखबार में पढ़ा था कि जल्दी शादी करने में ही समझदारी है योंकि जल्दी शादी करने वाले ज्यादा जीते हैं। सो, वह तभी से जिद कर रहा है कि कैसे भी हो, उसकी शादी करा दी जाए ताकि सौ साल से ऊपर जीने का मौका मिले। ऐसे में बाल विवाह के कानून पचड़े में पड़ने से बेहतर मुझे लड़कियों से फ्लर्ट करने को कहना पड़ा।` मिस्टर मालपानी अपनी रौ में बोलते जा रहे थे और टीचर खड़ी मुंह ताक रही थी।

भगवान करे सबको अच्छा शिक्षक मिले

अलीगढ़ मुश्लिम विश्वविद्यालय में होने वाले दीक्षांत समारोह की पूर्व संध्या पर मंगलवार को पूर्व राष्ट्रपति डा.अब्दुल कलाम सैकड़ों बच्चों से रू-ब-रू हुए। इस दौरान बच्चों को सपना दिखाते हुए उन्होंने कहा कि हमेशा महान बनने की सोचो। लक्ष्य तय करो, दिक्कतों को अपने ऊपर कभी हावी मत होने दो, बल्कि उस पर शासन करो। खुद की सफलता का श्रेय शिक्षकों को देते हुए मिसाइल मैन के कहा कि मैं आज अपने शिक्षकों की बदौलत ही यहां तक पहुंचा हूं। भगवान करे सबको अच्छा शिक्षक मिले।
डा.कलाम की इस दुआ में कहीं न कहीं यह उनका यह दर्द भी छिपा है कि आज सबको अच्छे शिक्षक नहीं मिल रहे। आर्थिक उदारीकरण के इस दौर में शिक्षा का भी व्यापारीकरण गंभीर चिंता का विषय है। स्कूल से कालेज तक पब्लिक से टर का झंडा बुलंद था ही, अब तो देश भर में निजी विश्वविद्यालय भी खुलने लगे हैं। पैसे के खेल ने शिक्षा को पूरी तरह व्यापार बना दिया है। बच्चे नर्सरी से ही अंग्रेजी शिक्षा पा रहे हैं, लेकिन नैतिक शिक्षा के लिए अब सिलेबस में कोई जगह नहीं है। जो शिक्षा थोपी जा रही है, उसके स्तर का पता इस बात से चल सकता है कि बच्चे अंग्रेजी की किताबें तो धड़ल्ले से पढ़ लेते हैं, लेकिन ग्रामर से दूर होते जा रहे हैं। ऐसे में फिलहाल हम भी यही दुआ करें कि भगवान करे सबको अच्छा शिक्षक मिले।

Monday, 16 June 2008

हरित क्रांति पर बुद्धिजीवी भ्रम में

धर्मबीर वामपंथी संगठन के काडर होने के बावजूद सामाजिक संबंधों पर स्वंत्र नजरिया रखते हैंहरियाणा और पंजाब में हरित क्रांति की चकाचौंध के बीच सामाजिक संबंधों में विद्रूपता पर उनकी टिपण्णी सामाजिक व्यवस्था की जड़ों की ओर फिर से देखने और सोचने को विवश करता है

धर्मबीर
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लगभग एक दशक पहले जब कैथल जिले के शिमला गांव में एक प्रेमी जोड़े को तालीबानी अंदाज में पत्थरों से पीट-पीट कर मार डाला गया तो मामला कुछ दिन अखबारों की सुरखी बनकर दब गया। मगर जब असंडा व जोणधी में प्रेम विवाह करने वाले दम्पति को करीबी गोत्र का बताकर राखी बंधवाकर भाई-बहन घोषित किया तो हरियाणा भी उस बहस का हिस्सा बनने लगा जो अक्सर हरित क्रांति वाले क्षेत्रों में सामाजिक सम्बंधों को लेकर उठती रही है। हरित क्रंाति के क्षेत्र पंजाब, हरियाणा व पश्चिमी उत्तर प्रदेश के बारे में बौद्धिक हल्कों में यह विचार सर्वमान्य है कि हरित क्रांति ने यहां के सामाजिक सम्बंधों में बदलाव ला दिया है। मगर हाल ही में करोड़ा गांव के मनोज-बबली व बल्ला गांव के अनीता-सतीश की हालिया हत्याऐं फिर से उस सवाल को उठा रही है। ७०-८० के दशक में शुरू हरित क्रांति ने बहुत से बुद्धिजीवीयों को भ्रम में डाल दिया। ये बुद्धिजीवी हरित क्रांति से भूमि सुधारों का सपना पाले हुए थे जबकि सच्चाई इसके विपरित थी।
हरित क्रांति ने खाद, बीज व कीटनाशक बनाने वाली कम्पनियों के बाजार को तो विस्तार दिया लेकिन भूमि सम्बंधों में कोई बदलाव नही आया। फलस्वरूप हरियाणा का ग्रामीण परिवेश परम्परागत सांमती सम्बंधों मंे जकड़ा रहा। खाप पंचायतों के ये फैसले और रोजबरोज होने वाली प्रेम हत्याओं की जड़ इसी अर्धसामंती व्यवस्था और उससे उपजी मानसिकता की अभिव्यक्ति है। ग्रामीण हरियाणा में भूमि जोतों का आकार आज भी भूमि सुधारों की जरूरत को दर्शाता है। जमीनदारी उन्मूलन कानून व भू-हदबन्दी जैसे कानून के अस्तित्व में आए ५० साल से अधिक होने पर भी हरियाणा में सैंकड़ों एकड़ वाले भू-स्वामी मौजूद है जो ग्रामीण हरियाणा में इन निरंकुश खाप पंचायतों का प्रतिनिधित्व करते हैं। ये खाप पंचायतें ही ग्रामीण हरियाणा में वास्तविक सत्ता का स्वरूप है।
भूमि कानूनों के निष्फल होने का प्रमुख कारण यहां किसी ऐसे जनआन्दोलन की अनुपस्थिति है जिसके निशाने पर सामंती व्यवस्था रही हो। मुजारा आन्दोलन के समय जरूर कुछ छिटपुट घटनाएं हुई थी। १९६७ में जमीन जोतने वाले की नारे के साथ उठा नक्सलवादी आन्दोलन भी यहां कोई दस्तक नही दे पाया। पंजाब में इसका कुछ असर जरूर दिखाई दिया। सामाजिक संगठनों की बात छोड़ भी दी जाये तो खुद सरकारी आंकड़े भूमि सुधारों की मंथर गति को दर्शाते हैं।
यह सच है कि सरकारी आंकड़े सच्चाई को हमेशा ही धुंधला पेश करते हैं फिर भी २००१ के सांख्यिकी सारांश में दिए आंकड़े भूमि सम्बंधों को समझने में समझने में महत्वपूर्ण स्त्रोत हैं। इसके मुताबिक हरियाणा में एक से ढाई एकड़ वाले १४,३६,००० किसानों के पास कुल कृषि योग्य जमीन का मात्र ११ प्रतिशत हिस्सा है। ढाई से सात एकड़ वाले ९,४२,००० मध्यम किसानों के पास कुल कृषि योग्य जमीन का २६ प्रतिशत हिस्सा है। ये गरीब और मध्यम किसान हरियाणा के कुल किसानों का ७८ प्रतिशत हिस्सा बनते हैं। इस तरह देखा जाए तो ७८ प्रतिशत किसानों के पास कुल कृषि योग्य जमीन का मात्र ३७ प्रतिशत हिस्सा है। शेष ६७ प्रतिशत हिस्से पर २२ प्रतिशत धनी किसान व बड़े जमीनदार काबिज हैं।
हरियाणा में भू-हदबन्दी की सीमा १८ एकड़ है। १८ एकड़ से अधिक एकड़ वाले किसानों की जमीनदार की श्रेणी में रखा गया है। भू-हदबन्दी कानून के मुताबिक १८ एकड़ से अधिक जमीन का अधिग्रहण करके भूमिहीनों में वितरण होना चाहिए। सबसे चौंकाने वाला आंकड़ा इसी सीमा से अधिक के किसानों का है। हरियाणा में १,४३,४७० ऐसे जमीनदार हैं जिनके पास हदबन्दी की सीमा से अधिक जमीन है। इसमें भी ७,६२८ जमीनदार तो उस श्रेणी के हैं जिनके पास न्यूनतम ५० एकड़ जमीन है और अधिकतम की कोई सीमा नही है। ये ४ प्रतिशत जमीनदार कुल कृषि योग्य जमीन के लगभग २८ प्रतिशत हिस्से पर काबिज हैं और ग्रामीण क्षेत्रों में वास्तविक सत्ता को नियंत्रित करते हैं। खाप पंचायतों के निरकंुुश फैसले और दलित पिछड़ों के सामाजिक बहिष्कार के फतवे इन्ही के इशारे पर जारी किए जाते है। आर्थिक तौर पर सशक्त होने के साथ-साथ जातिय तौर पर भी प्रभावशाली होने के कारण कोई भी राजनीतिक पार्टी इनके विरोध का साहस नही कर पाती।
कृषि योग्य भूमि के कुछ हाथों में केन्द्रित होने के कारण जहां भू-संख्यक आबादी, बेरोजगारी व अर्ध बेरोजेगारी की स्थिति में गुजर-बसर कर रही है वहीं समाज के लोकतांत्रीकरण की प्रक्रिया भी अधर में है। भूमि सुधारों को ईमानदारी से लागू करके ग्रामीण हरियाणा को भूखमरी, बेरोजगारी व इन निरंकुश खाप पंचायतों से छुटकारा दिलाया जा सकता है। लेकिन क्या वर्तमान संसदीय पार्टियों से ऐसी राजनीतिक इच्छा शक्ति की उम्मीद करना बेमानी नही होगा?

Thursday, 12 June 2008

बिहारी मजदूरों के आगे गिड़गिड़ाए पंजाबी किसान


पंजाब में पूरबिए-१
बिहार के विकास और पंजाब की खेती में या संबंध है? यह सवाल बेमानी नहीं है। अभी पंजाब के किसान अपनी खेती को लेकर चिंतित हैं। कारण है बिहार में चल रहे विकास कार्य। बिहार में निर्माण कार्यो के कारण बेरोजगारों को लगातार काम मिल रहा है। उसकी वजह से वे मजदूर जो पंजाब का रूख करते थे इस बार बिहार आने पर नहीं लौटे। इससे पंजाब में धान की रोपाई के लिए मजदूरों का संकट हो गया। कई अखबारों ने एक फोटो छापी कि जालंधर रेलवे स्टेशन पर एक संपन्न किसान विपन्न से दिख रहे मजदूर को हाथ जोड़कर रोक रहा है। हाथ जोड़ने का कारण है कि यहां की खेती और इंडस्ट्री बिहारऱ्यूपी के मजदूरों पर निर्भर है। आतंकवाद के समय में भी जब स्थानीय लोग खेतों पर नहीं जाते थे या पलायन कर गए थे तब भी इन्हीं मजदूरों ने यहां की अर्थव्यवस्था को संभाले रखा। हरित क्रांति की नींव बिहार यूपी के मजदूरों की मेहनत पर ही रखी गई। उस दौरान बिहार यूपी के काफी मजदूर आतंकियों की गोलियोंं के शिकार बने लेकिन इसके बदले उन्हें कोई महत्व नहीं मिला। पुलिस ने भी उनकी हत्याआें को अपने रिकार्ड में दर्ज नहीं किया। कोई सामाजिक संस्था या व्यि त भी नहीं दिखता जो पंजाब में पूरबियों की स्थिति पर जमीनी तौर पर काम कर रहा हो। यहां के विकास में इस योगदान के बावजूद पंजाब में बिहारऱ्यूपी के लोगों को भैय्ये कहा जाता है। ये बड़े भाई के समान आदर भाव वाला शब्द नहीं है। इसे वे गाली के सेंस में प्रयोग करते हैं। उ्न्हें भैय्यों की जरूरत है, वे उस पर भरोसा भी करते हैं पर यह बर्दाश्त नहीं करते कि वह मजदूर के स्तर से उपर का जीवन जीए।

Thursday, 5 June 2008

राशन की तरह रसोई गैस-डीजल दे सरकार

केंद्र की मनमोहन सिंह सरकार ने पेट्राल, डीजल और रसोई गैस की कीमतों में क्रमश: ५, ३ और ५० रुपये की बढ़ोतरी कर दी है। सरकार ने यह मूल्य वृद्धि इसलिए की है, योंकि अंतरराष्ट ्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमत १३१ डालर प्रति बैरल तक पहंुच गई है। जाहिर है कि ऐसी स्थिति में सार्वजनिक तेल कंपनियों को जबरदस्त घाटा उठाना पड़ रहा था। सरकार भी असमंजस में थी। एक तरफ कंपनियों का घाटा था, तो दूसरी तरफ लोकसभा चुनाव। मूल्य वृद्धि का मतलब है कि महंगाई और बढ़ेगी, जोकि पहले से ही आसमान छू रही है। ऐसे में कांग्रेस का हाल लोकसभा चुनाव में कर्नाटक जैसा ही होगा। फिर भी सरकार ने यह कठोर फैसला लिया है और प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने देश को समझाने के लिए राष्ट ्र को संबोधित भी किया। उनका कहना है कि फैसला सुनहरे भविष्य के लिए लिया गया है। यह देश हित में है।
बहरहाल, सरकार का तर्क अपनी जगह है और विरोधियों का अपनी जगह। जनता की नाराजगी भी अपनी जगह है। लेकिन एक तरह से सरकार गलत नहीं है। आखिर वह कब तक तेल पर सब्सिडी देती रहेगी? पेट्रोल में पांच रुपये बढ़ जाने से कोई कार या मोटरसाइकिल चलाना नहीं छाे़ड देगा। वैसे भी लोग गैरजरूरी कामों के लिए भी इनका इस्तेमाल करते हैं। अब जहां जरूरी हो वहीं उपयोग करें। ऐसे ही रसोई गैस की बात है। महीने में पचास रुपये अतिरि त देने से किसी के बजट में खास फर्क नहींं पड़ेगा। हां, हाय-हाय करने को कोई कितना कर ले। रही बात डीजल की तो उसका दूरगामी असर पड़ सकता है। वह भी इस कारण की कई कार कंपनियों ने अपनी कार डीजल चालित बना दी हैं। विस्तृत केलिए क्लिक करें